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बादशाह-बीरबल की खर्ची : दूधाे नहाअाे पूताे फलाे से शुरू हुई, हर्षद मेहता ने कराेड़ाें तक पहुंचाई, अब अरबाें में बंटी
बरसाें से चली अा रही बादशाह की सवारी की शुरुअात दूधाे नहाअाे पूताे फलाे, अधिकारी बनाे, नाम कमाअाे, खूब व्यापार बढ़े, बंगला बने जैसी खुशहाली की कामना के साथ शुरू हुई। पैसाें की कीमत बढ़ी ताे खर्ची हजाराें में पहुंची, हर्षद मेहता घाेटाला के बाद 2002 में कराेड़ाें में अाैर बुधवार काे निकली ताे बादशाह, शहजादा अाैर बीरबल की जुबां से अरबाें में ही अावाज सुनाई दी। धानमंडी चौक में नगर सेठ नाथूरामजी (इलोजी) की प्रतिमा के समक्ष आरती कर परंपराओं के अनुसार पुरानी कचहरी परिसर में शहरवासियों को बंद मुट्ठी से खर्ची बांटी। शाही सवारी के शहरभर में घूमकर वापस धानमंडी पहुंचने पर बादशाह को गुप्त गली में कथित तौर पर शाही खजाना लुटाने के आरोप में थोड़ी देर के लिए कैद किया गया। बाद में उन्हें ससम्मान लोक व फाग गीत गाते हुए उनके घर तक पहुंचाया गया। जयकिशन बजाज के अनुसार यह परंपरा दशकों से चली आ रही है।
बादशाह, शहजादा ब्यावर से अाए, बीरबल काे पुष्करणा समाज ने तैयार किया : पुष्करणा समाज द्वारा मयंक बाेहरा को बीरबल बनाया गया। माहेश्वरी समाज की आेर से आनंद माहेश्वरी को शहजादा व अग्रवाल समाज द्वारा रमेशचंद्र बंसल को बादशाह बनाया गया। बीरबल पाली का युवक बना अाैर बादशाह व शहजादा हर बार की तरह इस बार भी ब्यावर से बुलाया गया। अग्रवाल समाज के न्याति नाेहरे में समाज द्वारा ठंडाई वितरित हुई अाैर बादशाह की शान में गीत गाए। शहजादे व बादशाह काे धानमंडी में तैयार किया गया जबकि शंकर भासा के नाेहरे में बीरबल काे पुष्करणा समाज के पंचाें के नेतृत्व में तैयार किया गया। 75 साल पहले इसी नाेहरे से समाज के पहचान बाबा बीरबल बनकर जाते थे।
इन दाे फाेटाे से समझिए बढ़ती बादशाह की खर्ची का गणित
शाही खजाने से खर्ची बांटने के आरोप में बादशाह-शहजादे को किया सांकेतिक रूप से कैद, बीरबल ने जाकर छुड़ाया
2002 : दिलीप कुमार जाेशी बीरबल बने है। वे बताते है कि हर्षद मेहता ने 1992 में शेयर घाेटाला किया, माैत 2001 में हुई ताे मामला वापस उछला। 2002 में मैं बीरबल बना ताे कराेड़ाें में खर्ची बांटी। इससे पहले लाखाें रुपए में ही थी।
1984 : फाेटाे में मदन लाेहरा बीरबल बने है। उन्हाेंने बताया कि उस समय पैसाें का ज्यादा महत्व नहीं था। अधिकांश खर्ची दूधाे नहाअाे पूताे फलाे, अधिकारी बनाे, नाम कमाअाे, खूब व्यापार बढ़े जैसी खुशहाली की कामना के रूप में ही दी जाती थी। बाद में हजाराें में शुरुअात हुई।
यह है मान्यता
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इस परंपरा के पीछे एक कहानी प्रचलित है। कहानी के अनुसार एक बार बादशाह अकबर शिकार के लिए जंगल में गया तो डाकुओं से सामना हो गया। अकबर संकट में फंस गया, लेकिन तभी उसके साथ चल रहे सेठ टोडरमल अग्रवाल ने न केवल अकबर की जान बचाई बल्कि माल भी लुटने नहीं दिया। इससे खुश होकर अकबर ने ढाई दिन के लिए सेठ टोडरमल अग्रवाल को मुगल सल्तनत का बादशाह बना दिया। तभी से यह परंपरा चली आ रही है। टोडरमल को ढाई दिन के लिए बादशाह बनाने की खबर जब बीरबल को मिली तो वह खुशी से झूम उठे। इसलिए बादशाह की सवारी के आगे बीरबल के प्रतीक के तौर पर ब्राह्मण समुदाय के व्यक्ति को रखा जाता है। सवारी शुरू होने से पहले बीरवल बादशाह को सलाम करता है। इसी परंपरा का निर्वहन पाली और ब्यावर में भी किया जा रही।
अमीर-गरीब, महिलाएं बच्चे सभी खर्ची के लिए हाथ उठाए खड़े थे। पूर्व विधायक भीमराज भाटी ने कुर्ते की झाेली बना ली। ज्यादा खर्ची अाई ताे लाेगाें ने उनसे निवेदन करके झाेली से ली। अंत में गुलाल खत्म हुई ताे भाटी ने कपड़े झटककर अपनी खर्ची कागज में बांधी।
...और इस खर्ची की महत्ता देखिए
ये इतिहास भी जानिए
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60 साल पहले पालकी में निकलती थी सवारी
पहले मुफ्तलाल बजाज ताे अब अग्रवाल समाज की अाेर से सवारी का नेतृत्व करने वाले जयकिशन बजाज पिछले 60 सालाें से पालकी देख रहे हैं। वे बताते हैं कि पहले पालकीनुमा तख्त पर बादशाह व शहजादे बैठते थे। गैस की बत्तियाें की राेशनी में सवारी निकाली जाती थी। पहले कुम्हाराें के बास से हाेकर भी गुजरती थी। अब ट्रैक्टर पर निकलने के कारण इसे बंद कर दिया गया।
गांवशाही गैर के दिन ही निकलती थी सवारी
पुष्करणा ब्राह्मण समाज के मदन लाेहरा, अाेमप्रकाश व्यास व लक्ष्मीकांत कल्ला ने बताया कि पहले गांवशाही गैर के प्यारा चाैक से पास हाेने के बाद ही बादशाह की सवारी निकाल दी जाती थी। 1960 विवाद के कारण 7 दिन तक गैर रुकी रही। इसके बाद से धुलंडी के दूसरे दिन सवारी निकाली जाने लगी।
पाली. अग्रवाल समाज की अाेर से बने बादशाह के तख्त पर सवार हाेने से पहले ही लाेगाें में खर्ची लेने की हाेड़ मच गई। फोटो| भास्कर