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मन्नत पूरी होने पर निनोर में अंगारों पर चलते हैं श्रद्धालु
राजस्थान के प्रतापगढ़ और मध्यप्रदेश के रतलाम स्टेट के समय निनोर और कोटड़ी परगने के नाम से विख्यात जिले के निनोर कस्बे के लोग आज भी सैंकड़ों वर्ष पुरानी परंपरा का निर्वहन करते आ रहे हैं। प्राचीन पद्मावती मंदिर में लगी माता पद्मावती की प्रतिमा करीब 5000 साल पुरानी है, जहां प्रतिवर्ष शीतला पंचमी पर लगने वाले मेले में अपनी मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु अंगारों पर चलकर माता के प्रति अपनी आस्था प्रकट करते हैं। तीन दिवसीय यह मेला 12 मार्च से शुरू होगा। मान्यता है कि सूनी गोद भरती है मां पद्मावती, यहां दहकते अंगारों पर चलकर दर्शन करते हैं श्रद्धालु। क्षेत्र के लोगों की मान्यता है कि माता पद्मावती सूनी गोद भरती है। इसी कामना को लेकर आसपास के लोगों के साथ ही दूरदराज मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र आदि क्षेत्रों के सैकड़ों श्रद्धालु यहां आते हैं। यहां मांगी गई मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु दहकते अंगारों से होकर गुजरते हैं। मंदिर पर प्रतिवर्ष तीज से पंचमी तक विशाल मेला लगता है। जिसमें पहले दिन ही मंदिर के मुख्य मार्ग पर 10 फुट की लंबाई में लकड़ी और कंडे जलाकर अंगारों की चूल तैयार की जाती है। इसमें सबसे पहले मंदिर का पुजारी पास के कुएं में नहाकर गीले कपड़ों में दहकते अंगारों पर चलता है। इसके बाद मन्नत मांगने वाले महिला-पुरुष कुएं के पानी में पैर धोकर दहकते अंगारों से गुजरते हुए माता के दर्शन करते हैं। बताया जाता है कि यहां किसी के भी पैर नहीं जलते हैं।
समय के साथ जमींदोज हो गई नैनावती नगरी: यह क्षेत्र कभी नैनावती नगरी के नाम से जाना जाता था, लेकिन समय के थपेड़ों के साथ नैनावती नगरी जमींदोज हो गई। समय के साथ इन पुरावशेषों पर नया गांव बस गया, जिसे आज निनोर के रूप में जाना जाता है। यहां के बुजुर्गों की मानें तो कभी यह नगरी साहूकारों और नागर ब्राह्मणों की संपन्न नगरी थी। कहते हैं इस नगरी में 360 खब अनाज भरने की बुखारी थी, जिसमें 51 विशाल बुखारियां थी। इसमें गंगा जमुना नाम की दो सबसे बड़ी बुखारिया थीं, जिसमें रखे अनाज से 2 साल तक पूरे मालवा के लोगों को भोजन की व्यवस्था की जा सकती थी। आज भी यह बुखारिया मकानों के नीचे दबी हुई हैं। खुदाई के समय इनके पुरावशेष यहां निकलते रहते हैं। यह भी मान्यता है कि राजा नल और उनकी प|ी दमयंती ने माता पद्मावती के समक्ष लंबे समय तकतपस्या की थी। यह मंदिर प्राचीन होने के साथ ही यहां विराजित पद्मावती माता की प्रतिमा भी बहुत चमत्कारी मानी जाती है। लोगों का मानना है कि यह प्रतिमा स्वरूप बदलती है। सुबह माताजी की प्रतिमा बाल रूप में, दोपहर यौवनावस्था में और शाम को बुजुर्ग के रूप में नजर आती है। मां पद्मावती से मांगी गई कोई भी इच्छा कभी अधूरी नहीं रहती है।
प्रतापगढ़-रतलाम मार्ग पर निनोर में स्थित नैनसुख तालाब का भी ऐतिहासिक महत्व है। इस तालाब का वर्णन 1658 ईस्वी के ऐतिहासिक दस्तावेजों में मिलता है। 16 मई 1658 ईस्वी में जालौर रियासत की ओर से लड़ते हुए रतलाम के राजा रतन सिंह औरंगजेब से युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो गए थे। राजा की वीरगति की सूचना के समय राजा की चारों रानियां का निनोर के तालाब पर मुकाम था। राजा रतन सिंह की मृत्यु की खबर पर चारों रानियां इतना रोई कि उनकी आंखों से आंसू तक सूख गए। तब से इस तालाब को नैनसुख तालाब के नाम से जाना जाने लगा। इसके बाद चारों रानियों ने यहां अपने प्राण त्याग दिए। इन रानियों का चबूतरा आज भी निनोर के नैनसुख तालाब पर बना हुआ है।
निनोर को टूरिस्ट प्वाइंट बनाने की मांग: निनोर तालाब को आदर्श तालाब के रूप में विकसित कर नौका विहार किया जा सकता है। आदिवासियों के हरिद्वार कहे जाने वाले गौतमेश्वर महादेव दर्शन के बाद शोली हनुमान मंदिर दर्शन करते हुए निनोर माताजी के दर्शन का सर्किट बना सकते हैं। मंदिर के जीर्णोद्धार का काम 7 साल से जैन संत रविंद्र विजयश्री महाराज की प्रेरणा से उनका ट्रस्ट कर रहा है।
प्राचीन नैनसुख तालाब भी है अनोखा
दलोट. पद्मावती माता की प्रतिमा।