Hindi News »Rajasthan »Rani» खुशामद करने से चीन का रवैया नहीं बदलेगा

खुशामद करने से चीन का रवैया नहीं बदलेगा

शी जिनपिंग के ‘आजीवन राष्ट्रपति’ के रूप में उभरने के साथ भारत के सबसे महत्वपूर्ण पड़ोसी के यहां एक नई राजनीतिक...

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 31, 2018, 06:10 AM IST

खुशामद करने से चीन का रवैया नहीं बदलेगा
शी जिनपिंग के ‘आजीवन राष्ट्रपति’ के रूप में उभरने के साथ भारत के सबसे महत्वपूर्ण पड़ोसी के यहां एक नई राजनीतिक व्यवस्था आकार ले रही है। वे दिन हवा हुए जब कहा जाता था कि चीन अपना वक्त लेगा। नया नेतृत्व न सिर्फ अपने आसपास बल्कि देश की सीमाओं से बहुत दूर तक अपनी शक्ति दिखाने की जल्दी में लगता है। देंग शियाओपिंग की पुरानी व्यवस्था ने बहुत सावधानी से मिडिल किंगडम को एक व्यक्ति के शासन की असुरक्षितताओं से बचाने की कवायद के तहत कुछ कदम उठाए थे। लेकिन, वह सब अब कूड़ेदान में डाला जा चुका है। उसकी जगह अत्यधिक केंद्रीकृत, हायरार्की आधारित और एकाधिकारवादी राजनीतिक व्यवस्था उभरी है, जिसके केंद्र में शी जिनपिंग हैं।

शी ने अपना दूसरा कार्यकाल पिछले साल अक्टूबर में पांच साल में एक बार होने वाली पार्टी कांग्रेस के अंत में पार्टी और सेना प्रमुख के रूप में शुरू किया। उनकी वास्तविक अधिकार-शक्ति कम्युनिस्ट पार्टी के जनरल सेक्रेटरी और शक्तिशाली सेंट्रल मिलिटरी कमीशन का प्रमुख होने में निहित है। जनरल सेक्रेटरी ऐसा पद है जिसके कार्यकाल की कोई सीमा नहीं है। उनका राजनीतिक सिद्धांत, ‘शी जिनपिंग थॉट्स ऑन सोशलिज्म विद चाइनीज कैरेक्टराइस्टिक्स फॉर न्यू एरा’ अब संशोधित संविधान का अंग है। नेशनल पीपल्स कांग्रेस ने जब शी जिनपिंग को अनिश्चितकाल तक राष्ट्रपति बने रहने का अधिकार देने वाले संविधान संशोधन को जबर्दस्त समर्थन के साथ पारित किया तो शी अधिकृत रूप से माओ त्से तुंग के बाद अब तक के सबसे शक्तिशाली नेता बन गए। शी के निकट सहयोगी वांग किशान को उपराष्ट्रपति बना दिया गया, जो पहले भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के प्रभारी थे। इसके साथ सरकारी ढांचे में भी बड़े पैमाने पर बदलाव किए जा रहे हैं और कांग्रेस उन्हें शी की प्राथमिकताओं के अनुसार पारित कर रही है। इसमें भ्रष्टाचार पर प्रहार, अर्थव्यवस्था को स्थिरता देने और पर्यावरण संरक्षण जैसी बातें शामिल हैं। इन नए कदमों और पुनर्गठन में एक शक्तिशाली नया वित्तीय नियामक स्थापित करने की योजना भी है, जो जाहिर है वित्तीय स्थिरता के उद्‌देश्य को ध्यान में रखकर होगा।

इस पुनर्गठन में सरकार को चुस्त रखने के उद्‌देश्य से मंत्रीस्तरीय संस्थाओं की संख्या आठ से घटा दी गई है ताकि डिलिवरी को कुशल बनाया जा सके। वित्तीय जोखिम और फंसे हुए कर्ज की बढ़ती चिंता पर ध्यान देने के लिए नया बैंकिंग और बीमा नियामक आयोग बनाया जा रहा है। विदेश नीति के मोर्चे पर एक नई अंतरराष्ट्रीय विकास सहयोग एजेंसी विदेशी सहायता पर चीन द्वारा खर्च किए जा रहे अरबों डॉलर की प्राथमिकताएं तय करेंगी। इसमें महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के हिस्से भी शामिल हैं। अब दुनिया को कहीं अधिक अात्मविश्वास से भरा चीन दिखाई दे रहा है, जो अपने राजनीतिक नेतृत्व कौशल को लेकर बिल्कुल निश्चिंत है। पश्चिम एक नई वास्तविकता का सामना कर रहा है कि चीन में लोकतंत्र की जितनी भी उम्मीद उसे थी, उसकी तुलना में यह पहले से कहीं अधिक एकाधिकारवादी हो गया है। आर्थिक उदारवाद पर सवार होकर लोकतंत्र आने की उदारवादी धारणा पूरी तरह गलत निकली और अभी यह स्पष्ट नहीं है कि अपनी खामियों में पूरी तरह उलझे हुए पश्चिम में चीन की महत्वाकांक्षाओं का जवाब देने की योग्यता और इच्छा है भी या नहीं। इस समूह का लीडर अमेरिका ट्रम्प प्रेरित घरेलू नाटक में इतना भटक गया है कि उसके पास बीजिंग के प्रति सुसंगत नीति तय करने का वक्त नहीं है, फिर चाहे वह कभी सहयोग का हाथ बढ़ाता और कभी आक्रामक होता रहा हो। इसीलिए आने वाले वर्षों में भारत जैसे देश को और भी कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ेगा।

दुर्भाग्य से हम भी अपनी चीनी नीति में बढ़ती असंबद्धता के संकेत दे रहे हैं। वह भी ठीक उस वक्त जब सुसंगति और स्पष्ट दृष्टि की सबसे ज्यादा जरूरत है। नई दिल्ली में 1 अप्रैल 2018 को पूर्व निर्धारित ‘थैंक्यू इंडिया’ कार्यक्रम में सरकारी अधिकारियों को जाने से हतोत्साहित करना और फिर प्रचार करना कि यह जनसंम्पर्क संबंधी बड़ी भूल थी। बिना यह समझे कि इससे चीन से रिश्ते कैसे मजबूत होंगे। मालदीव में नई दिल्ली ने तय किया कि वहां अपने हितों पर जोर देना चीन को उकसाने जैसा होगा, इसलिए हम पीछे हट गए और चीन को हमारे ऊपर से होकर वहां जाने दिया।

दिल्ली में एक विचार-समूह को इसका सालाना सम्मेलन स्थगित करने को कहा गया, सिर्फ इसलिए कि वहां होने वाला विचार-विमर्श चीन को रुष्ट कर सकता था। चीन की प्रतिक्रिया भी अनुमान के मुताबिक रही। उसके विदेशमंत्री वांग यी ने हमेशा के जुमलों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि अब वक्त आ गया है कि चीनी ड्रेगन और भारतीय हाथी एक-दूसरे से लड़ने की बजाय मिलकर डॉन्स करें। उनका मंत्र था, ‘यदि चीन और भारत एकजुट हुए तो एक और एक दो नहीं, 11 होंगे।’ इस तरह के घिसेपिटे जुमलों का मतलब जो कहा जा रहा है उससे ठीक उलटा होता है, वह यह कि द्विपक्षीय संबंधों में कोई उम्मीद नहीं है।

पिछले दो दशकों में चीनी खतरे की उपेक्षा करके भारतीय नीति निर्धारकों ने न सिर्फ चीन के साथ भरोसे की खाई को गहरा किया है बल्कि उन मुद्‌दों पर भी चीन के सामने खड़ा होना एक तरह से असंभव बना दिया है, जो देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। दोनों के बीच शक्ति का अंतर खतरनाक दर से बढ़ रहा है। चीन सैन्य साजो-सामान में पूरी तरह आत्मनिर्भर होकर उनका निर्यात करने लगा है। हवाई टेक्नोलॉजी में तो वह अमेरिका को पीछे छोड़ने की दहलजी पर पहुंच गया है। इस विशाल खाई को कुछ वर्षों के वक्त में भरा नहीं जा सकता लेकिन, जिस तरह से हमारी हथियारों की खरीद और रणनीतिक सोच विकसित हो रही हैं उससे यह काफी हद तक स्पष्ट हो जाता है कि नीतिगत स्तर पर कुछ ही लोगों की रुचि इस खाई को पाटने में है। यह चिंताजनक स्थिति है और खतरे से आंख मंूद लेने जैसा है। नई दिल्ली के पास इसके अलावा कोई विकल्प नहीं है वह फुर्ती से चीन-भारत संबंधों को मैनेज करे। लेकिन, चीन की काल्पनिक अथवा वास्तविक चिंताओं पर उसकी खुशामद करने से भूतकाल में चीन का व्यवहार नहीं बदला था और न इससे चीन-भारत रिश्तों में आज कोई ‘विराम’ की स्थिति आएगी। (लेखक के अपने विचार हैं।)

हर्ष वी. पंत

प्रोफेसर, इंटरनेशनल रिलेशन्स किंग्स कॉलेज, लंदन

harsh.pant@kcl.ac.uk

दैनिक भास्कर पर Hindi News पढ़िए और रखिये अपने आप को अप-टू-डेट | अब पाइए Rani News in Hindi सबसे पहले दैनिक भास्कर पर | Hindi Samachar अपने मोबाइल पर पढ़ने के लिए डाउनलोड करें Hindi News App, या फिर 2G नेटवर्क के लिए हमारा Dainik Bhaskar Lite App.
Web Title: खुशामद करने से चीन का रवैया नहीं बदलेगा
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

More From Rani

    Trending

    Live Hindi News

    0

    कुछ ख़बरें रच देती हैं इतिहास। ऐसी खबरों को सबसे पहले जानने के लिए
    Allow पर क्लिक करें।

    ×