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सौ साल पुराना पशु मेला, अब पुशओं को ही तरसा

पीपलू में 1918 में शुरू हुआ अन्तर्राज्यीय पशु मेला सरकारी संरक्षण के अभाव में अब धीरे-धीरे अपनी पहचान खेाता जा रहा...

Danik Bhaskar | May 14, 2018, 05:55 AM IST
पीपलू में 1918 में शुरू हुआ अन्तर्राज्यीय पशु मेला सरकारी संरक्षण के अभाव में अब धीरे-धीरे अपनी पहचान खेाता जा रहा है। ऐसे में 100 वर्ष पूरे कर 101वें पहुंचे इस पशु मेले में नाममात्र के मवेशी बिकने पहुंच रहे हैं। हालात यही रहे तो कुछ वर्षों बाद यह मेला इतिहास के पन्नों में दर्ज होकर रह जाएगा। पीपलू के पशु मेले में इस बार मवेशियों के आने का सिलसिला तो शुरू हुआ है, लेकिन अब तक 150 बैल बछडे आए है। वहीं 10 ऊंट तथा 10 घोडा घोडी ही बिकने पहुंचे है।

मेले सामाजिक समरसता, सौहार्द, भाईचारे के पर्याय होने समेत सांस्कृतिक धरोहर होते है। देश की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि एवं पशुपालक है। ऐसे में 1918 में जागीरदार अब्दुल हफीज वली अहद ने पीपलू में पशु मेले की शुरुआत कीथी। इस पशु मेला ने 95 साल तक प्रदेश में ही नहीं, बल्कि देश के कई राज्यों में अपनी पहचान कायम की।

जिसके चलते यहां कई नस्लों के गौवंश बिकने आने लगे थे। मेले का उद्घाटन विधिवत रूप से ज्येष्ठ कृष्णा अमावस्या को होता था, जिसमें देश प्रदेश के मंत्रीस्तर के जनप्रतिनिधि उद््घाटन पहुंचते थे। मेले में उद्घाटन से पहले ऊंट की खरीद फरोख्त होती थी, वहीं उद्घाटन के बाद गौवंश की खूब खरीद फरोख्त होती थी। लेकिन पिछले पांच वर्षों से यांत्रिकीकरण के बढते प्रभाव के चलते तो मेलेे का प्रभाव कम हुआ ही है। साथ ही सरकारी संरक्षण के अभाव में भी इस मेले ने अपना अस्तित्व खोया है।

आस्था

1918 में शुरू हुए मेले ने 2018 में अपनी पहचान खोई, कृषि मंत्री की घोषणा सिर्फ घोषणा बनकर रही

पीपलू. अंतर्राज्यीय पशु मेले में बिकने पहुंचा गौवंश की संख्या नाममात्र ही है।

कृषि मंत्री की घोषणा का नहीं हुआ अमल

28 मई 2014 को मेले के उद्घाटन में आए कृषि मंत्री प्रभूलाल सैनी ने इसको राज्यस्तरीय पशु मेले की पहचान देने की घोषणा भी की थी, लेकिन उनकी घोषणा पर भी किसी तरह का अमल नहीं हुआ। यदि अमल होता तो शायद यह मेला फिर से जीवन्त हो सकता था।