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इलाज नहीं मिलने से 5 साल में 102 प्रसूताओं की मौत 11 में से 7 ब्लाॅक मुख्यालयों पर गायनिक डॉक्टर नहीं

एक वर्ष पहले
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हर पांच साल मेंं सिर्फ सरकार बदलती है। व्यवस्थाएं नहीं। इसकी बानगी चिकित्सा सेवाएं भी हंै। 5 साल में जिले की 102 प्रसूताओं की मौत हो गई। भास्कर ने पड़ताल की। पाया कि गांवों में संस्थागत प्रसव की सुविधाएं नहीं हैं। जिले के 11 में 7 ब्लाॅक मुख्यालयों पर गायनिक (स्त्री एवं प्रसूति रोग) विशेषज्ञ डाॅक्टर नहीं है। कहीं डाॅक्टर है तो वहां सिजेरियन सुविधा नहीं है। ग्रामीण चिकित्सा सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की शुरुआत 2005 में हुई थीं। इसका फोकस मातृ मृत्यु दर पर अंकुश लगाना था। ब्लाॅक मुख्यालय पर सिजेरियन प्रसव के लिए फर्स्ट रैफरल यूनिट लगाने का निर्णय भी लिया गया था।

शहर के अस्पताल में 75 प्रतिशत प्रसव केस जिले के... चित्तौड़, निंबाहेड़ा, बड़ीसादड़ी, बेगूं, रावतभाटा में फर्स्ट रेफरल यूनिटें शुरू होने से जिला अस्पताल के महिला एवं बाल अस्पताल में रोज 40 से अधिक प्रसव हो रहे हैं। इसमें सिजेरियन औसत पांच से सात केस ही होते हैं। इसके बावजूद प्रतिदिन 25 से 30 प्रसव ग्रामीण क्षेत्र के होते हैं। सीएचसी पर सिजेरियन सुविधा नहीं होने के कारण रैफर होकर केस यहीं पर आते हैं। इसी कारण जिले में सबसे अधिक नार्मल एवं सिजेरियन डिलेवरी के केस यही पर होते हैं।


जवाब...भर्ती प्रक्रिया पूरी होते ही संस्थागत प्रसव सुविधाएं बेहतर करेंगे: सीएमएचओ

वर्तमान में बेगूं एवं रावतभाटा में फर्स्ट रैफरल यूनिट का संचालन नहीं हो रहा है। कारण बेगूं में एनेस्थेटिक, रावतभाटा में गायनिक एवं एनेस्थेटिक के पद रिक्त हैं। इन सहित डाॅक्टरों के रिक्त पदों को भरने के लिए मुख्यालय पर अधिकारियों को समय-समय पर बताते रहे हैं। हाल ही में एक विज्ञप्ति जारी की है। भर्ती प्रक्रिया पूरी होते ही गांवों में भी संस्थागत प्रसव सुविधाएं बेहतर करने का प्रयास करेंगे।
डाॅ. इंद्रजीत सिंह, सीएमएचओ, चित्तौड़गढ़

प्रत्येक रैफरल यूनिट हर माह 5-7 लाख रुपए ही चाहिए पर


सरकार भले मातृ मृत्यु दर रोकने के लिए करोड़ों रुपए खर्च कर रही है। लेकिन उपयोग सही नहीं हो रहा है। फर्स्ट रैफरल यूनिट का संचालन चुनिंदा सभी जगहों पर नहीं हो पाया। जिले में एक साल में औसत क्रमश: छह लाख रुपए जांचों के लिए, सात लाख रुपए स्माल कुपोषण उपचार केंद्रों पर, पांच लाख जिला अस्पताल में एसएनसीयू एवं 15 लाख रुपए ट्रांस्पोर्टेशन पर खर्च किए जाते हैं। संस्थागत प्रसव के एक महीने तक प्रसूता को घर से संस्था तक आने-जाने को परिवहन सुविधा मिल रही है। ऐसे में बड़ा सवाल है कि एफआरयू यूनिट संचालन के लिए पर्याप्त स्टाफ क्यों नहीं है। जबकि प्रति पंचायत समिति मुख्यालय एफआरयू यूनिट संचालन पर हर माह पांच लाख से अधिक खर्च नहीं होंगे।


गांवों में गायनिक के 10 पदों में से सात खाली... गांवों मेंं गायनिक डाॅक्टर के 10 पद स्वीकृत हँ, लेकिन सात खाली हैं। गंगरार, कपासन, राशमी, भूपालसागर, रावतभाटा, भदेसर में गायनिक नहीं होने के कारण गर्भवती व प्रसूताओं को जिला अस्पताल में लाते हैं। सामान्य प्रसव के लिए जयसिंहपुरा कपासन की शंकर, जयसिंहपुरा गंगरार की कंकू रैगर सहित करीब 20 महिलाएं सीधे जिला मुख्यालय पहुंच रही है। इसी प्रकार जिला मुख्यालय पर प्रतिदिन औसतन पांच से सात सिजेरियन भी होते हैं।
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