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गरिमा नष्ट करने वाला काम न करें

मनुष्य की गरिमा केवल पद-प्रतिष्ठा या जिस रूप में संसार उसे देखता है, उससे नहीं होती। किसी की गरिमा तो ऐसे आंकी जाती...

Bhaskar News Network | Last Modified - May 01, 2018, 03:30 AM IST

गरिमा नष्ट करने वाला काम न करें
मनुष्य की गरिमा केवल पद-प्रतिष्ठा या जिस रूप में संसार उसे देखता है, उससे नहीं होती। किसी की गरिमा तो ऐसे आंकी जाती है कि जैसे आप बाहर से दिखते हैं वैसे भीतर से हैं या नहीं? आदमी जब अपनी गरिमा से छेड़छाड़ करता है, गलत काम करता है तो संसार की अदालत फैसला सुनाती है। इस अदालत के अपने तरीके हैं दंड देने के। लेकिन ऊपर वाले की अदालत अलग ढंग से सजा देकर संभल जाने का अवसर देती है। रावण विश्वविजेता होकर ख्याति के चरम पर था, लेकिन उसने गरिमा खो दी थी। अनुचित कृत्य करते-करते भूल ही बैठा था कि नीचे की अदालत में न्याय भले ही देर से मिले पर ऊपर वाला तुरंत फैसले कर देता है। बात-बात में जब अंगद ने रावण के मुकुट गिरा दिए तो इस दृश्य पर तुलसीदासजी ने लिखा, ‘गिरत संभारि उठा दसकंधर। भूतल परे मुकुट अति सुंदर।। कछु तेहिं लै निज सिरन्हि संवारे। कछु अंगद प्रभु पास पबारे।।’ रावण गिरते-गिरते संभलकर उठा। मुकुट जमीन पर गिर पड़े। कुछ तो स्वयं ने उठाकर फिर सिर पर सजा लिए और कुछ अंगद ने रामजी के पास फेंक दिए। रावण के मुकुट गिरने का मतलब ही यह है कि अब समझ जाना चाहिए कि उसने अपने हाथों से अपनी गरिमा खंडित कर ली है। मुकुट गिरवाकर अंगद समझा रहे हैं कि अब तो संभल जाओ..। अब भी नहीं समझे तो नीचे की अदालत ही फैसला कर देगी। यहां हमारे लिए समझने की बात यह है कि कभी कोई ऐसा काम न करें, जिससे अपनी ही गरिमा खंडित हो जाए।

जीने की राह कॉलम पं. विजयशंकर मेहता जी की आवाज में मोबाइल पर सुनने के लिए टाइप करें JKR और भेजें 9200001164 पर



पं. िवजयशंकर मेहता

humarehanuman@gmail.com

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