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जैकेट के शेष..

पुरी ने बताया कि दिसंबर 2018 तक बिक्री में बढ़ोतरी बनी रहने की उम्मीद है। अर्थव्यवस्था बेहतर कर रही है। बिल्डर को समझ आ...

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 04, 2018, 07:10 AM IST

पुरी ने बताया कि दिसंबर 2018 तक बिक्री में बढ़ोतरी बनी रहने की उम्मीद है। अर्थव्यवस्था बेहतर कर रही है। बिल्डर को समझ आ गया है कि प्रीमीयम और लग्जरी श्रेणी के रियल एस्टेट क्षेत्र सरकार की प्राथमिकता नहीं रहे हैं बल्कि अफोर्डेबल हाउसिंग है। इसलिए बिल्डर्स ने भी जरूरत और मांग के अनुरूप बड़े और छोटे शहरों में अफोर्डेबल हाउसिंग प्रोजेक्ट ही किए। फ्लैट्स या घरों का साइज भी 900 वर्ग फुट से घटाकर 400-500 वर्ग फुट कर दिया गया। कैपिटल गैन टैक्स इक्विटी और फंड पर लगने का फायदा रियल एस्टेट में अभी देखने को नहीं मिला है, शायद यह असर एक अप्रैल से दिखे। वहीं दूसरी ओर बैंकों के द्वारा ब्याज दर बढ़ोत्तरी का नकारात्मक असर इस क्षेत्र पर पड़ेगा।

क्रेडाई के नेशनल प्रेसीडेंट जक्षय शाह ने बताया कि दिसंबर 2017 की तुलना में जनवरी 2018 के दौरान देश के सात महानगरों (मुंबई, दिल्ली-एनसीआर, कोलकाता, चैन्नई, हैदराबाद, बेंगलुरु और अहमदाबाद) में बिक्री 100 फीसदी अधिक हुई है। इस दौरान 250 यूनिट के बजाए 500 यूनिट की बिक्री हुई। नोटबंदी, रेरा और जीएसटी के असर को बाजार ने पीछे छोड़ दिया है। अभी फरवरी के आंकड़े आ रहे हैं फिर भी अंतरिम रूप से जो जानकारी है उसके मुताबिक बाजार ने फरवरी की तुलना में 20 फीसदी अधिक बिक्री दर्ज की है। कैपिटल गेन टैक्स का हमें फायदा हुआ है। हाल ही में बैंक की दरें बढ़ाने के संबंध में उन्होंने कहा कि इसका बहुत मामूली फर्क पड़ेगा, हम अगर ईएमआई में देखेंगे तो बहुत ही कम बढ़ी हुई दिखेगी। अभी रियल एस्टेट में स्थिति यह है कि नए लाॅन्च कम हो रहे हैं और स्टॉक अधिक है। ऐसी स्थिति दो वर्ष और रहेगी, डिमांड बढ़ रही है। प्रॉपर्टी की कीमतें भी निचले स्तर पर हैं। एक अप्रैल से नए सर्किल रेट आ जाएंगे इसलिए मार्च महीने में भी प्रॉपर्टी की बिक्री अधिक होगी। प्रॉपर्टी के रेट भी जल्द ही बढ़ेंगे क्योंकि मटेरियल के भाव बढ़ रहे हैं, स्टील की कीमतें बढ़ गई हैं, कंप्लायंस कॉस्ट बढ़ रही है। हालांकि अभी प्रॉपर्टी के रेट करीब-करीब स्थिर रहे हैं, वर्तमान में प्रॉपर्टी की इन्क्वायरी बढ़ी है और कन्वर्जन दो गुना हुआ है।

देश के सबसे बड़े ज्वैलर्स राजेश एक्सपोर्ट्स के चेयरमैन राजेश मेहता ने बताया कि भाव तो थोड़ा गिरा है लेकिन स्थिर बना हुआ है, अगले एक-दो महीना सोने की कीमतों में इसी प्रकार स्थिरता रहेगी या मामूली बढ़त या गिरावट रह सकती हैं। अभी शादी सीजन शुरू होगा जिसके कारण डिमांड बेहतर रह सकती है। वर्तमान में करीब 70 से 80 टन की प्रति माह सोने की डिमांड बनी हुई है, अगले महीनों में पांच फीसदी डिमांड बढ़ सकती है। बजट में चूंकि गोल्ड सेक्टर के लिए सरकार ने कुछ विशेष घोषणाएं नहीं की थी इसलिए बजट का कोई असर भी नहीं है। वित्तीय सलाहकार हर्ष रूंगटा ने बताया कि इक्विटी मार्केट फरवरी के दौरान भले ही पांच फीसदी घट गया है लेकिन जनवरी में इससे अधिक बढ़ा था। फरवरी में जो गिरावट आई उसमें कई वैश्विक कारण रहे जैसे फेड रेट का बढ़ना और विश्वभर के बाजारों में गिरावट का रुख रहा था। भारत में भी बजट में कैपिटल गेन टैक्स लगने का थोड़ा असर गिरावट में रहा है। वहीं िनवेश सलाहकार फर्म टिकरप्लांट में स्वतंत्र निदेशक और सीए कुरुपेश भंसाली ने कहा कि शेयर बाजार में गिरावट फरवरी के दौरान पूरे विश्व के बाजारों में आई है। म्युचुअल फंड में लगातार निवेश आ रहा है, हलांकि इस दौरान मामूली गिरावट इसमें भी दर्ज की गई है। गिरावट के पीछे मुख्यकारण यह रहा कि बाजार पहले से ही बहुत ऊंचे स्तर पर था और लगातार बढ़ रहा था इसलिए करेक्शन आना भी तय था क्योंकि जब बाजार बढ़ने का कोई कारण नहीं था तो गिरावट में भी बहुत खास कारण नहीं था, करेक्शन ही मुख्य कारण था। मार्च माह के दौरान बाजार के बेहतर करने की उम्मीद है लेकिन वर्ष 2018 उतार-चढ़ाव वाला रहेगा।

अचार-मुरब्बे...

एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक जे.एस. राजपूत कहते हैं कि आज के समय में सूचना के स्रोत इतने हो गए हैं कि सभी चीजें बच्चों को पढ़ाने की जरुरत नहीं है। जरुरत है समझ बढ़ाने की। किताबों की साइज बढ़ी है क्योंकि हर बार जब विद्वान किताब बनाने बैठते हैं तो अपना ज्ञान उड़ेलने लगते हैं। पाठ्यक्रम को कम करना संभव है। कक्षा 10 तक सुरुचि वाले विषय पढ़ाने चाहिए। जैसे- मैंने अपने समय एनसीईआरटी में एक बदलाव किया था। पहले नागरिक, शास्त्र, भूगोल, इतिहास को मिलाकर कुल कुल 800 पन्नों की चार किताबें होती थी। लेकिन इसे मिलाकर एक किया और 200 पन्नों में उसे समेट दिया। वे बताते हैं कि 1962 में मैने एमएससी की पढ़ाई के वक्त टर्मन की 700 पेज की किताब पढ़ी जो आज 7-8 पेज तक सीमित हो गई है। यानी जो आवश्यक नहीं है उसे पाठ्यक्रम नहीं रखना चाहिए।

मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर कहते हैं कि सिलेबस बदलने के लिए हमने जो छह शिविर किए उसमें 200 से ज्यादा शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले संगठन, सभी राज्यों के अधिकारी, शिक्षक, मुख्य अध्यापक और शिक्षाविद आदि से हमारी बारी-बारी से चर्चा हुई। सबने यह माना कि सिर्फ परीक्षा की शिक्षा ही शिक्षा नहीं है। हम इसी सप्ताह में हमारी वेबसाइट पर पूछेंंगे कि कौन सा पाठ बिल्कुल आवश्यक है और कौन सा अनावश्यक है। इस मामले में लेखक और शिक्षाविद विजय बहादुर सिंह कहते हैं कि प्रकाशकों और स्कूलों की मिलीभगत से सिलेबस का बोझ बढ़ा दिया जाता है। जो चित्रकला नहीं जानता उसे बचपन में ही चित्रकला सिखाना सही नहीं है। खेलकूद से स्वास्थ्य ठीक रहता है जिसे अनिवार्य किया जाना चाहिए। सामाजिक जीवन से जोड़ने वाली चीजें पाठ्यक्रम में शामिल की जानी चाहिए। एनसीईआरटी में विज्ञान कमेटी के विशेषज्ञ और एम्स के डॉक्टर डॉ. अमित डिंडा कहते हैं कि विज्ञान में कटौती नहीं की जा सकती। लेकिन सूचनाओं को बहुत संक्षिप्त किया जा सकता है। अमेरिका में इस तरह का मॉडल अपनाया जाता है। भारत भी इसी दिशा में कदम बढ़ाएगा।

मंत्रालय ने पिछले साल अप्रैल से लेकर नवंबर तक देशभर के पांच रीजनल सेंटर पर कार्यशाला का आयोजन किया, जिसके बाद दिल्ली में 6-7 नवंबर को चिंतन शिविर में लंबी चर्चा के बाद इसका एेलान किया गया। इस एेलान के बाद एनसीईआरटी की टीम के साथ जावडेकर ने कई दौर की बैठक कर तत्काल इस दिशा में कदम उठाने का निर्देश दिया है। सरकार ने अभी कक्षा एक से आठवीं तक के पाठ्यक्रम में बदलाव का पूरा खाका तैयार नहीं किया है। यह काम देशभर के िशक्षाविदों से परामर्श के बाद किया जाएगा। लेकिन हर क्लास में हर विषय में कुछ बुनियादी बदलावों को मंत्रालय ने हरी झंडी दे दी है। इससे बाकी अध्यायों में बदलाव के लिए शिक्षाविदों को लाइन मिल जाएगी। मंत्रालय ने जो स्पष्ट नीति बनाई है उसके तहत दो कक्षाओं में रिपीट होने वाले पाठ्यक्रम को बाहर कर किताबों का बोझ कम किया जाएगा।

इस गांव के...

सगरां गांव के करीब सौ युवा अकेले दुबई में रहते हैं। शेष मलेशिया, इंग्लैंड, न्यूजीलैंड सहित अन्य देशों में हॉर्स राइडिंग सिखा रहे हैं। इन्हें अलग-अलग देशों में अलग-अलग सैलरी मिल रही है। सगरां गांव पहुंचने के लिए रेतीले टीलों व ऊबड़-खाबड़ रास्तों से होकर जाना पड़ता है। ग्रामीण किशनसिंह व खीवसिंह बताते हैं कि पहले ग्रामीण खेती पर ही निर्भर थे। गिने-चुने लोग सेना व अन्य नौकरी में थे। लेकिन एक दशक से गांव की स्थिति बदल गई है। विभिन्न देशों में गांव के 150 युवा घुड़सवारी सिखा रहे हैं।

बार्बी डॉल...

इनका रेकॉर्ड: 15 हजार से ज्यादा बॉर्बी का कलेक्शन : जर्मनी की बेटिना डोर्फमैन के पास दुनियाभर में बार्बी का सबसे बड़ा कलेक्शन है। इनके पास अक्टूबर 2011 में ही 15000 से ज्यादा बार्बी डॉल थीं। इनका नाम गिनीज वर्ल्ड रेकॉर्ड्स में दर्ज है। बेटिना को 1966 में पांच साल की उम्र में पहली डॉल मिली थी।

302500 डॉलर में नीलाम हुई थी सबसे महंगी बार्बी। यह नीलामी न्यूयॉर्क में 2010 में हुई थी। 11.5 इंच लंबी यह बार्बी ब्लैक ईवनिंग ड्रेस में थी। इसके नेकलेस में एक कैरेट का पिंक डायमंड लगा था, जिसके आसपास व्हाइट डायमंड लगे हुए थे। इस बार्बी को मशहूर ऑस्ट्रेलियाई डिजाइनर स्टीफैनो कैन्टुरी ने डिजाइन किया था।

180 तरह का कॅरिअर रहा है : बार्बी अब तक करीब 180 तरह के कॅरिअर के रूप में बाजार में आ चुकी हैं। 2016 में यह राष्ट्रपति के लुक में आई थी, तो इससे पहले 1961 में नर्स, 1965 में अंतरिक्ष यात्री, 1999 में पायलट, 2015 में वैज्ञानिक आदि भी बन चुकी है।

9 करोड़ डॉल बिकती हैं हर साल : 9 करोड़ 45 लाख बार्बी डॉल औसतन हर साल बिकती हैं दुनियाभर में। वैसे अब 59 सालों में एक अरब 52 लाख से ज्यादा बार्बी बिक चुकी हैं। इनके लिए कंपनी ने अब एक अरब से ज्यादा कपड़े भी बेचे हैं।

ये 2 विवाद भी जुड़े रहे

1. दुनियाभर में बार्बी के फिगर को लेकर विवाद होता रहा है। बार्बी का फिगर अनरियलिस्टिक है। बच्चे इसे देखकर कम खाते हैं। पेंसलवेनिया स्टेट यूनवर्सिटी ने अपने रिसर्च में बताया कि जो बच्चियां जैसी डॉल से खेलती हैं वो वैसा ही बनना चाहती हैं। बार्बी से खेलने वाली बच्चियों को ईटिंग डिस्ऑर्डर का खतरा हो सकता है। एक ब्रिटिश स्टडी में भी ऐसा ही कहा गया है।

2. सऊदी अरब में वर्ष 2003 में बार्बी को बैन कर दिया गया था। बाद में इसे नैतिकता के लिए खतरा बताया गया। 2012 में इरान में पुलिस ने उस दुकानों को जबरदस्ती बंद कराया जो बार्बी डॉल बेच रहे थे।

स्रोत- फोर्ब्स, टाइम मैग्जीन, स्टैटिस्टा, स्टैटिस्टिक ब्रेन, गिनीज वर्ल्ड रेकॉर्ड्स और मीडिया रिपोर्ट्स।

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Web Title: जैकेट के शेष..
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