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भगवान जिनेंद्र के 1024 गुणों की पूजा, रथयात्रा निकाली
श्रीमहावीर दिगंबर जैन मंदिर में आचार्य सुनीलसागर महाराज ससंघ मुनि शुभमसागर महाराज, मुनि सक्षमसागर महाराज के सानिध्य में, प्रतिष्ठाचार्य हंसमुख जैन के निर्देशन में सिद्ध चक्र महामंडल विधान का समापन हुआ। इसमें प्रतिष्ठाचार्य विशाल जैन ने जिनेंद्र भगवान की आराधना करते हुए, 1024 गुणों की पूजा की। इसमें सोधर्म इंद्र धनपाल वक्तावत, कुबेर इंद्र चेतन कुमार, महायज्ञ नायक इंद्र संजय कुमार, इशान इंद्र अनिल कुमार, सनत इंद्र ललित कुमार वक्तावत परिवार सहित श्रावक-श्राविकाओं ने शांतिधारा, नित्य नियम पूजन, सिद्ध परमेष्ठि के अर्घ्य चढ़ाए। शाम को शास्त्र सभा, आरती हुई। मंदिर परिसर में विश्व शांति के लिए महायज्ञ हुअा। मुनि सक्षमसागर महाराज ने कहा कि व्यक्ति को अपनी सोच को अच्छा बनाना चाहिए। समापन पर जिनेंद्र भगवान की रथयात्रा महावीर जैन मंदिर से निकाली। इसमें जगह-जगह श्रावक श्राविकाओं ने मुनि संघ के दर्शन किए अाैर आशीर्वाद लिया। रथयात्रा नगर के प्रमुख मार्गों से होकर फिर से मंदिर पहुंची। जहां विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम हुए।
गुरुदेव नवर| सागर सूरीश्वर का जन्मोत्सव आज
प्रतापगढ़। गुरुदेव नवर| सागर सूरीश्वर महाराज का जन्मोत्सव 12 मार्च को मनाया जाएगा। इस अवसर पर कई कार्यक्रम हाेंगे। नवर| परिवार के प्रदेश अध्यक्ष अमित भैरविया, प्रदेश प्रचार-प्रसार मंत्री निलेश सेठिया ने बताया कि मालवा के आचार्य नवर| सागर सूरीश्वर का 77वां जन्मोत्सव मनाया जाएगा। आचार्य सुनील सागर और गणाधीश विनय कुशल मुनि से कार्यक्रम में पधारने की विनती की। सुबह साढ़े 8 बजे गणाधीश की निश्रा में भक्तामर पाठ का आयोजन किया जाएगा। इसके बाद आचार्य श्री का आगमन और प्रवचन होंगे।
आचार्य विश्व र| सागर ने की जैन उपाश्रय की शुरुआत
अरनोद। आचार्य विश्व र| सागर ने मंदिर परिसर में बने जैन उपाश्रय का शुभारंभ किया। इस अवसर पर चल समारोह किया गया, जिसमें होली उत्सव धूमधाम से मनाया गया। चल समारोह जैन मंदिर से शुरू होकर कस्बे के सदर बाजार, महल रोड़, बस स्टैंड होते हुए जैन मंदिर पहुंचा, जहां पूजन पढ़ाई गई। शाम को स्वामी वात्सल्य का आयोजन हुआ।
संस्कार निर्माण माता के हाथ में: सुनील सागर
अरनोद. जैन उपाश्रय के उद्घाटन के दौरान मौजूद मुनि और लोग।
प्रतापगढ़. प्रवचन देते आचार्य सुनील सागर महाराज।
प्रतापगढ़। जूना मंदिर में ससंघ विराजित सुनील सागर ने प्रवचनों में कहा कि जिसकी ऊंचाई का कोई पार नहीं उसको आसमां कहते हैं और जिसकी गहराई का कोई पार नहीं उसे मां कहते हैं। हमारे समाज में मातृ देवो भव: कहा गया है। यानि माता देवता के समान है। गुरु श्रीआदि सागर से लेकर अब तक जितने भी बड़े संत हुए हैं उन सभी संतों के जीवन निर्माण में मां का बहुत बड़ा हाथ रहा। मां के संस्कारों से ही जीवन का निर्माण होता है। हम सौभाग्यशाली है कि हमने श्रेष्ठ संस्कृति पाई है। हमारी संस्कृति में कहा गया है यत्र नारीस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता। धन की सत्ता लक्ष्मीजी के पास है। शक्ति की सत्ता माता दुर्गा के पास है। वहीं विद्या की सत्ता मां सरस्वती के पास है।
उन्होंने कहा कि मांसाहार का दुष्परिणाम कोरोना वायरस के रूप में सामने आ रहा है। ये सभी मांसाहारी राक्षस कोरोना से बचने के लिए मांसाहार को छोड़ने के स्थान पर हाथ मिलाना छोड़ रहे हैं। हमारी संस्कृति में हाथ जोड़कर प्रणाम किया जाता हैं। हाथ मिलाने और चूमने की परंपरा एक प्रकार से जर्म्स ट्रांसफर करने की प्रक्रिया है। व्यक्ति के थूक से, सांस से, हाथ से जर्म्स यानि कीटाणु एक-दूसरे में ट्रांसफर होते हैं। मानव सभ्यता को अगर जिंदा रहना है तो शाकाहार अपनाना ही पड़ेगा। भटकना बहुत आसान है, लेकिन सही रास्ते पर चलना बहुत मुश्किल है। अपने भगवान को, अपने गुरु को अवश्य पूजें, लेकिन स्वयं को भी पहचानें।
धरियावद. रथयात्रा में शामिल मुनि और समाज के लोग।