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शहर से उठे विरोध ने कर दिया पूरे जिले मेें सफाया

Bhaskar News Network | Last Modified - Feb 02, 2018, 06:40 AM IST

अलवर. रामगढ़ विधानसभा क्षेत्र के मतगणना कक्ष में पूर्व जिला प्रमुख सफिया खान मतों की जानकारी लेती हुई। भास्कर...
अलवर. रामगढ़ विधानसभा क्षेत्र के मतगणना कक्ष में पूर्व जिला प्रमुख सफिया खान मतों की जानकारी लेती हुई।

भास्कर संवाददाता | अलवर

अलवर शहर के मतदाताओं ने अपना गुस्सा जाहिर किया और कांग्रेस के डॉ. करण सिंह यादव को 25 हजार 457 वोटों से जीत मिली। करण सिंह को अलवर शहर से 78 हजार 174 वोट मिले जबकि भाजपा प्रत्याशी डॉ. जसवंत यादव को 52 हजार 717 वोटों से ही संतोष करना पड़ा। अलवर शहर विधानसभा में कांग्रेस के करण सिंह ने शुरुआत से ही बढ़त बनाए रखी और जीत का यह सिलसिला अंत तक जारी रहा। पहले राउंड में आधे वोटों से बढ़त का चक्र अंत तक नहीं टूटा और जीत के अंतर की दीवार मतगणना समाप्त होते-होते बढ़ती गई और 25 हजार 457 वोटों से भाजपा को करारी हार मिली। किसी भी राउंड में शहर से भाजपा को बढ़त नहीं मिल पाई। शहर से उठा विरोध पूरे जिले से भाजपा का सफाया कर गया। 2014 के आम चुनावों में अलवर शहर से भाजपा प्रत्याशी चांदनाथ को 97 हजार 930 वोट मिले थे, जो इस बार 52 हजार 717 पर सिमट गए।

युवाओं का मतदान के लिए नहीं जाना : उपचुनाव में भाजपा की हार का प्रमुख कारण यह भी रहा कि युवा मतदाताओं ने मतदान में रुचि नहीं दिखाई। उपचुनाव में पंजीकृत आधे युवाओं ने ही मतदान किया। इससे दो बातें साफ हो रही हैं। नोटा काे सबसे ज्यादा वोट जाना युवाओं का रुख मोड़ रहा है और दूसरा निराश होकर वोट देना ही उचित नहीं समझा। अलवर में 18 से 19 वर्ष के 90 हजार 336 युवा मतदाता पंजीकृत थे। इनमें से वोट डालने के लिए 47 हजार 994 मतदाता ही पहुंचे। इसके अलावा 20 से 29 वर्ष के पंजीकृत 6 लाख 51 हजार मतदाताओं में से करीब ढाई लाख ने ही मतदान किया। इसका सीधा नुकसान भाजपा को हुआ।

प्राइवेट स्कूल संचालकों की अनदेखी : शहर में प्राइवेट स्कूलों के संगठन स्कूल शिक्षा परिवार के प्रदेशाध्यक्ष अनिल शर्मा द्वारा विभिन्न मांगों को लेकर किए गए शक्ति प्रदर्शन को सरकार ने हल्के में लिया। यह विरोध शहर से शुरू होकर पूरे जिले में पहुंचा और लोग संगठित हुए। स्थानीय नेताओं ने संगठन को सही फीडबैक नहीं दिया और नजरअंदाज करते रहे। अंतिम समय में कुछ बात बनी, लेकिन जितनी तैयारी सरकार को हराने की हो चुकी थी, वह समझौते के बाद जिताने में नाकाफी साबित हुई।

क्यों हुई शहर से भाजपा की हार

टूटी सड़कें, पानी की समस्या, विधायक के व्यवहार को लेकर व्यक्तिगत रूप से विरोध ईवीएम तक पहुंचा। शहर में सीवरेज के काम के दौरान उड़ती धूल ने भाजपा को नुकसान पहुंचाया। पार्टी के पार्षदों द्वारा क्षेत्र की मांगों को लेकर किए गया प्रदर्शन भी इस बार चुनावी हार में देखा गया। बड़ी बात यह भी रही कि व्यापारी वर्ग में भी काफी असंतोष रहा। शहर विधानसभा में हुए ब्राह्मणवाद व शहर के कार्यकर्ताओं की अनदेखी का मैसेज जिलेभर में गया और हार का मुंह देखना पड़ा। तमाम रणनीतियों का शहर में बैठकर तय होना, वोटिंग का प्रतिशत कम रहना साफ जाहिर करता है कि लोग मतदान को लेकर कोई खास उत्साहित नहीं थे। ऐसे में वो वोट डालने ही नहीं गए। उनकी नाराजगी साफ दिखी। लोगों में आक्रोश शहर विधायक द्वारा जनसुनवाई का समय तय रखना भी रहा। क्योंकि 10 बजे बाद लोग किससे मिलें इसका कोई समाधान नहीं था। विधायक की जनसुनवाई 8 से 10 बजे तक ही रहती थी। इसके अलावा नगर परिषद में दखल के बावजूद चेयरमैन की निष्क्रियता, सफाई, कॉलेजों में गुंडागर्दी का माहौल, छात्राओं की असुरक्षा, कॉमर्स कॉलेज को जमीन नहीं मिलना, अलवर अरबन कॉपरेटिव बैंक में लोगों के फंसे पैसे को निकलवाने में विधायक सहित सरकार की निष्क्रियता, शहर में स्थापित प्रारंभिक शिक्षा विभाग की स्कूलों में शिक्षकों का नहीं होना ऐसे बड़े मुद्दे रहे, जिन्होंने हार के अंतर को बड़ा कर दिया। मत्स्य यूनिवर्सिटी की बिल्डिंग का नहीं बनना, यूनिवर्सिटी में लगातार हुई धांधलियों के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं होना, रिजल्ट सहित ऐसे कई मुद्दे रहे जिन्होंने युवाओं को निराश किया। बड़ी बात यह भी रही कि युवाओं ने वोट कम डाले और जो डाले वो सरकार के विरोध में रहे।

कांग्रेस शहर से क्यों जीती

शहर विधायक से लोगों की नाराजगी, कांग्रेस को लेकर भाजपा द्वारा की गई बयानबाजी ने कांग्रेस को फायदा पहुंचाया। इसके अलावा ईएसआईसी हॉस्पिटल का शुरू नहीं होना, लोगों के राशन कार्ड समय पर नहीं बनना, पेंशन बंद हो जाना, पेंशनर्स का दवा के लिए परेशान होना आदि ऐसे कारण रहे जिन्होंने कांग्रेस को फायदा पहुंचाया।

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Web Title: शहर से उठे विरोध ने कर दिया पूरे जिले मेें सफाया
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