पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें

अाज हाेली पर बुध का उदय दिलाएगा बुधादित्य याेग

एक वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक

रंगों का त्योहार होली साेमवार से जिलेभर में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। निर्धारित मुहूर्त पर होलिका दहन किया जाएगा। भक्त प्रहलाद की याद दिलाने वाले होली के पर्व पर प्रेमपूर्वक एक-दूसरे के भाल पर गुलाल व अबीर का तिलक लगाकर खुशियां बांटेंगे। वहीं, दूसरे दिन मंगलवार को धुलंडी पर लोग एक-दूसरे पर अबीर-गुलाल डालकर होली खेलेंगे। इस दौरान शहरवासी भी एक दूसरों के घर जाकर रामा-श्यामा भी करेंगे। इसी दिन शाम को कड़ी सुरक्षा में गांव में शाही गेर निकलेगी। ज्योतिषीय दृष्टि से इस साल होली पर भद्रा का साया नहीं होना बेहद शुभ माना जा रहा है। इसके साथ ही ग्रहों के कुछ अच्छे योग भी है जो होली पर शुभ संयोग बना रहे हैं। इनमें बुध का 10 मार्च को सुबह 9 बजकर 16 मिनट पर उदित होना अच्छा संयोग माना जा रहा है। दूसरी ओर इस दिन गुरु और चंद्रमा दोनों ग्रह केंद्र स्थान में होने से शुभ फलदायी रहेंगे जिनमें सभी धार्मिक कार्य करना शुभ फलदायी होगा। इसके साथ ही बुध 11 मार्च को मार्गी भी हो रहे हैं। इस ग्रह की स्थिति से कई राशियों पर भी शुभ प्रभाव होगा, जिसका लाभ वह अगले एक महीने तक प्राप्त कर सकते हैं। पंडित अश्विन दवे ने बताया कि दीपावली की तरह हाेली पर भी मां लक्ष्मी काे प्रसन्न कर सुख-समृद्धि पाई जा सकती है। होलिका दहन पर पीली सरसों से हवन करके मनाेकामनाएं पूरी की जा सकती है। इससे माता लक्ष्मी भी प्रसन्न हाेती है।

जिले में होली की यह परंपराएं

1. पाली : बादशाह की सवारी में करोड़ों की खर्ची जिला मुख्यालय पर धुलंडी के बाद निकलने वाली बादशाह की सवारी शहर के लिए अनूठी परंपरा है। इस दौरान बादशाह मुक्त हाथों से करोड़ों की खर्ची रूपी गुलाल उड़ाते हैं। परंपरा के अनुसार इस दिन बादशाह अपना पूरा खजाना जनता में लुटा देते हैं। बादशाह के हाथों खर्ची के रूप में मिलने वाली गुलाल को शहरवासी व व्यापारी अपनी तिजोरी में रखते हैं।

2. गरनिया : जैतारण से 7 किलोमीटर दूर नाथ समाज के आसन में होली दहन की परंपरा 725 वर्ष पूर्व एक योगीराज के श्राप देने के बाद बंद हो गई थी। कई वर्षों पूर्व होली दहन के लिए रोपी गई सूखी खेजड़ी अब भी वहां हरी-भरी है। होलिका दहन के दिन महिलाएं इसी की पूजा करती हैं, लेकिन प्राचीन मान्यताओं के कारण यहां होलिका दहन नहीं होता।

3. डिंगाई : जितने बच्चों की ढूंढ, उतनी बड़ी होली, डिंगाई गांव में होली मनाने की परंपरा अनूठी है। गांव में पूरे साल में पैदा होने वाले बच्चे तथा उनके ढूंढ़ोत्सव को देखते हुए होली खड़ी करते हैं। मसलन, इस साल 19 बच्चों का ढूंढ़ोत्सव है तो होली भी 19 फीट की रोपी जाएगी।

4. बूसी : प्रतिवर्ष दूल्हा बनकर बिछुड़ते हैं मौजीराम बूसी में मौजीराम व मौजनीदेवी की प्रति वर्ष धुलंडी पर शादी होती है। इसके बाद वे सालभर के लिए बिछड़ जाते हैं। प्रदेश व समाज के इस अनूठे विवाह में हर साल जिलेभर के लोग पहुंचते हैं। रियासतकालीन यह परंपरा अनूठी है।

5. झीतड़ा : भगवान द्वारिकाधीश यहां पधारते हैं झीतड़ा स्थित भगवान जानराय मंदिर में धुलंडी पर गुजरात से भगवान द्वारिकाधीश खुद यहां पधारते हैं।
मान्यता है कि भक्त कूबाजी महाराज को द्वारिकाधीश के मिलने के बाद वचन दिए थे। इसलिए होली के दूसरे दिन धुलंडी के अवसर पर एक दिन के लिए द्वारिकाधीश झीतड़ा पधारते हैं। इस दिन गुजरात स्थित द्वारिकाधीश मंदिर के पट बंद रहते हैं।

चाइनीज की जगह भारतीय पिचकारियों से सजा बाजार

होली पर बाजार में अच्छी खासी रौनक रही। इस बार चाइनीज पिचकारियों की संख्या नहीं के बराबर देखी गई। बाजार में देश व राज्य के कारखानों में बनी पिचकारियों से दुकानें सजी है। बाजार में टैंक, कछुआ, रोबोट, डोरेमन, बंदूक, जहाज की पिचकारियां आकर्षण का केंद्र है। व्यापारियाें ने बताया कि इस बार अहमदाबाद से हर्बल गुलाल मंगवाए गए है।

वास्तु के अनुसार चुनें
हाेली के रंग


रंगों का चयन करते समय भी वास्तु की पॉजिटिव दिशा यानी पूर्व और उत्तर दिशा से मिलते-जुलते रंगों का ही प्रयोग करना चाहिए। उदाहरण के तौर पर उत्तर-पूर्व यानी गुरु के स्थान के लिए पीला रंग अच्छा और सकारात्मक होता है। यह सुख और समृद्धि को दर्शाता है। वहीं, नारंगी रंग पूर्व दिशा के मध्य का रंग है, यह सूर्य का प्रतीक है। इसी तरह लाल रंग अग्नि देवता और साउथ- ईस्ट का कलर है। यह ऊर्जा को दर्शाता है। उत्तर दिशा बुध का स्थान है। बुध का रंग हरा होता है। नकारात्मक दिशा जैसे कि साउथ-वेस्ट के कलर्स जैसे भूरे या काले रंग से होली नहीं खेलें।
खबरें और भी हैं...