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तिब्बत का नया साल बौद्ध धर्म आने की खुशी में मनता है

ल्हासा| तस्वीर तिब्बत के टोंग्रेन काउंटी की है। यहां रॉन्गवो मठ में चीन के विरोध के बावजूद बड़े धूमधाम से नए साल का...

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 05, 2018, 06:10 AM IST

ल्हासा| तस्वीर तिब्बत के टोंग्रेन काउंटी की है। यहां रॉन्गवो मठ में चीन के विरोध के बावजूद बड़े धूमधाम से नए साल का जश्न मनाया जा रहा है। चीन ने सीमित दायरे में नव वर्ष मनाने को कहा था। उत्सव की तैयारी कर रहे लोगों को हिरासत में भी लिया। विदेशी मेहमानों को आने से रोक दिया गया। बावजूद इसके मठ ने दोगुनी जोश के साथ नव वर्ष मनाया। कहा कि चीनी दखल हमारी सदियों पुरानी परंपरा को खत्म नहीं कर सकती।

चीन ने बंदिशें लगाई, लोगों को हिरासत में लिया, विदेशियों को आने से रोका, फिर भी...

तिब्बत ने 1300 साल पुराना त्योहार धूमधाम से मनाया

 पाली, सोमवार 5 मार्च, 2018

बौद्ध धर्म के आगमन की खुशी का पर्व

तिब्बती नव वर्ष को लोसर कहते हैं। करीब 2 हजार साल पहले तिब्बत में बौद्ध धर्म के आगमन के मौके पर यह त्योहार शुरू हुआ था। तिब्बत के नौवें राजा गंगयाल (617-698) ने इस उत्सव को पारंपरिक फसली त्योहार से जोड़ दिया। तब से यह हर साल मनता है। यानी 1300 साल से यह परंपरा चली आ रही है।

लोसर का दिवाली और होली जैसा महत्व

लोसर के मौके पर घर-घर में सफाई होती है। नई वस्तुएं खरीद कर लाई जाती हैं। बुद्ध की पूजा होती है। नाच-गाने के सामूहिक कार्यक्रम होते हैं। लोग विशेष चिलमची के पानी में विकसित जौ के पौधे को बौद्ध आले पर रखते हैं और नए साल में अच्छी फसल के लिए प्रार्थना करते हैं।

ये पर्व कुरीतियों को मिटाने के लिए मनाया जाता है।

इस दिन छोटी दुर्घटनाओं को तिब्बती शुभ मानते हैं।

सिल्क पर महात्मा बुद्ध की विशाल तस्वीर बनाई जाती है।

नेपाल, भूटान के अलावा भारत के असम और सिक्किम में भी मनाया जाता है।

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