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‘मंटो मेरे लिए फिल्म नहीं जिंदगी है’

‘मे रे लिए यह खुशी की बात है कि मैं इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में अपने देश को रीप्रेजेंेट कर रहा हूं और एक बार नहीं...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 17, 2018, 03:25 AM IST

‘मंटो मेरे लिए फिल्म नहीं जिंदगी है’
‘मे रे लिए यह खुशी की बात है कि मैं इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में अपने देश को रीप्रेजेंेट कर रहा हूं और एक बार नहीं लागातार कर रहा हूं। भारतीय सिनेमा के लिहाज से देखें, तो कान फिल्म फेस्टिवल में चुने जाने का फायदा यह होता है कि बाकी देश के लोगों को भी पता चलता है कि भारत में अच्छा सिनेमा बन रहा है। वरना, तो वे हमारे सिनेमा को बहुत कमतर समझते हैं। इस तरह जब हमारी फिल्में इंटरनेशनल फेस्ट में जाती हैं, तो उन्हें लगता है कि भारत में भी अच्छा काम हो रहा है।

नवाज इस फिल्म में उर्दू लेखक ‘मंटो’ के किरदार में दिखाई देंगे। इस किरदार की तैयारी के बारे में नवाज बोले... ‘मंटो जैसा दिखना-चलना, यह सब तो बहुत आसान था। मेरे हिसाब से मंटो जैसा दिखने में मेरा बड़ा योगदान नहीं है, इसका श्रेय मेकअप मैन को जाता है। उनकी चाल ढाल, बैठने का तरीका, वह सब तो कोई भी कर लेगा। मेरे हिसाब से जो मुश्किल काम होता है, वह है उनकी सोच को समझना और परदे पर उतार पाना।

मेरे लिए दिक्कत यह थी कि उनकी आत्मा को कैसे आत्मसात किया जाए? मैं कुछ ऐसा करना चाहता था कि डायलॉग बोलूं तो लगे कि मंटो बोल रहे हैं। मंटो को हमने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के दौरान पढ़ा था। उनकी कहानियों पर नाटक किए थे, लेकिन वह कैसे थे? उनकी सोच कैसी थी? यह फिल्म के दौरान मैनें जाना।

सबसे चुनौतीपूर्ण किरदार कौन सा रहा? यह पूछे जाने पर...

किसी और की जिंदगी में ढलना चुनौतीपूर्ण ही होता है, क्योंकि आप वो रियल में नहीं होते हैं सिर्फ बनने की कोशिश करते हैं। अब न तो मैं मंटो हूं, न बाला साहेब ठाकरे। ऐसे में, जब मैं मंटो, ठाकरे या मांझी बनने की कोशिश करूंगा, तो चुनौती होगी ही होगी। हीरो बनने में चुनौती नहीं होती है, वो तो हम साठ साल से एक ही तरह का देखते आ रहे हैं। चुनौती तब होती है, जब आप किसी और के किरदार में ढलने की कोशिश करते हैं। उस दूसरे इंसान को क्रिएट करना चुनौती होती है। मेरे लिए सभी किरदार चुनौतीपूर्ण हैं।

जब नवाज से पूछा गया कि इस तरह के फेस्टिवल में हमारी गिनती की ही फिल्में क्यों पहुंंच पाती हैं तो बोले...,

 इंटरनेशनल लेवल पर फिल्म पहुंचाने के लिए ईमानदारी की जरूरत होती है। ऐसे फेस्ट में वे ही फिल्में सराही जाती हैं, जो बहुत ईमानदारी से बनाई गई होती हैं। जिनका क्राफ्ट बहुत अच्छा होता है उन्हीं फिल्मों की तारीफ होती है। आप इधर-उधर से कॉपी करके फिल्में भेजेंगे, तो बात नहीं बनेगी।’

अब मुझे लगता है कि मंटो हर सच्चे आदमी में होता है। मंटो का रोल निभाकर लगा कि भले ही मैं एक किरदार के जरिए बोल रहा हूं, लेकिन मैं अपनी जिंदगी का सच बोल रहा हूं। मंटो मेरे लिए केवल एक फिल्म नहीं है, मंटो मेरे लिए जिंदगी है।

‘मे रे लिए यह खुशी की बात है कि मैं इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में अपने देश को रीप्रेजेंेट कर रहा हूं और एक बार नहीं लागातार कर रहा हूं। भारतीय सिनेमा के लिहाज से देखें, तो कान फिल्म फेस्टिवल में चुने जाने का फायदा यह होता है कि बाकी देश के लोगों को भी पता चलता है कि भारत में अच्छा सिनेमा बन रहा है। वरना, तो वे हमारे सिनेमा को बहुत कमतर समझते हैं। इस तरह जब हमारी फिल्में इंटरनेशनल फेस्ट में जाती हैं, तो उन्हें लगता है कि भारत में भी अच्छा काम हो रहा है।

नवाज इस फिल्म में उर्दू लेखक ‘मंटो’ के किरदार में दिखाई देंगे। इस किरदार की तैयारी के बारे में नवाज बोले... ‘मंटो जैसा दिखना-चलना, यह सब तो बहुत आसान था। मेरे हिसाब से मंटो जैसा दिखने में मेरा बड़ा योगदान नहीं है, इसका श्रेय मेकअप मैन को जाता है। उनकी चाल ढाल, बैठने का तरीका, वह सब तो कोई भी कर लेगा। मेरे हिसाब से जो मुश्किल काम होता है, वह है उनकी सोच को समझना और परदे पर उतार पाना।

मेरे लिए दिक्कत यह थी कि उनकी आत्मा को कैसे आत्मसात किया जाए? मैं कुछ ऐसा करना चाहता था कि डायलॉग बोलूं तो लगे कि मंटो बोल रहे हैं। मंटो को हमने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के दौरान पढ़ा था। उनकी कहानियों पर नाटक किए थे, लेकिन वह कैसे थे? उनकी सोच कैसी थी? यह फिल्म के दौरान मैनें जाना।

सबसे चुनौतीपूर्ण किरदार कौन सा रहा? यह पूछे जाने पर...

किसी और की जिंदगी में ढलना चुनौतीपूर्ण ही होता है, क्योंकि आप वो रियल में नहीं होते हैं सिर्फ बनने की कोशिश करते हैं। अब न तो मैं मंटो हूं, न बाला साहेब ठाकरे। ऐसे में, जब मैं मंटो, ठाकरे या मांझी बनने की कोशिश करूंगा, तो चुनौती होगी ही होगी। हीरो बनने में चुनौती नहीं होती है, वो तो हम साठ साल से एक ही तरह का देखते आ रहे हैं। चुनौती तब होती है, जब आप किसी और के किरदार में ढलने की कोशिश करते हैं। उस दूसरे इंसान को क्रिएट करना चुनौती होती है। मेरे लिए सभी किरदार चुनौतीपूर्ण हैं।

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