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‘रानी पद्‌मावती को सपने में भी कोई बुरी नजर से देख लेता तो आंखें चीर लेे’

दैनिक भास्कर के विशेष आमंत्रण पर इितहासकार और कवि उसी जौहर स्थल पर आए और अपने शब्दों में शौर्यगाथा लिखी...

Dainik Bhaskar

Nov 17, 2017, 07:29 AM IST
poets and historians about rani padmavati

चित्तौड़गढ़. फिल्म ‘पद्‌मावती’ विवादों में हैं। दैनिक भास्कर ने अमर ज्योत पद्मावती में रानी के शौर्य से अवगत कराया था। बुधवार को चित्तौड़ के उसी वैभवशाली स्थल पर ले जाकर इतिहासकार, कवियों से सच्चाई जानी और उन्हीं के शब्दों में गौरव गाथा लिखवाई। सबका मानना है कि पद्मिनी अमर इतिहास हैं, जिन पर कोई सवाल या संदेह का प्रश्न ही नहीं है। रानी पद्मिनी (पद्मावती) हर राजस्थानी के स्वाभिमान और सम्मान को बयां करती जीती जागती तस्वीर है। वीरता, साहस और शौर्य की मिसाल है। कवि व इतिहासविद् उन्हें हर रचना में जिंदा रखे हुए हैं। रचनाओं व किताबों में कई एेसे तथ्य हैं जो यह बताते हैं कि पद्मिनी अमर इतिहास हैं।

पैनल में कवि पं. नरेंद्र मिश्र, अब्दुल जब्बार सहित इतिहास की जानकार डॉ. सुशीला शामिल थीं। कवि नरेंद्र मिश्र कहते हैं मैं मेवाड़ की हीराेइन पद्मिनी को जानता हूं। फिल्म की हीरोइन पद्मिनी को नहीं जानता। यदि उनके बारे में कुछ भी फिल्मा रहे हैं तो बहुत सोच समझकर ही करना चाहिए। मेवाड़ के दो बड़े चरित्र प्रताप और पद्मिनी अतुल्य हैं। पद्मिनी नारी अस्मिता की मनीषी हैं।

रानी ने जीवन में घूंघट भी नहीं उठाया, कोई क्या कांच में शक्ल भी देखेगा, अद्‌भुत शक्ति है यहां

पूर्व प्रो. हिंदी पीजी काॅलेज से और इतिहास लेखिका डॉ. सुशीला लड्‌ढ़ा के मुताबिक, मैं अभी जौहर स्थल पर बैठी हूं। यहां बरबस एक अदभुत शक्ति और ऊर्जा अनुभव कर रहीं हूं, पर यह अनायास नहीं है। दुर्ग आलौकिक अनुभूति देता रहा है। क्योंकि पद्मिनी का इतिहास किताबों में नहीं अपितु दुर्ग के जर्रे-जर्रे में है। क्योंकि यहां अाने पर इसका अहसास होता है। दो दिन पहले जैन संत सौभाग्य मुनि से मेरा वार्तालाप हो रहा था। तब उन्होंने भी सहज ढंग से स्वरचित मुक्तक सुनाया......
चरित्र रक्षा हित जो आग की चिता में जल गई।
16 सहस्त्र स्त्रियों के साथ जो राख में मिल गई।
ऐसी नारी रत्न वीरांगना के लिए कोई उपमा नहीं।
अनुपमेय है पद्मिनी जो इतिहास रच गयी।।
आज उसी रानी पद्मिनी के चरित्र पर सवाल उठा रहे हैं। तब मैं कहना चाहती हूं ‘रानी पद्‌मावती वो स्वाभिमानी क्षत्राणी जिसे सपने में भी कोई बुरी नजर से देख लेता तो आंखें चीर लेे’। नैणसी री ख्यात, कर्नल जेम्स टॉड कृत आइने अकबरी, तारीखे फरिश्ता व राजप्रशस्ति आदि में भी पद्मिनी पर विशद वर्णन उपलब्ध है। इितहास गवाह है कि जीवन में रानी ने राणा रतनसिंह के अलावा किसी और के सामने घूंघट भी नहीं उठाया। एेसे में कांच में देखना मुमकिन नहीं था।

हर राजस्थानी का मत्था रानी के जौहर स्थल पर झुकता है, क्योंकि वे हमें निडरता व बलिदान की सीख देती हैं

कवि और गीतकार अब्दुल जब्बार (जौहर स्थल से) ने कहा कि हर राजस्थानी का मत्था रानी के जौहर स्थल पर झुकता है, क्योंकि वे हमें निडरता व बलिदान की सीख देती हैं। मैं अभी जौहर स्थल पर खड़ा हूं। हल्की सर्द हवा मेरे कानों में ठंडक घोल रही है। वो मानो उस दौर की कहानी कह रही है। रानी पद्मावती। जिनके नाम के साथ ही मेरा मत्था उनके सम्मान में झुकता है। शौर्य की साक्षात कहानी है। मेवाड़ के शौर्य और बलिदान को ‘पद्मावती’ में छेड़ा गया है, जो ठीक नहीं है। क्योंकि मेवाड़ के इतिहास ने देशभर को सीख दी है। रानी पद्मिनी का इतिहास हमें निडरता और बलिदान की वो सीख देता है, जो देश-दुनिया में मिलना मुश्किल है। मेरी रचनाओं में भी यह संदर्भ सार है।

चंद्रमा के कटोरे में भर चांदनी, उसमें परियों का सौंदर्य डाला गया
भोर की पहली किरणों ने कलियों से मिल, राजरानी का रंग रूप ढाला गया
अपने हाथों से जिसने तराश जिसे, उस विद्याता ने बरसों तलाशा जिसे
अति सुंदर समझदार थी पदमिनी, जिसे फूलों में नाजों से पाला गया
देश नारी धरम की प्रबल प्रेरणा, उच्च सम्मान से देखा भाला गया
गर्व गौरव वो मेवाड़ की शान थी, प्रण-प्रण से की रक्षा संभाला गया
भव्य सौंदर्य में रूप मेवाड़ का, डर था आंचल को बैरी से खिलवाड़ का
जौहर की ज्वाला में कुंदन हुई, जिसका संसार भर में उजाला गया।
‘मैं हर बार यहां आऊंगा और रानी की जसगाथा गाऊंगा।’

इतिहास नहीं वर्तमान भी गवाह है कि खुदाई में मिली थी राख-चूड़ियां, सरकार ने माना जौहर स्थल

दुर्ग में वरिष्ठ फोटोग्राफर और गाइड केके शर्मा ने बताया कि मेरे पिता स्व. बंशीलाल शर्मा जब जौहर के सबूत जुटाए गए तब मौजूद थे। आधिकारिक फोटो उन्होंने ही लिए थे। विजयस्तंभ के पास 1958-59 में खुदाई के दौरान मिट्‌टी से राख, हड‌्डियां व चूड़ियां मिली। इसकी जांच के बाद ही पुरातत्व विभाग ने इसे जौहर स्थली घोषित किया। बाद में जौहर संस्थान ने यहां हवन कुंड भी बनवाया। मेरे पिता इसी परिसर में प्राचीन समिद्वेश्वर महादेव मंदिर की सेवा पूजा करते थे। उन्होंने बताया था कि खुदाई के समय यह मंदिर 15 फीट मिट्टी से दबा था। साफ सफाई के बाद यहां नए सिरे से पूजा अर्चना शुरू हुई।

इतिहास के जानकार डाॅ. एएल जैन के मुताबिक, जो लोग पद्मिनी के इतिहास को मात्र जायसी का उपन्यास बता खारिज करते हैं। यह कल्पना होती तो जायसी के कथानक में सभी चरित्र वे ही नहीं होते। इतिहासकार सोमाणी ने किताब में जिक्र किया है कि पुरातत्व विभाग की खुदाई में गढ़ पर राख व हडि्डयां निकली थीं। यहां शाका का जिक्र है।

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