‘फूड सोल्जर’ के साथ ‘ग्रीन सोल्जर’ भी जरूरी है!

Pali News - आज के दौर में जब वैश्विक स्तर पर सम्मान देने वाले लोग ऐसे ‘फूड सोल्जर्स’ को ढूंढ रहे हैं जो उन इलाकों के जरूरतमंदों...

Bhaskar News Network

Jun 18, 2019, 09:55 AM IST
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आज के दौर में जब वैश्विक स्तर पर सम्मान देने वाले लोग ऐसे ‘फूड सोल्जर्स’ को ढूंढ रहे हैं जो उन इलाकों के जरूरतमंदों के लिए आगे आ रहे हैं, जहां भूख अक्सर जिंदगी छीन लेती है। लेकिन, अब एक ऐसे आंदोलन की भी आहट सुनी जा रही है जो धीरे-धीरे ‘ग्रीन सोल्जर्स’ के साथ बढ़ रहा है, लेकिन अब तक इनकी ओर ज्यादा ध्यान नहीं गया था। पुण्य नगरी हरिद्वार का ही उदाहरण लीजिए, जहां आने वाले लोग प्रियजनों का अंतिम संस्कार करने के साथ उनकी स्मृति में पौधे रोपकर जा रहे हैं और उनकी बढ़ोतरी को एक मोबाइल ऐप की मदद से घर बैठे देख सकते हैं। रोपे गए पौधे की तस्वीरें एक तय अंतराल के बाद ऑनलाइन पोस्ट की जा रही हैं। स्थानीय वन विभाग ने इस प्रोजेक्ट के लिए वन क्षेत्र में एक विशेष ‘स्मृति वन’ भी बनाया है।

इस रविवार को यह कार्यक्रम गढ़वाल क्षेत्र में यहां के कमिश्नर बीवीआरसी पुरुषोत्तम ने शुरू किया। चमोली में इसका स्मारक पत्थर डिगोली वन पंचायत में, ऋषिकेश-बद्रीनाथ नेशनल हाई-वे पर बटोला में, देहरादून में ऋषिकेश-हरिद्वार बायपास पर, उत्तराकाशी में हॉर्टिकल्चर फार्म और रुद्रप्रयाग में रतूड़ा में स्थापित किया गया। इस कार्य में स्थानीय ग्रामीणों को विश्वास में लिया जा रहा है, ताकि रोपे गए पौधों की देखभाल सुनिश्चित हो सके। गंगा के किनारे वालो गांवों में बने संबंधित स्वयं सहायता समूहों और वन पंचायतों की जिम्मेदारी तय की गई है कि वे पौधों की सुरक्षा, देखभाल और पानी की व्यवस्था करें, साथ ही बीच-बीच में उनके फोटो ऑनलाइन अपडेट करते रहें। श्मशान घाट प्रबंधन समितियों से कहा गया है कि वे इस पर्यावरण-हितकारी काम को बढ़ावा दें, साथ ही अंतिम संस्कार और इससे जुड़े कामों के लिए हरिद्वार आने वाले लोगों को पौधे रोपने के लिए प्रेरित करें। हर एक पौधे की जिओ टैगिंग की गई है और उसकी जिओ लोकेशन को रोपने वाले के साथ शेयर किया जा रहा है। हरिद्वार में इस पूरे कार्य के लिए प्रति पौधा 2000 रुपए शुल्क लिया जा रहा है, जबकि अन्य जिलों में पौधे और उसकी देखभाल की दरें अलग-अलग हैं। एक क्षेत्र विशेष में हरियाली लाकर उसे ‘ग्रीन लंग्स’ में बदलने के लिए ये कमाल का आइडिया है।

अगर आप सोचते हैं कि ऐसा केवल हरिद्वार जैसे धार्मिक स्थानों पर ही संभव है तो आपको केरल के एक छोटे से कस्बे कोडुंगलुर से सीखना चाहिए, जहां बनने वाली हर नई बिल्डिंग के लिए स्थानीय फलदार पौधे लगाना अनिवार्य कर दिया गया है। नियम ऐसा बनाया गया है कि ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट (ओसी) पौधे लगाने के बाद ही मिलेगा और इसके बिना आप उस बिल्डिंग में नहीं रह सकते। प्रशासन ने बीते 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस पर यह नया नियम लागू किया है। वर्तमान में ये नियम सिर्फ नई बिल्डिंग, व्यावसायिक या रहवासी निर्माण के लिए लागू किया गया है। नियमानुसार स्थानीय आबोहवा में अच्छी तरह पनपने वाले कटहल, आम और नारियल लगाने को मंजूरी दी गई है। अभी 1500 वर्गफीट वाले हर एक घर में दो फलदार पौधे लगाने का नियम है और प्लॉट का साइज बढ़ने के साथ पौधों की संख्या भी बढ़ जाएगी। निर्माण कार्य पूरा होने के बाद एक रिपोर्ट देनी होगी जिसमें बताना होगा आपने पौधे कहां लगाए हैं। अन्यथा, स्थानीय प्रशासन आपको ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट या बिल्डिंग नंबर नहीं देगा। चूंकि केरल नगर पालिका भवन नियम 1999 में इस तरह का कोई प्रावधान नहीं है और इसलिए यहां के प्रशासन ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर इस नियम के लिए जरूरी संशोधन करने के साथ इसे पूरे राज्य में लागू करने की मांग की है। अच्छी बात यह है कि इस कानून के बिना भी लोग हरियाली के महत्व को समझ रहे हैं और अपनी इच्छा से पौधे रोपने के लिए तैयार हैं।





फंडा यह है कि  ‘फूड सोल्जर’ के साथ हमें ‘ग्रीन सोल्जर’ भी चाहिए जो खाने की पैदावार बढ़ाने में मददगार हैं! इन दोनों को बढ़ावा दीजिए, उनकी हिम्मत बढ़ाइए।

मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन की आवाज में मोबाइल पर सुनने के लिए 9190000071 पर मिस्ड कॉल करें

एन. रघुरामन

मैनेजमेंट गुरु

[email protected]

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