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इतिहास साक्षी: 37 साल की उम्र में भगवान महावीर ने नाणा से किया था अबुर्दांचल में प्रवेश

Bhaskar News Network

Apr 17, 2019, 09:26 AM IST

Pali News - भगवान महावीर के विहार को लेकर सबसे अधिक प्रमाण सिरोही और इसके बाद पाली में मिलते हैं। पाली के आबू प्रदेश में...

Pali News - rajasthan news history witness at the age of 37 lord mahavir had done with nana in aburdhanchal
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भगवान महावीर के विहार को लेकर सबसे अधिक प्रमाण सिरोही और इसके बाद पाली में मिलते हैं। पाली के आबू प्रदेश में उन्होंने पाली के नाणा से प्रवेश किया था और यहां सबसे अधिक उनके जीवित दर्शन को लेकर प्रमाण मिलते हैं। यहां तक की जैन शास्त्रों में यह भी उल्लेख है कि उनके कानों में कील ठोकने व सांप के डसने के वृतांत भी सिरोही से जुड़े हैं। यहां तक की आबूरोड के मूंगथला में उनकी एकमात्र खड़ी प्रतिमा होने का भी दावा जैन शास्त्र और समुदाय से जुड़े लोगों में किया जाता है। जैन शास्त्रों और विभिन्न संतो की ओर से लिखे ग्रंथो में यह प्रमाण मिले हैं कि भगवान महावीर अपने जीवनकाल के 37वें साल में विहार के लिए यहां आए थे। चूंकि वह अपने लोगों से दूर रहकर आराधना करना चाहते थे इसलिए वे आबू प्रदेश की तरफ आए। यह माना जाता है कि वे पाली के नाणा से उन्होंने सिरोही की देवनगरी व आबूप्रदेश में प्रवेश किया था। यहां से वे बामनवाड़जी आए जहां उनके कानों में ग्वाले द्वारा कील ठोकने की बात कही जाती है। यहां से वे नांदिया गए जहां उनको सांप ने डसा । इसके बाद आबू की पहाड़ियों की तरफ गए और यहां से सिंध की तरफ निकले।

बामनवाड़ जी में कानों में कील ठोकने और नांदिया में सांप डसने के प्रमाण भी यहीं, नाणा में भी किया था विहार, जहां उनका जीवंत मंदिर भी

बामनवाडजी : जहां ग्वाले ने भगवान महावीर के कान में कील ठोकी, फिर भी क्षमादान, अब यह जीवंत स्वामी में तीर्थ के रूप में दर्शनीय

सिरोही के समीप स्थित बामनवाडज़ी को भगवान महावीर का जीवित स्वामी तीर्थ भी माना जाता है। वरिष्ठ इतिहासकार सोहनलाल पाटनी की किताब अर्बुद परिमंडल के सांस्कृतिक इतिहास में यह जिक्र हैं कि चूंकि भगवान महावीर ने मध्यम अवस्था में विचरण किया था और इस तीर्थ की स्थापना उनके जीवित काल में ही हो गई थी इसलिए इसे जीवित स्वामी तीर्थ कहा जाता है। यहां तक की शास्त्रों में यह भी उल्लेख है कि यहां पर ध्यान में बैठे भगवान महावीर को एक ग्वाला अपनी गाय की सार संभाल के लिए कहकर गया और उसे लगा की उन्होंने सून लिया। जब वह लौटा तो उसकी गाय नहीं थी इस पर जब उसे जवाब नहीं मिला तो उसने कान में कील ठोक दी।

चौैथे-पांचवें चातुर्मास के बीच रहे गुजरात व आबू में

कल्पसूत्र की सुबोधिका टीका के अनुसार भगवान महावीर ने मध्यावस्था में चौथे एवं पांचवें चातुर्मास के बीच लाट (गुजरात) एवं राठा आबू पहाड़ी इलाका) प्रदेश में विहार किया था। उनकी इस टीका में बामनवाडज़ी में कील ठोकने व मूंगथला में खड़ी प्रतिमा का भी जिक्र है।

इतिहासकार सोहनलाल पाटनी के शोध व जैन शास्त्रों में अर्बुदांचल के 17 गांवों में महावीर स्वामी के विहार का उल्लेख

नाणा, उंदरा, वीरवाड़ा, कनखलाश्रम, तेलपुर, सिंदरथ, वरमाण, कुमार ग्राम, गब्बर, बामनवाड़, वीरोली, नांदिया, सानी गांव, लोटाना, मेडा, दियाणा, उज्जुका व जंभिया। जैन शास्त्रों में इन सभी का नाम अलग-अलग है जो इन नामों से मिलतेे हैं। यहां तक कि महावीर निर्वाण के 70 साल बाद बड़ली के शिलालेख के अनुसार राय बहादुर पंडित गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने भी भगवान महावीर के राजस्थान व अर्बुद मंडल में आने की पुष्टि की।

सिरोही का पावापुरी बिहार के पावापुरी की तरह, 19 साल में 68 लाख श्रद्धालुओं ने किए दर्शन

बिहार जहां भगवान महावीर का निर्वाण स्थल माना जाता है उसी की तर्ज पर सिरोही का पावापुरी मंदिर बना है। खास बात यह है कि यह पूरा मंदिर बिहार के पावापुरी की तर्ज पर है। यहां तक की भगवान महावीर की मूर्ति भी चौमुखा यानि चारो तरफ है। यहां के महावीर जैन बताते हैं कि 2001 में इस मंदिर का निर्माण कराया गया था और जब यह जमीन खरीदी तो यह पावाड़ा नाम से थी। इसमें भगवान पार्श्वनाथ का मंदिर बना था। इसी के बाद इसे पावापुरी नाम दिया गया और इसका पूरा निर्माण बिहार के पावापुरी की तर्ज पर किया गया। यहां कृत्रिम तालाब भी बनाया गया जहां दीपावली को निर्वाण दिवस के अवसर पर कार्यक्रम आयोजित होते हैं। जैन बताते हैं कि 19 साल में 68 लाख श्रद्धालु दर्शन के लिए आ चुके हैं। प्रतिदिन एक हजार लोग यहां दर्शन के लिए आते हैं। बिहार के पावापुरी से यह मंदिर इस मामले में भी अलग है कि यहां पर गौशाला है जहां 5 हजार 200 गौवंश रहते हैं।

महावीर जैन।

नांदिया: यह भी जीवंत महावीर स्वामी तीर्थ, बड़े भाई नंदीवर्धन ने बनाया था मंदिर, यहीं डसा था चंडकौशिक नाग

जैन शास्त्रों और संतों के द्वारा लिखे अलग-अलग ग्रंथो में बामनवाड़ जी के पास नांदिया गांव का भी उल्लेख है। यह भी जीवंत महावीर स्वामी का तीर्थ है। ऐसी मान्यता है कि यही रास्ता पहाडिय़ो से होते हुए आबू पर्वत की तरफ जाता था और इन्हीं पहाडियो में चंडकौशिक नाग था। भगवान महावीर के ध्यान की मुद्रा में नाग ने इन्हें डस लिया था, जिसमें खून की जगह दूध की धारा बहने लगी। उनके जीवित काल में ही इस मंदिर को इनके बड़े भाई नंदीवर्धन ने बनाया था, जिसकी प्रतिष्ठा पार्श्वनाथ गणधर केशी ने की थी।

मूंगथला: एक मात्र भगवान महावीर की खड़ी प्रतिमा, 2500 साल पुराने शिलालेख में जिक्र, भीनमाल में भी प्रमाण

आबूरोड शहर से करीब 7 किलोमीटर दूर मूंगथला भगवान महावीर की तपस्वी भूमि रही है। जैन शास्त्रों में इसका उल्लेख है कि भगवान महावीर अपनी मध्यम अवस्था में अर्बुदा गिरी भूमि में विचरण किया। पूर्व में मुंड स्थल अब मूंगथला में नंदीवृक्ष के नीचे ध्यान में रहे। इस तीर्थ के बारे में यह भी कहा गया है कि पूर्णराज नाम के राजा ने भगवान महावीर के जन्म के बाद 37 वें वर्ष में इस प्रतिमा को निर्मित करवा कर श्री केशी नामक गणधर के हाथों प्रतिष्ठित करवाई। इस मंदिर में आज भी मूल मंदिर की 2500 सौ साल पुराना शिलालेख भी स्थापित है जिसमें भगवान महावीर क यहां तपस्या का उल्लेख बताया जाता है। यहां तक की वि.सं.1334 का भीनमाल का शिलालेख भी इस तथ्य को स्वीकार करता है।

अर्बुदांचल में मिले हैं भगवान महावीर के विहार व जीवित दर्शन के प्रमाण


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