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पर्यूषण में शहर में नहीं जलती भट‌्टी, इसलिए गणेश चतुर्थी के लिए माहेश्वरी समाज हर साल बनाता है 2 हजार किलो लड‌्डू

Dainik Bhaskar

Sep 12, 2018, 05:36 AM IST

Pali News - जैन समाज के महापर्व पर्यूषण के दौरान रियासतकाल से शहर की मिठाई की दुकानों पर भट‌्टी नहीं जलती। यानी, प्रमुख मिठाई...

Pali - पर्यूषण में शहर में नहीं जलती भट‌्टी, इसलिए गणेश चतुर्थी के लिए माहेश्वरी समाज हर साल बनाता है 2 हजार किलो लड‌्डू
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जैन समाज के महापर्व पर्यूषण के दौरान रियासतकाल से शहर की मिठाई की दुकानों पर भट‌्टी नहीं जलती। यानी, प्रमुख मिठाई की दुकानें बंद ही रहती है, चाहे वह किसी भी समाज के व्यक्ति की हो। इधर, पर्यूषण पर्व के दौरान ही गणेश चतुर्थी आने के कारण भगवान गणेश को भोग लगाने माहेश्वरी महोत्सव समिति की ओर से हर साल 2 हजार किलो लड‌्डू, मोदक व काजूकतली बनाई जाती है, ताकि शहरवासी विघ्नहर्ता को भोग लगा सके। शहरवासियों को यह प्रसाद लागत दाम पर उपलब्ध कराया जाता है। इस साल भी समिति की ओर से सिंधी कॉलोनी स्थित सिंधी धर्मशाला में मोदक और लड्डू बनाने जा रहे हैं। लड्डू बनाने के लिए जोधपुर से कारीगरों को बुलाया गया है जो पूरे दिन काम करते हैं, ताकि शहरवासियों को प्रसाद समय पर वितरित किया जा सके। माहेश्वरी समाज की तरह शहर का अग्रवाल समाज भी यह पहल करता है। माहेश्वरी महोत्सव समिति के संस्थापक अध्यक्ष विमल मूंदड़ा ने बताया कि शुरुआत 500 किलो लड्डू से ही की। बाद में शहरवासियों की मांग बढ़ी तो अब 2 हजार किलो लड‌्डू,काजूकतली व मोदक बनाए जाते हैं। इस कार्य में समिति के मनीष बिडला, प्रदीप लाेहिया, कमलेश मणिधार, विनोद मोदी, बालगोपाल राठी, नवनीत तापडिय़ा, धर्मेश पंपालिया , राकेश बिडला, मनीष बागड़ी, ओम बिडला सहित कार्यकर्ता भी सहयोग कर रही हैं।

जोधपुर के चोहटे के दूध से बन रहे रबड़ी के लड्डू : गणेश भक्तों को रबड़ी के लड्डू उपलब्ध करवाने और अच्छा स्वाद उपलब्ध करवाने के लिए समिति के सदस्यों द्वारा जोधपुर स्थित चोहटे से स्पेशल दूध मंगवाया गया है। जिससे जोधपुर के ही कंदोइयों द्वारा मोदक, लड्डू और रबड़ी के लड्डू तैयार किए जा रहे हैं।



इसमें बादाम, पिस्ता का मिश्रण लड्डू के स्वाद को दुगुना कर रहा है।

पाली. माहेश्वरी समाज के युवा व महिलाएं तैयार प्रसाद की पैकिंग में सहयोग करते हैं। फोटो|भास्कर

भास्कर संवाददाता | पाली

जैन समाज के महापर्व पर्यूषण के दौरान रियासतकाल से शहर की मिठाई की दुकानों पर भट‌्टी नहीं जलती। यानी, प्रमुख मिठाई की दुकानें बंद ही रहती है, चाहे वह किसी भी समाज के व्यक्ति की हो। इधर, पर्यूषण पर्व के दौरान ही गणेश चतुर्थी आने के कारण भगवान गणेश को भोग लगाने माहेश्वरी महोत्सव समिति की ओर से हर साल 2 हजार किलो लड‌्डू, मोदक व काजूकतली बनाई जाती है, ताकि शहरवासी विघ्नहर्ता को भोग लगा सके। शहरवासियों को यह प्रसाद लागत दाम पर उपलब्ध कराया जाता है। इस साल भी समिति की ओर से सिंधी कॉलोनी स्थित सिंधी धर्मशाला में मोदक और लड्डू बनाने जा रहे हैं। लड्डू बनाने के लिए जोधपुर से कारीगरों को बुलाया गया है जो पूरे दिन काम करते हैं, ताकि शहरवासियों को प्रसाद समय पर वितरित किया जा सके। माहेश्वरी समाज की तरह शहर का अग्रवाल समाज भी यह पहल करता है। माहेश्वरी महोत्सव समिति के संस्थापक अध्यक्ष विमल मूंदड़ा ने बताया कि शुरुआत 500 किलो लड्डू से ही की। बाद में शहरवासियों की मांग बढ़ी तो अब 2 हजार किलो लड‌्डू,काजूकतली व मोदक बनाए जाते हैं। इस कार्य में समिति के मनीष बिडला, प्रदीप लाेहिया, कमलेश मणिधार, विनोद मोदी, बालगोपाल राठी, नवनीत तापडिय़ा, धर्मेश पंपालिया , राकेश बिडला, मनीष बागड़ी, ओम बिडला सहित कार्यकर्ता भी सहयोग कर रही हैं।

जोधपुर के चोहटे के दूध से बन रहे रबड़ी के लड्डू : गणेश भक्तों को रबड़ी के लड्डू उपलब्ध करवाने और अच्छा स्वाद उपलब्ध करवाने के लिए समिति के सदस्यों द्वारा जोधपुर स्थित चोहटे से स्पेशल दूध मंगवाया गया है। जिससे जोधपुर के ही कंदोइयों द्वारा मोदक, लड्डू और रबड़ी के लड्डू तैयार किए जा रहे हैं।



इसमें बादाम, पिस्ता का मिश्रण लड्डू के स्वाद को दुगुना कर रहा है।

महिलाएं भी लड्डू बनाने में कर रही सहयोग

विमल मूंदड़ा का कहना है कि लोगों को चतुर्थी पर विभिन्न प्रकार के लड्डू उपलब्ध हो सके, इसके लिए माहेश्वरी समाज की महिलाएं भी समिति के सदस्यों का पूरा सहयोग कर रही हैं। वे हर रोज सुबह घर का काम निबटा कर सिंधी धर्मशाला पहुंच जाती हैं तथा प्रसाद की पैकिंग करने में सहयोग करती है।

रियासतकाल में शुरू हुई थी परंपरा, अब तक निभा रहा शहर

जानकारों के अनुसार जैन समाज के पर्यूषण पर्व पर शहर में भट्टी चलाकर गर्म तैयार होने वाले खाद्य पदार्थों की दुकानें बंद रखने का निर्णय रियासतकाल से चला आ रहा है। इसका पालन आज भी शहर के लगभग सभी दुकानदार कर रहे हैं। चाहे वे किसी भी जाति- समाज के क्यों न हो।

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