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सुख की चाह में मनुष्य और अधिक दुखी हो रहा है: संत गोविंदराम

मनुष्य आज के जीवन में अधिक सुख की चाह में और अधिक दुखी होता जा रहा है। यदि हम हर घड़ी यह मान लें कि ईश्वर ने सबसे सुखी...

Dainik Bhaskar

Aug 06, 2018, 06:11 AM IST
सुख की चाह में मनुष्य और अधिक दुखी हो रहा है: संत गोविंदराम
मनुष्य आज के जीवन में अधिक सुख की चाह में और अधिक दुखी होता जा रहा है। यदि हम हर घड़ी यह मान लें कि ईश्वर ने सबसे सुखी हमें ही बनाया है तो हम दुखों को जीवन में आने से टाल सकते हैं। यदि हम दृढ़ निष्ठा और विश्वास से भगवान की भक्ति करें तो परम सुख व वैभव को प्राप्त कर सकते हैं। ये बात संत गोविंदराम महाराज ने नगर के जैतीवास रोड पर स्थित हनुमान मंदिर बगेची में चल रही द्विमासिक चातुर्मास सत्संग के दौरान कही। इस दौरान कथाव्यास संत गोविंदराम महाराज ने रामचरितमानस के बालकांड की चौपाइयां संगीतमय गायन के साथ प्रस्तुत की। इस दौरान संत ने अपने दैनिक प्रवचनों के दौरान भगवान राम की विभिन्न बाल लीलाओं का वर्णन किया व नामकरण संस्कार प्रसंग सुनाया। इस दौरान वृंदावन के संत माणिकराम महाराज ने कहा कि माया और अहंकार से ग्रसित व्यक्ति कभी सुखी नहीं रह सकता। माया से बंधन होता है और सत्य का आश्रय लेने से मुक्ति मिलती है। इस दौरान संगीतमय भजनों पर श्रद्धालु झूम उठे। इस दौरान सीताराम पंवार, जीयाराम खारवाल, शेषाराम बर्फा, लक्ष्मणराम मेवाड़ा, सत्यनारायण सैन, मनोहरलाल बामणिया, भीकमचंद कंसारा, किशनाराम काग, पुखराज पटेल, उगमाराम देवासी, नारायणराम सीरवी, कालूराम सीरवी आदि मौजूद थे।

राम से भी बड़ा है राम का नाम : संत भागीरथदास

खेड़ापा | दादूदयाल संप्रदाय पीठाधीश्वर आचार्य गोपालदास महाराज के चातुर्मास सत्संग में सायंकाल कथा में संत भागीरथदास ने भक्तमाल प्रवचन में नाम की महिमा बताई। भागवत नाम स्मरण से कई भक्तों ने अपने जीवन का कल्याण किया। “राम’ यह शब्द दिखने में जितना सुंदर है उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है इसका उच्चारण। राम कहने मात्र से शरीर व मन में अलग ही तरह की प्रतिक्रिया होती है जो हमें आत्मिक शांति देती है। हजारों संत व महात्माओं ने राम का नाम जपते-जपते मोक्ष को पा लिया है। ईश्वर-नाम की महिमा साक्षात ईश्वर से भी महान है। ईश्वर-नाम की महिमा अपरंपार है, इस कलयुग में राम नाम ही सुख शांति का मार्ग है व राम नाम ही इस जीवन रूपी सागर से पार उतार सकता है क्योंकि श्वास कब पूरे हो जाएं यह कोई नहीं जानता। इसलिए प्रत्येक मनुष्य को सच्चे मन से राम नाम का जाप करना चाहिए। संध्याकाल में संतों द्वारा भजन संध्या में महंत मोहनदास, प्रेमदास देवरी धाम, संत पुरखाराम मेड़ता, संत सुंदरदास आदि ने गुरुवाणी भजनों का गायन किया।

बिलाड़ा. कथा वाचन करते संत व कथा श्रवण का लाभ लेते श्रद्धालु।

सत्य ही ईश्वर का प्रतिरुप: संत भक्तिराम

खेड़ापा | रामस्नेही संप्रदाय आचार्य पीठ रामधाम खेड़ापा में चातुर्मास सत्संग रामधाम खेड़ापा के संत भक्तिराम ने भक्तमाल कथा में बताया कि सत्य ही ईश्वर का स्वरूप है। एक व्यक्ति यह सोचता है कि अपने जीवन के दिन प्रतिदिन के काम काज पूरे कर लेना ही मानवता है, लेकिन ये साधारण कार्य पूरे करना तो सांसारिक कर्तव्य पूरे करना होता है। यह आध्यात्मिक कार्य नहीं है। कुछ घटनाओं को देखना, अपनी तरह से कुछ करना या कहना, ये सारे संसारी तथ्य हैं। आध्यात्मिक सत्य इनसे अलग रहता है। वह समय, स्थान और परिस्थिति से परे होता है और किसी व्यक्ति से उसका कोई संबंध नहीं होता है। यह सत्य रजस गुणों से प्रभावित नहीं होता है। यह सत्य निश्चय ही भगवान है व बाकी सब कुछ इस सत्य में से ही प्रकट होता है।

त्याग का दूसरा नाम ही परिवार है : डॉ. विद्युतप्रभा

फलोदी | ओसवाल भवन में चातुर्मास के दौरान रविवार को प्रवचन करते हुए जैन साध्वी डॉ. विद्युतप्रभा ने कहा कि जिस चारदीवारी से व्यक्ति को ऊर्जा, आनंद और विश्राम प्राप्त होता है, उसी का परिवार है। साधु तो परिवार त्यागी होता है, पर वर्तमान के स्वार्थ केंद्रित वातावरण ने गृहत्यागी संतों को परिवार में रहने की सीख देने के लिए विवश कर दिया है। साध्वी ने कहा कि व्यक्ति अपने स्वभाव से परिवार के वातावरण में स्वर्ग का आनंद उपस्थित कर देता है। अपने नकारात्मक रवैये के नरक भी बना सकता है। परिवार में न्याय और अन्याय की भाषा नहीं होती बल्कि समाधान की बात होती है। जो व्यक्ति परिवार में दाे बात पीना सीख लेता है वह कभी दुखी नहीं होता है। साध्वी ने कहा कि रामायण के मुख्य पात्र राम के राजा बनते ही वनवास जाना पड़ा तब भी प्रसन्नता है। और भरत को को राम के हक राज्य मिला तक भी लेने से इनकार है। त्याग का दूसरा नाम ही परिवार है।

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