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मानव जीवन चिंतामणि रत्न है: डॉ. विद्युतप्रभा

ओसवाल भवन में चातुर्मास के दौरान प्रवचन करते हुए जैन साध्वी डॉ. विद्युतप्रभा मसा ने कहा कि यह जीवन जो हमें प्राप्त...

Dainik Bhaskar

Aug 05, 2018, 06:16 AM IST
मानव जीवन चिंतामणि रत्न है: डॉ. विद्युतप्रभा
ओसवाल भवन में चातुर्मास के दौरान प्रवचन करते हुए जैन साध्वी डॉ. विद्युतप्रभा मसा ने कहा कि यह जीवन जो हमें प्राप्त है, यह चिंतामणि र| से भी ज्यादा मूल्यवान है। चिंतामणि र| से तो हम जीवन जीने की सुविधाएं प्राप्त करते हैं। उन्हाेंने कहा कि अगर हम इस जीवन को होश पूर्वक जीए तो हमारी सदा- सदा की जन्म मरण की यात्रा समाप्त हो सकती है। साध्वी ने एक उदाहरण देते है बताया कि एक व्यक्ति को राह चलते एक चमकीला पत्थर नजर आया। उसकी चमक से प्रभावित हो उसने व र| अपने हाथ में उठा लिया। उस र| के प्रभाव से उसके मन की सारी कल्पनाएं साकार हो गईं। नरम मखमली शय्या में सोते हुए उसने जब कौए की आवाज सुनी तो उसको उड़ाने के लिए उसी चमकीले पत्थर का उपयोग किया। चमकीले पत्थर के गायब होते ही सारी सुविधाएं भी गायब हो गई। साध्वी ने कहा कि हम उस व्यक्ति को मूर्ख कहेंगे पर क्या एेसी ही मूर्खता हम नहीं कर रहे हैं। इस मानव जीवन को विवेक पूर्वक जीए तो हम भगवान बन सकते हैं। अगर हम इस जीवन को होश पूर्वक जीए तो ही इस जीवन को प्राप्त करने की सार्थकता है। इस अवसर पर निर्मलाबाई बच्छावत परिवार द्वारा गुरुवर्या श्री को सकल संघ की उपस्थित में उत्तराध्यायन सूत्र अर्पित किया गया ।

प्रभावशाली व्यक्तित्व के लिए मानव में सदगुणों का समावेश जरूरी: आचार्य गोपालदास

खेड़ापा | दादू दयाल संप्रदाय आचार्य पीठ नाराणा पीठाधीश्वर आचार्य गोपालदास महाराज के चातुर्मास सत्संग ग्राम मेलाणा दादू द्वारा में दादू वाणी कथा प्रसंग में कहा कि कोई भी व्यक्ति आकर्षक व प्रभावी व्यक्तित्व का मालिक सुंदर पहनावे से नहीं, अपितु सुंदर जीवन-शैली से होता है। अगर हमारे जीवन में अच्छे गुण हैं तो हम सदा दूसरों के लिए आकर्षण का केंद्र रहेंगे। याद रखिए, गोरा रंग दो दिन अच्छा लगता है, ज्यादा धन दो माह अच्छा लगता है, पर अच्छा व्यवहार व स्वभाव जीवन भर अच्छा लगता है। प्रभावी व्यक्तित्व हमारे भीतर छिपा है। इसे बाहर से लाना नहीं है अपितु अपने भीतर से उजागर करना है। याद रखिए, दुनिया के हर पत्थर में एक बेमिसाल प्रतिमा छिपी रहती है। उन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति पर बातों का प्रभाव कम पड़ता है, आपके सद्गुण, सद्व्यवहार व श्रेष्ठ चरित्र का प्रभाव अधिक पड़ता है। महंत मोहनदास ने बताया कि संत प्रेमदास देवरी धाम ने दोपहर को भक्तमाल की कथा में बताया कि संतों की संगति करने मात्र से ही मोक्ष के द्वार खुल जाते है। जिस घर में संतों के पवित्र चरण पड़ जाते है उस घर में सुख शांति निवास करती है व देवता रमण करते है।

निस्वार्थ सेवा ही भक्ति का स्वरूप : संत भक्तिराम

खेड़ापा | रामस्नेही संप्रदाय आचार्य पीठ रामधाम खेड़ापा में चल रहे चातुर्मास सत्संग में धाम के संत भक्तिराम ने कथा में भक्ति प्रसंग पर चर्चा करते हुए बताया निस्वार्थ भाव प्राणी मात्र की सेवा ही भक्ति का सच्चा स्वरूप है। इस मानव देह में कर्म, ज्ञान व भक्ति का समन्वय है। भक्ति से किया हुआ कर्म मीठा हो जाता है। माता अपनी संतान के लिए क्या-क्या कष्ट नहीं भोगती। जब बालक माता की गोद में आ बैठता है तो उसे कितना सुख मिलता है। पर सब प्रकार के सांसारिक सुखों की प्रतिक्रिया में दुख भी रहता है। जिनकी संतान बीमार हो जाती है या मृत्यु को प्राप्त हो जाती हैं तो उन्हें कितना व कैसा गहरा दुख होता है अर्थात सांसारिक प्रेम में सुख भी है व दुख भी विचारशील मनुष्य ऐसा प्रेम चाहता है जिसमें प्रतिक्रिया न हो। ऐसा प्रेम सदा एक रस रहने वाले ईश्वर से ही हो सकता है। उसी प्रेम को ‘भक्ति’ कहते हैं। भक्ति का एक रूप जनता की निस्वार्थ सेवा है क्योंकि ईश्वर सर्वव्यापक है व जीव मात्र की सेवा ईश्वर की सेवा है।

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