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महिला की वेदना को परदे पर लाने वाली महिला फिल्मकार

एक वर्ष पहले
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अधिकांश फिल्में पुरुष पात्र को केंद्र में रखकर बनाई जाती हैं। कुछ फिल्मों में महिला केंद्रीय पात्र होती हैं। पुरुष केंद्रित फिल्मों में भी नायिका ही नायक को संघर्ष करने के लिए प्रेरित करती हैं। इसी तरह अधिकांश फिल्में पुरुष द्वारा निर्देशित की जाती हैं। महिलाओं द्वारा निर्देशित फिल्मों की संख्या अपेक्षाकृत कम है। भारत ही नहीं पूरे विश्व के सिनेमा में ऐसा ही होता आया है। दरअसल इस असमानता की जड़ें बहुत गहरी पैठी हुई हैं। मात्र शिकार युग में ही स्त्री पुरुष समानता मौजूद रही है। इतना ही नहीं स्त्री का निशाना अचूक होता था और अधिक चपल। शायद शिकार युग में महिला पुरुषों से अधिक सफल होती थीं। दरअसल प्रकृति ने महिला को पुरुष से अधिक शक्तिशाली बनाया है। भाषा शास्त्र में भी प्रकृति स्त्रीलिंग ही है, परंतु हमारे सामाजिक व्यवहार के वार्तालाप में महिला को कमजोर माना जाता है। इसलिए लेडीस फर्स्ट नामक भ्रामक रिवाज जारी है कि पहले उन्हें जगह दी जाए। तथाकथित शिष्टाचार भी हम पुरुषों के दोहरे मानदंड को छुपा नहीं पाते।

फिल्म शूटिंग के समय निर्देशक ही आज्ञा देता है और पुरुष तकनीशियनों को स्त्री से आज्ञा लेना सुहाता नहीं है। पटकथा लिखे जाने के समय भी पुरुष सृजन का मुखिया होता है। जब हॉलीवुड में ‘किंग कॉन्ग’ पटकथा पर विचार हो रहा था तब पूंजी निवेशक को यह बात हजम नहीं हो रही थी कि इस भव्य बजट की फिल्म में कोई प्रेम कथा नहीं है। एक स्त्री सहायक ने ही सुझाव दिया कि वनमानुष शिकार दल की एक सदस्या से प्रेम करने लगता है। ‘किंग कॉन्ग’ कई बार बनाई गई है और उसमें निहित प्रेम कथा के कारण ही दर्शक उसे पसंद करता रहा है। भारतीय सिनेमा की पहली महिला निर्देशक नरगिस की मां जद्दनबाई हुई हैं और उनसे प्रारंभ सिलसिला अब जोया अख्तर तक आ पहुंचा है। जिनकी ‘गली बॉय’ पुरस्कार प्राप्त कर रही है। असफल अभिनेता कामरान की पुत्री फराह खान पहले नृत्य निर्देशक बनीं, बाद में शाहरुख खान अभिनीत ओम शांति ओम से उन्होंने निर्देशन प्रारंभ किया। फराह खान ने अपनी फिल्मों को मर्दाना फिल्में कहा, जबकि फिल्मों में कोई लिंग भेद नहीं होता। फिल्में या तो मनोरंजक होती हैं या उबाऊ। फिल्मों का कोई अन्य प्रकार का विभाजन करना गलत है, क्योंकि घटिया फिल्मों में भी कुछ सारगर्भित बातें होती हैं और संजीदा फिल्मों में ‘जंगल में मोर नाचा किसने देखा’ तथा ‘मालिश तेल मालिश...सर जो तेरा चकराए’ जैसे गीत होते हैं।

हाल ही में नंदिता दत्ता की किताब ‘एक रेटेड’ जारी हुई है, जिसमें अपर्णा सेन, मीरा नायर, शोनाली बोस, फराह खान, तनुजा चंद्रा, नंदिता दास, अंजली मेनन, किरण राव और अलंकृता श्रीवास्तव जैसी महिला निर्देशकों के काम का विवरण प्रस्तुत किया गया है। इस किताब में फिल्मकारों से लिए गए साक्षात्कार का समावेश भी है। इस किताब के प्रकाशित होने के कई वर्ष पूर्व 1998 में निर्मला बुराड़िया ने महिला फिल्मकारों से पर एक किताब लिखी थी। नंदिता दास की किताब में छूटे फिल्मकारों का विवरण निर्मला बुराड़िया की किताब में है। जैसे सई परांजपे, अरुणा राजे, कल्पना लाजमी, प्रिया दत्त इत्यादि।

फिल्म की शूटिंग में फिल्मकार द्वारा ‘एक्शन’ बोले जाने पर कलाकार दृश्य अभिनीत करते हैं और ‘कट’ बोलने पर कैमरा रुक जाता है। गौरतलब है कि एक्शन की कमान औरत के अधिकार में होती है तो यूनिट के पुरुष सदस्यों को अटपटा लगता है, क्योंकि सदियों से वे ही ‘एक्शन’ बोलते रहे हैं और ‘कट’ पर तो वे अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते रहे हैं। हिटलर के दौर में उसकी प्रिय फिल्मकार लेनी रीफेन्स्टाल थीं। उनकी एक फिल्म में हिटलर द्वारा जन समूह को किए गए संबोधन को प्रस्तुत किया गया था। पहले ही शॉट में सूर्य हिटलर के सिर के पीछे है और हिटलर की लंबी परछाई पूरे जनसमूह पर पड़ती है। उसके आगमन पर दुदुंभी बजाने वाले सक्रिय हो जाते हैं। आजकल कैमरे इतने करामाती हो गए हैं कि एक लेंस के उपयोग से 5000 की भीड़ को 50,000 की भीड़ दिखाया जा सकता है। इस तरह के समारोह का टेलीविजन पर प्रसार होता है तो छद्म लोकप्रियता का भ्रम होता है। एक दौर ऐसा भी था जब कुछ देशों की प्रमुख महिलाएं रहीं, जैसे श्रीमती इंदिरा गांधी, लंका में सिरिमावो भंडारनायके, इंग्लैंड में मार्गरेट थैचर। यह भी गौरतलब है कि काल्पनिक जेम्स बॉन्ड जिस संस्था के लिए काम करता है उस संस्था की प्रधान भी एक महिला ही है।

फिल्मकार आर बाल्की की प|ी श्रीमती गौरी शिंदे ने श्रीदेवी अभिनीत फिल्म ‘इंग्लिश विंग्लिश’निर्देशित की थी। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर खूब सफल रही और समालोचकों ने भी इसे पसंद किया। महिला फिल्मकार अत्यंत संवेदनशील होती हैं। ‘इंग्लिश विंग्लिश’ के एक दृश्य में यह प्रस्तुत किया गया है कि नायिका का दर्द उसके अपने पति और बच्चे नहीं समझ सकते, परंतु हजारों मील दूर रहने वाली एक रिश्तेदार समझ जाती है। निदा फ़ाज़ली की कविता है ‘मैं रोया परदेस में भीगा मां का प्यार, दिल ने दिल से बात की बिन चिट्ठी बिन तार’। संवेदनाएं फासलों को पार कर देती है। कभी-कभी सबसे बड़ी दूरी बेहद नज़दीकियों के बीच होती है। ग्वालियर के कवि पवन करण के सारे रचना संसार का केंद्र औरतें हैं। उन्होंने शोध करके पुरातन ग्रंथों में उन नारी पात्रों का दर्द प्रस्तुत किया है जो ग्रंथकार द्वारा उपेक्षा का शिकार रही थीं। पवन कारण के ‘स्त्री शतक’ के दो खंड प्रकाशित हुए हैं। इनमें 450 महिलाओं की वेदना का चित्रण है। पाकिस्तान की सारा शगुफ्ता की एक नज्म की तरह है- ‘औरत का बदन ही, उसका वतन नहीं होता, वह कुछ और भी है। पुरुष इच्छाओं की पतंग उड़ाते हैं, स्त्री आकाश ही नहीं कुछ और भी है।’ पाकिस्तान का पुरुष समाज सारा शगुफ्ता से इतना भयभीत था कि उसे पहले पागल करा दिया गया, फिर कत्ल किया गया जिसे आत्महत्या करार दिया गया।

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जयप्रकाश चौकसे

फिल्म समीक्षक
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