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बीमार पड़ा तो एम्स के डॉक्टर को घर ले आईं

2 वर्ष पहले
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सुषमा स्वराज जी हमारे बीच नहीं हैं, भरोसा नहीं होता। उनके साथ बीते और साझा किए गए पल अांखों के सामने से गुजर रहे हैं। वे मेरे लिए अनमोल हैं अौर जीवनभर मेरे साथ रहेंगे। उनसे मेरा बहुत गहरा रिश्ता था। वे राजनीति में मेरी पथ प्रदर्शक थीं, पारिवारिक स्तर पर बड़ी बहन थीं। उनका जाना निश्चित तौर पर व्यक्तिगत क्षति है।

जब मैं भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष था, उस समय उनका मुझे बहुत सहयोग मिला। उस दौर में कुछ राज्यों में असहमति की स्थिति थी, पार्लियामेंट्री बोर्ड में भी कई बार सहमति नहीं बन पाती थी, ऐसे में वे मेरी मदद किया करती थीं। वे मुझे बताया करती थीं कि किस मसले की राह कैसे निकलेगी। मेरे लिए सुषमाजी का सहयोग बहुत बड़ा आधार था। पार्टी के अंदर कई बार ऐसी स्थिति आई, जिसमें निर्णय लेना बहुत कठिन होता था। सुषमाजी ने हमेशा मेरा मनोबल बढ़ाया और हर काम को बड़ी सहजता से करने का रास्ता बताया। विपक्षियों से भी सौहार्दपूर्ण रिश्ते थे। पार्टी में मतभेद होने पर वे दृढ़ता से उचित मत का समर्थन करतीं। कहना न होगा कि उनके नैतिक समर्थन के कारण मैं बहुत सारे काम कर पाया। विरोधी पार्टियों के सारे नेताओं से उनका नियमित संवाद था। अालोचनात्मक बात कहने की उनकी अपनी शैली थी। अलोचना करते समय वे भाषा का संयम बनाए रखती थीं। धारदार वक्तृत्व कला उनका सबसे बड़ा गुण था। उसके बल पर उन्होंने राजनीति में अपना मजबूत स्थान बनाया था।

व्यक्तिगत स्तर पर उनका मेरे प्रति अथाह स्नेह था। उनमें मुझे अपनी बड़ी बहन का रूप दिखाई देता था। वे भी उसी तरह से मेरी चिंता भी किया करती थीं। एक बार मैं बीमार हुआ अौर उन्हें पता चला, तो तत्काल एम्स से डॉक्टर लेकर आ गईं। मुझसे बोलीं कि अब आपकी कोई बात नहीं सुनना। अधिकार के साथ पूरा चेकअप कराने को कहा। उनके कहने पर मैं एम्स गया, वहां पूरी जांच कराई। उन्होंने मेरी स्वास्थ्य रिपोर्ट के बारे में जानकारी ली। उसके बाद मुझे बड़ी बहन की तरह पूरे अधिकार के साथ स्वास्थ्य के प्रति सजग रहने की हिदायत दीं। मैं भी उनकी बात को उसी गंभीरता से लेता था, लेकिन अलग-अलग तरह के व्यंजन खाने का मेरा स्वभाव है, उसमें मैं फिर लापरवाही बरतने लगा। इस बात की जानकारी जब उन्हें लगी, तो मेरी प|ी कंचना को नागपुर में फोन लगाकर बोलीं कि वे मेरा ध्यान रखें, क्योंकि मैं स्वास्थ्य के प्रति बहुत लापरवाही करता हूं। अपने सहयोगियों की ऐसी चिंता करने वाले विरले ही होते हैं। यह मेरी ही बात नहीं है, उन्होंने हर किसी के साथ पारिवारिक रिश्ता बनाकर उसे पूरी तरह से निभाया। हर कार्यकर्ता के साथ उनका माता और बहन का रिश्ता था। मुझे जब भी समय मिलता उनसे मिलने चला जाया करता था। सुषमाजी के साथ ऐसा पारिवारिक संबंध बन गया था। मुझे यह कहने में कतई संकोच नहीं है कि उनका घर हमारे लिए दुख-सुख साझा करने वाली जगह बन गई थीं। उनकी बेटी बांसुरी बिलकुल उन्हीं की तरह बुद्धिमान, सहज, सरल बिटिया है। वह अक्सर मेरे यहां आया करती है। उसे हमारे यहां का बना पराठा और दही बहुत पसंद है। मेरे यहां पराठा जब भी बनता, मैंने विशेषतौर पर कह रखा था कि उसे बांसुरी के लिए जरूर भेजना है। मैं जब सुषमाजी से मिलने जाता था तो मेरे लिए वे विशेष रूप से पोहा बनवाया करती थीं। वे घर पर कहकर रखती थीं कि नितिन अानेवाले हैं, इसलिए पोहा बनाने की तैयारी रखो।

सुषमाजी मेरे राजनीतिक और पारिवारिक जीवन की बहुत चिंता किया करती थीं। नागपुर से मेरे चुनाव लड़ने की इच्छा के बारे में जब उन्हें पता चला, तो उन्होंने मुझे समझाने का प्रयास किया। उन्होंने मुझसे कहा कि मेरा नागपुर से चुनाव लड़ने का फैसला बहुत जोखिम भरा है। वह सीट भाजपा के अनुकूल नहीं है। मैं देश की किसी अन्य सीट से चुनाव लड़ने पर विचार करूं, लेकिन जब मैंने उन्हें कहा कि नागपुर से चुनाव लड़ने का मैंने निश्चय कर लिया है और वहां से जीतकर आऊंगा, तो वे मेरे दृढ़संकल्प से बहुत खुश हुईं। राजनीति में विपरीत परिस्थिति को चुनने के मेरे निर्णय से वे बहुत प्रभावित थीं। चुनाव प्रचार में मैं पुराने हेलिकॉप्टर का इस्तेमाल कर रहा था। सुषमाजी चुनाव क्षेत्र में आईं तो उन्होंने पुराना हेलिकॉप्टर देखा और मुझे फटकार लगाई कि मैं उसका इस्तेमाल न करूं। मैं फिर कभी उस हेलिकॉप्टर में नहीं बैठा।

मैं जब 2014 का लोकसभा चुनाव जीतकर आया तो उन्होंने खुश होकर कहा कि नितिन आपकी ज़िद की जीत हो गई। इस बार लोकसभा चुनाव जीतकर जब मैं आया तो संयोग से पंडित दीनदयाल उपाध्याय मार्ग स्थित भाजपा कार्यालय मैं और सुषमाजी साथ-साथ पहुंचे। उन्हें देखते ही मैं पास में गया और आदर से मेरा सिर झुक गया। उन्होंने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए अभिभावक का अहसास कराया। मेरी दोनों बहनें अब दुनिया में नहीं हैं। भाजपा मुख्यालय में उनका आशीर्वाद लेते हुए मेरा फोटो वायरल हुआ था। मैंने कहा कि आज आपके स्नेह में मुझे फिर अपनी बड़ी बहन से मिलने का अहसास कराया है, तो उनकी आंखों में आंसू आ गए। इसके बाद मैं जब मंत्री बना तो उनसे मिलने घर गया। वे राजनीति से दूर चली गई थीं, लेकिन मुझे ही ज्यादा बुरा लग रहा था। वे शांत व संयमी दिखाई दे रही थीं। करीब एक-डेढ़ घंटा हम साथ रहे। पूरे समय घर-परिवार की बातें होती रहीं। जब अाप बेचैन होते हैं तो अांसू बहाने के लिए एक जगह होती है, एक घर होता है। सुषमाजी का घर मेरे लिए वही जगह थी। उनके सामने मैं दिल खोलकर बात कर सकता था। वह सहूलियत अब मैं हमेशा के लिए गंवा बैठा हूं।

नितिन गडकरी

केन्द्रीय भूतल परिवहन अौर जहाजरानी मंत्री

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