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गहन ज्ञान में दिल जीतने की ताकत होती है!

2 वर्ष पहले
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26 दिसंबर 2012 का दिन था। वे लाल रंग की पोलका डॉट वाली रेशमी साड़ी में डायस पर खड़ी थीं। उन्होंने साड़ी के रंग की बड़ी सी बिंदी लगाई थीं। उस दिन वे साउथ इंडियन एजूकेशन सोसायटी द्वारा प्रदान किए जाने वाले श्री चंद्रशेखरानंद सरस्वती नेशनल एमिनेन्स अवॉर्ड लेने पहुंची थीं। उस दिन मुंबई के मशहूर शणमुखानंद ऑडिटोरियम में कांची पीठ के स्व. शंकराचार्य श्रीजयेंद्र सरस्वती की गरिमामय उपस्थिति में उनके साथ अभिनेता अमिताभ बच्चन, टेक्नोलॉजी के विशेषज्ञ सैम पित्रोदा और चिन्मय मिशन के स्वामी तेजोमयानंद को भी यह सम्मान दिया जा रहा था। यह सम्मान उन्हें जनसेवा और नेतृत्व के लिए दिया जा रहा था, जिसमें प्रशस्ति पत्र, बड़ी-सी दीपमाला और ढाई लाख रुपए का नकद पुरस्कार शामिल था।

उस दिन वे मेरे पसंदीदा कलाकार अमिताभ बच्चन के ठीक बगल में खड़ी थीं। वहां सामने की कतार में बैठा, मैं सोच रहा था कि आज उनका कद इस 6.2 फीट लम्बे महानायक से ऊंचा लग रहा है। ऐसा इसलिए था, क्योंकि मैं इससे पहले कभी ऐसे किसी नेता से नहीं मिला था जो इतनी शुद्ध संस्कृत बोलने की क्षमता रखता है। अपने भाषण में उन्होंने संस्कृत की महत्ता का उल्लेख करते हुए रावण विजय के लिए पहुंचे राम द्वारा की गई भगवान शंकर की स्तुति का उल्लेख किया जो रूद्राष्टकम के रूप में श्रीरामचरितमानस में समाविष्ट की गई है, जो इस प्रकार है- ‘नमामीशमीशान निर्वाण रूपं, विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदः स्वरूपम्‌ । निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं, चिदाकाश माकाशवासं भजेऽहम्‌’॥ इसके उपरांत कुछ ही क्षणों में उन्होंने अपना स्वर बदला और हमसे कहा, ‘क्या आप जानते हैं उसी समय रावण ने भी राम पर विजय प्राप्ति के लिए भगवान शंकर की अर्चना की थी, जो उसने स्वयं रची थी और “शिव तांडवस्रोतम” में समाविष्ट है। उसके शब्द इस प्रकार हैं- ‘जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् । डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्…’

बिना कोई कागज में देखे वे धाराप्रवाह एक के बाद एक श्लोक बोलतीं गईं। उन्होंने समझाया कि तांडवस्रोतम में रावण का घमंड, जबकि रूद्राष्टकम में राम का समर्पण स्पष्ट रूप से नज़र आता है। उन्होंने कहा कि प्राचीन काल में संस्कृत वास्तव में एक ‘जन भाषा’ थी और फिर राजा भोज और एक लकड़हारे की कहानी सुनाते हुए बताया कि कैसे राजा भोज के गलत संस्कृत उच्चारण को एक लकड़हारे ने शुद्ध किया था। अपने भाषण में उन्होंने बताया कि विश्व में संस्कृत एकमात्र ऐसी भाषा है जो ‘टॉकिंग कम्प्यूटर’ की सभी जरूरतों को पूरा करती है। फिर उन्होंने संस्कृत की उपयोगिता को व्याकरण और उसके उच्चारण के दर्जनभर उदाहरणों से समझाया। उन्होंने पूरी सम्मान राशि संस्थान को इस विनती के साथ लौटा दी कि आप इसका इस्तेमाल संस्कृत भाषा को बढ़ावा देने के लिए कीजिए।

उन्होंने अपने भाषण से वहां मौजूद हर एक व्यक्ति के साथ तादाम्य स्थापित किया। उनका शब्द चयन अमिताभ की तरह बेहद कुशल था। पित्रोदा को उन्होंने टेक्नोलॉजी और कम्प्यूटर के माध्यम से छुआ, धर्मगुरु उनकी आस्था से प्रभावित थे और बाकी मौजूद हजारों लोगों के मन को छूने के लिए उनकी मौलिक कहानियां पर्याप्त थीं। वे और कोई नहीं सुषमा स्वराज थीं, जो सार्वजिनक जीवन में गरिमा, साहस और निष्ठा की प्रतीक थी और मंगलवार की रात 67 वर्ष की आयु में भौतिक शरीर छोड़कर चली गईं। अब मैं जब भी कभी संस्कृत शब्द से रूबरू होता हूं, तो मुझे उनका स्मरण हो आता है। सुषमा स्वराज ने मेरे अंदर संस्कृत के प्रति ठीक वैसा ही प्रेम जगाया, जैसा मेरी इतिहास की शिक्षक ने मेरे अंदर उस विषय के लिए पैदा किया था।





फंडा यह है कि  किसी भी विषय का गहन ज्ञान दिलों को जीतने और कई चुनौतियों का मुकाबला करने की शक्ति प्रदान करता है।

एन. रघुरामन

मैनेजमेंट गुरु

raghu@dbcorp.in

एन. रघुरामन

मैनेजमेंट गुरु

raghu@dbcorp.in

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