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जागरूक हुए किसान, हर साल औसत 10 से 12 हजार किसानों के खेत की मिट्टी का परीक्षण, नतीजा उत्पादन में बढ़ोतरी, मिट्टी का स्वास्थ्य सुधरा

एक वर्ष पहले
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मृदा हेल्थ कार्ड योजना को फरवरी में पांच साल पूरे हो गए। पायलट प्रोजेक्ट के रूप में चल रही योजना के तहत एक ब्लॉक एक गांव से सभी खसरों से मिट्टी की जांच के लिए सैंपल भरे जाते थे। इसका नतीजा ये हुआ कि खरीफ और रबी में जिले में उत्पादन बढ़ा। कृषि विभाग हर साल बुवाई के लक्ष्य के अनुरूप उत्पादन भी प्राप्त कर लेता है। सोइल कार्ड में जांच के बाद किसानों को जमीन में रहने वाली कमी और उर्वकता की स्थिति के बारे में बताया जाता और साथ ही सुझाव दिए जाते। इससे किसान इन कमियों को दूर कर पाता और जमीन में केवल जरूरी खाद ही देता है। इसका असर गेहूं, चना, सरसों, मक्का सभी फसलों के उत्पादन में देखने को मिला है।

इस साल भी 2356 किसानों की मिट्टी की जांच हुई है। जो कृषि विभाग को मिले आंकड़े का शत प्रतिशत अचीवमेंट है। वर्ष 2017-2018 में 18765, वर्ष 2018-2019 में 48000 किसानों के खेतों से मिट्टी के नमूने लिए गए और मृदा हेल्थ कार्ड जारी हुए। इन नमूनों को जांच के लिए बांसवाड़ा कृषि विभाग और प्रतापगढ़ में पीपीपी मोड की लैब में भेजा जाता है। अधिकतम 15 से 20 दिन में इसके नतीजे सामने आ जाते हैं। हालांकि जिले में काली मिट्टी होने के चलते इसकी क्षमता काफी अच्छी है और जैविक खेती का रूझान भी लगातार बढ़ने से पैदावार शुरू से बढ़िया रही है।

कृषि विभाग हर साल करता है 100 प्रतिशत लक्ष्य हासिल


इस वर्ष जिले के 5 ब्लॉक से कुल 2356 नमूने लिए गए। इनमें प्रतापगढ़ पंचायत समिति के चौकड़ी गांव से सबसे ज्यादा 643, अरनोद पंचायत के सेमलखेड़ी से 488, धरियावद पंचायत के जायाखेड़ा से 191, छोटी सादड़ी के मानपुरा जागीर से 416 और पीपलखूंट के धारणा से 618 नमूने लिए गए हैं। इन सभी नमूनों की जांच कर मृदा कार्ड जारी किए जा चुके हैं। इन पांच ब्लॉक के अंदर 1583.19 हेक्टेयर जमीन थी। इनमें से कृषि गत जमीन 965.43 हेक्टेयर, सिंचित 515, असिंचित 480.43 हेक्टेयर भूमि है। इसमें 2398 खसरे कृषि योग्य थे। जबकि 42 खसरे कृषि अयोग्य होने के कारण इनके नमूने नहीं लिए गए। पिछले पांच साल से प्रत्येक वर्ष कृषि विभाग औसत 10 से 12 हजार किसानों के खेतों की मिट्टी की जांच करवाता है।


जानिए किसानों को कैसे पहुंचा फायदा


बड़ी साखथली में क्षेत्र के किसान जगदीश बम्बोरिया ने दो बीघा जमीन की मिट्टी की जांच करवाई। उन्हें पता चला कि उर्वरक की मात्रा मिट्टी में पर्याप्त है और अमरूद के लिए आदर्श जमीन है। जैविक खाद से अच्छी फसल होगी। इसके बाद इन्होंने यहां अमरूद का बगीचा लगाकर जैविक खाद से खेती की और अच्छा उत्पादन ले रहे हैं। पहले जहां प्रति हैक्टेयर में फर्टिलाइजर के लिए 1200 से 1500 रुपए तक खर्च होते थे, वहीं अब ये लागत 600 से 800 रुपए तक रह गई है।


रकबा बढ़ा, उत्पादन भी बढ़ा, जागरूक हुए किसान : जिले में इस बार 1 लाख 40 हजार हेक्टेयर में रबी बुवाई का लक्ष्य था। इसमें से 1 लाख 37200 हेक्टेयर में बुवाई की गई। पिछले साल 1 लाख 38 हजार हेेक्टेयर में बुवाई के लक्ष्य की तुलना में 1 लाख 31456 हेक्टेयर में रबी की बुवाई हुई थी। इसका सीधा असर ऐसे भी देख सकते हैं कि पिछले साल जहां 59 हजार हेक्टेयर में गेहूं बोया गया था, वहीं इस बार 71030 हेक्टेयर में गेहूं बुवाई हुई है। प्रतापगढ़ में पिछले कई साल से किसान उत्पादन में लगातार बढ़ोतरी कर रहे हैं, जबकि दूसरी तरफ कैमिकल, खाद आदि का उपयोग अपेक्षाकृत कम हो रहा है।

बड़ी साखथली. किसान के खेत में लगी गेंहू की फसल।

अब प्रति ब्लॉक पांच गांवों से जुटाए जाएंगे नमूने

सरकार ने इस योजना के पायलट प्रोजेक्ट के रूप में एक ब्लॉक एक गांव को शुरू किया था। जिले में प्रति वर्ष 2300 से 2800 मिट्टी के नमूने लिए गए और किसानों को साेइल हेल्थ कार्ड जारी किए। अब इसको लागू करते हुए सरकार वर्ष 2020-2021 से प्रति ब्लॉक 5 गांव से नमूने लेना शुरू करेगी। इसके तहत जिले के सभी ब्लॉक में 5-5 गांवों से खसरा वाइज नमूने लेकर मिट्टी की जांच कर हेल्थ कार्ड जारी किए जाएंगे।

मिट्टी में इन तत्वों की होती है जांच

कृषि विभाग के सहायक निदेशक ख्यालीलाल खटीक के अनुसार लैब में भेजी गई मिट्टी में टीएच, ईसी, आर्गेनिक कार्बन, फास्फोरस, पोटास, सल्फर, कैरिस, कॉपर, मैग्निज आदि तत्वों की जांच की जाती है। इसके बाद किसानों को जमीन में खेती के दौरान किसी खाद का कितना उपयोग करना है, इसकी जानकारी दी जाती है। प्रतापगढ़ में काली, दोमट, लाल, लेटेराइट मिक्सर मिट्टी पाई जाती है। उन्होंने बताया कि किसान अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विभाग कार्यालय आकर मिट्टी परीक्षण की जानकारी ले सकते हैं।

अपने स्तर पर भी किसान 5 रुपए में करवा सकता है मिट्टी की जांच

मृदा हेल्थ कार्ड योजना

पहले पायलट प्रोजेक्ट के तहत एक ब्लॉक एक गांव से लिए जाते थे मिट्टी के नमूने, प्रोजेक्ट की सफलता का दिखने लगा असर

मिट्टी की जांच से किसानों को बहुत से फायदे हैं। कम खर्च में अच्छी पैदावार होती है। विभाग लगातार किसानों को जागरूक करने का काम भी कर रहा है। मिट्टी का स्वास्थ्य सही रहने से किसानों को इसका सीधा लाभ मिलेगा।
-मनोहर तुषावड़ा, डिप्टी डायरेक्टर, कृषि विस्तार विभाग

निनोर, अम्बेड़ी की किसान शीतल कान्ता बैरागी ने भी मिट्टी परीक्षण करवाया। उन्होंने बताया कि पहले अंधाधुंध कैमिकल के उपयोग से जमीन खराब हो गई थी। बाद में परीक्षण में पता चला कि फर्टिलाइजर के कम उपयोग से ज्यादा अच्छी फसल होगी। पहले प्रति हेक्टेयर जैसे 4 से 6 बोरी गेंहू होते थे, अब 8 से 10 बोरी गेहूं का उत्पादन होने लगा है।
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