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युवाओं को उन्हीं के तरीके से पुरानी संस्कृति के साथ जोड़ें

वे खुद युवा हैं- 36 साल के। उनमें वह प्रतिभा है, जो उनके परिवार में पीढ़ियों से किसी में नहीं थी। इसे 31 साल पहले पहचाना...

Dainik Bhaskar

Mar 05, 2018, 06:10 AM IST
युवाओं को उन्हीं के तरीके से पुरानी संस्कृति के साथ जोड़ें
वे खुद युवा हैं- 36 साल के। उनमें वह प्रतिभा है, जो उनके परिवार में पीढ़ियों से किसी में नहीं थी। इसे 31 साल पहले पहचाना गया और पिछले 23 वर्षों से वे पेशेवर तौर पर प्रस्तुति दे रहे हैं। मुंबई को शनिवार रात मुझे उनके कर्नाटक संगीत सम्मेलन में जाने का मौका मिला। उनके परिवार का झुकाव बांसूरी की तरफ है, सिक्किल गुरुचरण की तरह गायन की ओर नहीं। यानी परिवार वादन में लगा है तो उसका यह युवा सदस्य गायन में।

मैंने अब बंद हो चुकी पेड रेडियो सर्विस वर्ल्डस्पेस रेडियो पर गुरुचरण को रेडियो जॉकी के रूप में उनके 24 घंटे के कर्नाटक संगीत के म्यूज़िक चैनल ‘श्रुति’ में सुना है। फिर अचानक एक दिन वे ‘वर्ल्डस्पेस रेडियो’ से गायब हो गए, क्योंकि उनका रेडियो स्टेशन चेन्नई से बेंगलुरू आ गया, जबकि गुरुचरण ने कर्नाटक संगीत के गढ़ चेन्नई में बने रहने का फैसला किया ताकि अपने जुनून की दिशा में आगे बढ़ सकें। हालांकि, वे भारत में कर्नाटक संगीत के अग्रणी युवा गायक बन गए हैं, लेकिन शनिवार तक मुझे उन्हें सीधे सुनने का मौका नहीं मिला था।

गुरुचरण के गायन की अजीब-सी शैली है। वे प्रस्तुति के दौरान अपने दोनों हाथ दो भिन्न दिशाओं में ले जाते हैं जो किसी के लिए भी कठिन है- ऐसे जैसे कोई हवा में पेंटिंग बना रहा है और वह भी दो अलग-अलग पेंटिंग। वहां मौजूद युवाओं को उनके हाथों की ये मुद्राएं मजेदार लगीं। जब मैंने संगीत के नियमित श्रोताओं में से एक से यह बात कही तो उन्होंने मुझे इन गायन मुद्राओं से संबंधित एक कहानी सुनाई।

गुरुचरण एक बार 15 दिवसीय टुअर के दौरान देहरादून में प्रस्तुति दे रहे थे। यह टुअर युवा भारत में हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत प्रसारित करने के लिए आयोजित था। देहरादून बोर्डिंग स्कूल के लड़कों को तो यह भी नहीं पता था कि इस तरह के किसी संगीत का वजू़द भी है। इसलिए जब उन्होंने अपनी प्रस्तुति शुरू की तो स्कूल का एक लड़का बेकाबू होकर रूमाल से मुंह छिपा-छिपाकर हंसने लगा। दुर्भाग्य से वह दूसरी ही कतार में बैठा था और स्टेज पर प्रस्तुति दे रहे गुरुचरण उसे हंसते हुए देख पा रहे थे। उसकी हंसी संक्रामक ढंग से आस-पास बैठे उसके दोस्तों में भी फैल रही थी। एक या दो गीतों के बाद गुरुचरण ने उस लड़के को स्टेज पर ‘तानपुरे’ से उनका साथ देने के लिए आमंत्रित किया। आइडिया यह था कि कोई भी वाद्य बजाने के लिए श्रोताओं में से वालंटियर आमंत्रित किए जाए ताकि उन्हें भरोसा दिलाया जा सके कि कलाकारों का उनसे इंटरेक्ट करना और उन्हें उस सबका साक्षात अनुभव देना, जो स्टेज पर होता है, बिल्कुल सामान्य (यानी पागलपन नहीं) है। दूसरा कारण उस लड़के की हंसी को अन्य लड़कों में फैलने से रोकना भी था। यदि उसी लड़के के साथ गंभीर इंटरेक्शन किया जाए तो अन्य लड़कों में भी गंभीरता आ जाएगी।

गुरुचरण ने जब उससे पूछा कि वह अपनी हंसी क्यों नहीं रोक पा रहा है तो शुरू में तो वह लड़का हक्का-बक्का रह गया लेकिन, फिर बेबाकी से कह दिया, ‘आपके हाव-भाव के कारण सर!’ गुरुचरण जान गए कि यह ईमानदारी भरा जवाब है, क्योंकि हमारे देश के ज्यादातर शास्त्रीय गायक चेहरे बनाते हैं और अपने शरीर व हाथों को विभिन्न मुद्राओं में घुमाते है। हालांकि, गायक के लिए हाथों व भुजाओं की मुद्राएं संगीत का रचनात्मक पहलू है, युवाओं को यह अजीब हरकत लगती है।

गुरुचरण ने तत्काल उस लड़के से कहा कि वह अपने स्कूल और शिक्षकों के बारे में कुछ कहे। उसने दो मिनट के भाषण में पूरा वर्णन कर दिया और अपनी बात को रखने के लिए दोनों हाथ मुक्त रूप से लहराए। गुरुचरण ने उसकी वे मुद्राएं कैमरे में पकड़ लीं और फिर वीडियो चलाकर कहा, ‘मेरे छोटे दोस्त, ठीक यही हम संगीतकार भी करते हैं। हम अपनी भाषा में वर्णन करते हैं। हमें जो सिखाया गया है और उस क्षण में हम जो सोच रहे होते हैं, यह उसकी सांकेतिक भाषा है। इस तरह हम प्रस्तुति के दौरान दोनों में नाज़ुक संतुलन स्थापित करते हैं।’ युवा श्रोता तत्काल उससे खुद को जोड़ पाए। जब तक संगीत का कार्यक्रम खत्म होता, ज्यादातर हमारे युवा श्रोता इस बात से वाकिफ हो गए कि हमारे गायक क्यों चेहरा या कुछ मुद्राएं बनाते हैं, जिसे भारतीय शास्त्रीय संगीत का रचनात्मक पक्ष माना जाता है।

फंडा यह है कि  हमारी पुरानी संस्कृति को समझाने के लिए युवा भारतीयों को उनके ही तरीके से इसके साथ जोड़ें। उनकी ही शैली में समझाने से वे चीजों को आसानी से आत्मसात कर लेते हैं।

एन. रघुरामन

मैनेजमेंट गुरु

raghu@dbcorp.in

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युवाओं को उन्हीं के तरीके से पुरानी संस्कृति के साथ जोड़ें
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