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गढ़ी खेल मैदान में मेवाड़ा कलाल समाज के 23 जोड़े बने हमसफर

गढ़ी. स्थानीय खेल मैदान में विवाह से पहले बग्गी में सवार खुशी की मुद्रा में दुल्हनें और समारोह में सामूहिक विवाह के...

Danik Bhaskar

Feb 19, 2018, 05:45 AM IST
गढ़ी. स्थानीय खेल मैदान में विवाह से पहले बग्गी में सवार खुशी की मुद्रा में दुल्हनें और समारोह में सामूहिक विवाह के दौरान शामिल हुए जोड़े।

भास्कर संवाददाता| परतापुर

मेवाड़ा कलाल समाज का सामूहिक विवाह समारोह रविवार को गढ़ी के खेल मैदान में हुआ। इसमें 23 जोड़ों ने एक दूसरे का जीवनभर साथ निभाने की कसम खाई, साथ ही अग्नि को साक्षी मानकर सात फेरे लिए।

विवाह समारोह की सारी विधि मनोहर महाराज ने मंत्रोच्चार के साथ पूरी की। मुख्य यजमान राजा व जसवंत थे। सामूहिक विवाह समारोह में सुबह वर वधुओं की विवाहस्थल से शोभायात्रा निकाली गई, जो गढ़ी का भ्रमण कर वापस विवाहस्थल पहुंची। दोपहर में विवाह की सारी रस्में पूरी की गई।

शाम को विदाई दी गई। विवाह समारोह में चंदूजी का गढ़ा के अमृतलाल ने 31 हजार की बोली लगाकर पूजा की। शोभायात्रा का नेतृत्व कन्हैयालाल फलवा ने 15102 रुपए की बोली लगाकर किया। वर वधु को अलमारी मोहनलाल, गैस चूल्हा रामलाल, किचनसेट देवीलाल, चांदी के पायजेब प्रेमचंद्र व कांतिलाल, दुल्हनों के ड्रेस अशोकुमार, सूटकेस जगदीश कलाल, कंबल मणिलाल कलाल ने दिए। पुष्पवर्षा मोहनलाल की ओर से की गई। समारोह में भामाशाहों और संभाग की कार्यकारिणी सदस्यों का सम्मान किया गया। इस दौरान जिलाध्यक्ष हरीश कलाल सेनावासा, सामूहिक विवाह समिति के संयोजक मुकेश मोड पटेल, संरक्षक देवचंद, मोहनलाल, पूनमचंद, रमेश, लाभचंद, कमलेश, सुंदरलाल, बाबूलाल, नरेश, ईश्वरलाल समेत समाजजनों और युवाओं ने सहयोग किया।

धर्म-समाज-संस्था

बग्गी में भी नाचती दुल्हनें

गढ़ी में आयोजित समारोह में समाज अध्यक्ष हरीश कलाल की अगुवाई में भामाशाहों - पादाधिकारियों का अभिनंदन किया गया।

उधर, डूंगरपुर में 12 जोड़े परिणय सूत्र में बंधे

डूंगरपुर| सामाजिक बदलाव का सबसे बड़ा उदाहरण मोड़ मेवाड़ा कलाल समाज है। पिछले 21 सालों से समाज की बेटियों और बेटों का सामूहिक विवाह कराकर समाज के लोगों में 14 करोड़ 64 लाख रुपए की राशि बचा ली। समाज की ओर से इन 21 सालों में 366 बेटियां और बेटों को एक-दूसरे के विवाह बंधन में बांधा है। वर और वधू पक्ष से एक सामान्य अंशदान लेकर विवाह की पूरी तैयारी और विदाई तक की जिम्मेदारी समाज के वरिष्ठ पदाधिकारी निभाते हैं। जिन परिवारों की बेटी या बेटा होता है, उसे तो बस अपने मित्र और रिश्तेदारों के साथ ही मंडप में जाकर बैठना है। इसके अलावा उन्हें कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं होती है। समाज के वरिष्ठ पदाधिकारी बताते हैं कि यह बदलाव की बयार 21 सालों पहले आई थी, तब एक विचार समाज के लोगों में आया था कि कुछ ऐसा करें कि दूसरे समाज भी प्रेरणा लें और हमें भी सुकून मिल सके।

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