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63% लोगों के पास सवा एकड़ से भी कम खेती की जमीन श्रीनगर में मुंबई जैसी महंगी तो अनंतनाग में सबसे सस्ती

Bhaskar News Network

Aug 11, 2019, 06:50 AM IST
Bar News - rajasthan news 63 of the people have less than 125 acres of cultivated land in srinagar as expensive as mumbai and cheapest in anantnag

भास्कर न्यूज |श्रीनगर

5 अगस्त को संसद में गृहमंत्री अमित शाह द्वारा धारा 370 के प्रावधान बदलने अौर 35-ए को हटाने की घोषणा करते ही जम्मू-कश्मीर की जमीन को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। इसका कारण है कि अब देश का कोई भी नागरिक कश्मीर में जमीन खरीद सकता है। ऐसे में भास्कर ने राज्य की 2.22 लाख वर्ग किमी जमीन की पड़ताल की। इसमें कई रोचक बातें निकलकर सामने आईं। जैसे- यहां के 63 फीसदी लोगों के पास अाधा हेक्टेयर या इससे कम खेती की जमीन (करीब सवा एकड़) है। यही नहीं राज्य में केवल 95 लोग ऐसे हैं, जिनके नाम 20 या इससे अधिक हेक्टेयर खेती योग्य जमीन है। वहीं, अगर दाम की बात करें तो जम्मू-कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में जमीनें सबसे महंगी हैं। यहां कीमतें मुंबई और गुड़गांव जैसे शहरों से कम नहीं हैं। रेजिडेंसी रोड पर 1500 वर्ग फीट क्षेत्र के लिए कमर्शियल किराया करीब डेढ़ लाख रुपए प्रति माह तक है। जो मुंबई के गोरेगांव जैसे इलाके के बराबर है। वहीं, एक कनाल में बने ठीक-ठाक से घर की कीमतें भी तीन से 5 करोड़ रु. तक हैं। एक कनाल में 5445 वर्ग फीट होता है। अब जम्मू की बात करें तो यहां एक अच्छी रिहायशी कॉलोनी में जमीन औसतन 80 लाख से दो करोड़ रु. प्रति कनाल है। गांधीनगर सबसे प्रीमियम कॉलोनी है जहां जमीन का सर्किल रेट सवा करोड़ रुपए है। एक कनाल प्लॉट की कीमत 4 करोड़ रुपए तक है। यहां सांबा में जहां एम्स व सेंट्रल यूनिवर्सिटी है, वहां कीमतें सबसे ज्यादा बढ़ने की उम्मीद है। वहीं, आतंक से प्रभावित अनंतनाग में जमीन सस्ती है। अनंतनाग जिले के चेक हुसैनाबाद जैसे रिहायशी क्षेत्र में 5.20 लाख रुपए प्रति कनाल जमीन की कीमत है। यानी 95.5 रुपए वर्ग फीट। शेष | पेज 6 पर

यहां शहरी क्षेत्र की कॉलाेनियों में प्रति कनाल 15 से 26 लाख तक का सर्किल रेट है। जम्मू-कश्मीर में कुल 36.03 लाख इमारतें हैं। इनमें 3.04 लाख इमारतें वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार खाली थीं। जम्मू-कश्मीर में कुल रिहायशी मकान 18.27 लाख हैं। वहीं दुकानों और ऑफिसों की संख्या 3.39 लाख है।

पढ़िए जम्मू-कश्मीर की कितनी जमीन में क्या-क्या है, साथ ही नेताओं के पास कितनी जमीन है

खास कश्मीरियों की स्थिति

फारुख अब्दुल्ला (एनसी)

10.60 करोड़ है जमीन की मार्केट वैल्यू। 1.12 एकड़ खेती की जमीन। दो मकान भी।


गुलाम नबी आजाद (कांग्रेस)

1.97 करोड़ की महाराष्ट्र में खुद की जमीन व प|ी का कश्मीर में जमीन-घर।


मो. अकबर लोन (एनसी)

59.60 करोड़ की मार्केट वैल्यू है जमीन की। बारामूला सांसद का 3600 वर्ग फीट का घर।


जम्मू-कश्मीर में धारा 370 के प्रावधान बदलने और 35-ए हटने के बाद सबसे ज्यादा चर्चा यहां की जमीन को लेकर है। ऐसे में पहली बार भास्कर आपको बता रहा है कि आखिर यहां किसके पास कितनी जमीन है, उसकी कीमत क्या है और ऐसी ही अन्य महत्वपूर्ण जानकारियां।

महबूबा मुफ्ती (पीडीपी)

55 लाख की कुल मार्केट वैल्यू वाली संपत्ति है। 2019 के चुनावी शपथ-पत्र में बताई।


कर्ण सिंह (कांग्रेस)

95.21 करोड़ की जमीन-घर की मार्केट वैल्यू है। राज्यसभा चुनावी शपथ-पत्र में।


इरफान रज़ा (पीपुल्स काॅफ्रेंस)

59.20 करोड़ की कुल मार्केट वैल्यू। 22 हजार वर्ग फीट की कमर्शियल इमारत।


कुल जमीन

2 लाख 22 हजार 236 वर्ग किमी

(78,114 वर्ग किमी जमीन पीओके में है, 5180 वर्ग किमी जमीन अवैध रूप से पाकिस्तान ने चीन को दी है और 37,555 वर्ग किमी जमीन पर अवैध रूप से चीन ने लेह में कब्जा कर रखा है)

कुल वन क्षेत्र

6.59 लाख

हेक्टेयर था वर्ष 2016-17 में

3.04 लाख

हेक्टेयर में खेती नहीं होती थी।

आम कश्मीरियों की स्थिति



जमीन (हेक्टेयर में) लोगों की संख्या हिस्सेदारी








कुल योग 14.49 लाख 100%

कितने में होती हैं फल-सब्जियां

3.32 लाख

हेक्टेयर कुल क्षेत्र में होती हैं फल और सब्जियां। जिसमें से सर्वाधिक 1.65 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सेब के बागान हैं।

56 हजार एकड़ पर रक्षा से जुड़े काम

जम्मू और कश्मीर राज्य में कुल 56 हजार 615 एकड़ भूमि पर रक्षा विभाग और इससे संबंधित विंग्स संचालित हो रहे हैं। इसके लिए पिछले तीन सालों में केंद्र सरकार ने भूमि मालिक या राज्य सरकार को किराए के रूप में 134 करोड़ रुपए चुकाए हैं। यह जानकारी रक्षा राज्यमंत्री श्रीपद नायक ने लोकसभा में इसी वर्ष दी थी।

इनपुट: मोहित कंधारी, स्रोत: जम्मू-कश्मीर आर्थिक एवं सांख्यिकी निदेशालय, कश्मीर वानकीय निदेशालय, सेंसस 2011, एडीआर, माई नेता एवं अन्य विशेषज्ञ।

20 हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि वाले किसानों में सर्वाधिक जम्मू से हैं। जम्मू में ऐसे 21 लोग हैं जिनके नाम 20 हेक्टेयर से ज्यादा कृषि भूमि है।

85 हजार

हेक्टेयर क्षेत्र में अखरोट लगते हैं। वहीं 5588 हेक्टेयर क्षेत्र में बादाम होता है। (आंकड़े 2018-19 के)

उन कश्मीरी पंडितों की कहानी जिन्होंने कभी जमीन नहीं छोड़ी

धर्मेन्द्र सिंह भदौरिया|श्रीनगर

कश्मीर में वर्ष 1989 के अंत से हालात खराब होना शुरू हुए। मेरे दादा सामाजिक कार्यकर्ता एचएन वांचू कभी कश्मीर छोड़कर नहीं जाना चाहते थे। वे कहते थे सुरक्षा देनी है तो यहीं दो, जम्मू नहीं जाएंगे। लेकिन जमियत उल मुजाहिदीन के 11 लोगों ने 5 दिसंबर 1992 को उनकी हत्या कर दी। कई बार हम पर घर छोड़ने का दबाव बना, लेकिन हम नहीं गए। मैंने श्रीनगर मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस किया और अभी यहीं कारोबार कर रहा हूं। उस वक्त सरकारी तंत्र, मुख्य धारा वाले नेता या अलगाववादी किसी ने भी सही कार्य नहीं किया। उक्त बात करते हुए डॉ. अमित वांचू कहते हैं कि 370 हटाने के बाद क्या हालात बनेंगे, कह नहीं सकते। वैसे हमें यहां बहुसंख्यक कश्मीरी मुसलमानों के साथ रहने में कोई दिक्कत नहीं है।

कश्मीर में धारा 370 के विशेष प्रावधान खत्म होने के बाद देश के शेष भाग के लोगों के कश्मीर में प्रॉपर्टी खरीदने या बसने के दरवाजे खुल गए हैं। ऐसे में कभी कश्मीर न छोड़ने वाले कश्मीरी पंडितों ने कितने विपरीत हालातों का सामना किया? इस संबंध में डाउन टाउन जैसे संवेदनशील क्षेत्र में रहने वाले और कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति के प्रेसिडेंट संजय टिकू कहते हैं कि 31 दिसंबर 1989 को कश्मीर में 77,264 परिवार थे, हमारे सर्वे में सामने आया कि सिर्फ 808 कश्मीरी पंडितों के परिवार 292 स्थानों में 2008 से 2010 के बीच रह रहे थे। अशोक कहते हैं कि हालात तो खराब थे ही। मार्च 1990 में एक दिन सुबह नींद खुली तो देखा हमारे कजिन बिना बताए रात में ही जम्मू चले गए, लेकिन हम नहीं गए। जून 1990 में हमारे घर पोस्टर लगा दिया गया। उर्दू में लिखा था कि सात दिन में घर खाली कर दो। और सबसे नीचे अलबदर कमांडोस लिखा था। कई और लोगों के घरों पर भी ऐसे ही पोस्टर लगे थे, लोग घर छोड़ने लगे। लेकिन मैं गया नहीं और उस लेटर को श्रीनगर टाइम्स में छपवाया। फिर 1990 में ही मुझे मारने के लिए लोग आए। 1994 में मेरे ऊपर पिस्टल रखकर मुझे धमकाया। वे याद करते हुए कहते हैं कि फिर एक बार मई 1995 में दुकान से मेरे जाने के बाद आईबी एजेंट कहां है? यह पूछने दो लोग आए। अगले दिन जब मैं दुकान पर पहुंचा तो लोग इकट्‌ठे हो गए। मैं अगले 15 दिन तक दुकान नहीं गया, दोस्त मीर करामात के पास जाता था।

शेष | पेज 6 पर



संजय ने बताया कि श्रीनगर में 95 फीसदी कश्मीरी पंडितों ने मकान बेच दिए हैं। धारा 370 के विशेष प्रावधान हटने पर वे कहते हैं कि यह इस तरह नहीं हटाए जाने चाहिए थे। हो सकता है कि एक बार फिर से हालात खराब हो जाएं। जो कश्मीरी पंडित घाटी छोड़कर गए, उनमें सुरेंद्र काचरू भी थे। एयर इंडिया के सेंटोर होटल में इंजीनियर सुरेंद्र कहते हैं कि 1988 में मेरा ट्रांसफर मुंबई हो गया। हमारा घर नैरीपुरा, रामबाग में था। दो-तीन साल बाद हमें पता चला कि हमारा घर जला दिया गया है। फिर हमने उसे बेच दिया। 2013 में रिटायर होने के बाद हमने रावलपुरा में दो घर बनाए और रह रहे हैं।

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