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क्या यह है हमारा भ्रष्टाचार मुक्त भारत?

भारत में यदि कोई सबसे आसान बात है तो वह है किसी बैंक को लूटना। नहीं मंै ‘कांटे’ जैसी नाटकीय वारदात की बात नहीं कर...

Dainik Bhaskar

Mar 07, 2018, 06:15 AM IST
क्या यह है हमारा भ्रष्टाचार मुक्त भारत?
भारत में यदि कोई सबसे आसान बात है तो वह है किसी बैंक को लूटना। नहीं मंै ‘कांटे’ जैसी नाटकीय वारदात की बात नहीं कर रहा हूं, जिसमें बंदूक और दुस्साहस से लैस बदमाश आकर बैंककर्मियों से पैसा लूट लेते हैं, फिर इंतजार करती कार का इस्तेमाल करके भाग जाते हैं। ज्यादातर लालच उन पर हावी हो जाता है और दूसरे को लूट का हिस्सा न देने में वे एक-दूसरे को गोली मार देते हैं। इस प्रकार की लूट में बहुत-सा रोमांस, अत्यधिक रोमांच, सनसनी और इतनी एक्शन होती है, जो किसी किशोरवय दिमाग में उत्तेजना पैदा करने के लिए काफी है। हमारे बचपन की रॉबिनहुड कथाओं ने इसका कुछ महिमामंडन भी कर दिया था।

आज की बैंक लूट अलग है, एकदम अलग। वे उबाऊ, रूखी-सूखी और घिनौने रूप से उच्चवर्गीय कृत्य है। इसमें बिल्कुल रोमांस नहीं है। कुल-मिलाकर मामला यह है कि कुछ पहले से ही अत्यधिक धनी और प्रभावशाली लोग धुर्तता से सिस्टम को चकमा दे देते हैं। वे अपने राजनीतिक संपर्कों का इस्तेमाल बैंक अधिकारियों व उन पर निगरानी रखने वाले बॉस लोगों तक पहुंचने और उन्हें रिश्वत देने में करते हैं (जो बदले में उन लोगों को रिश्वत देते हैं, जो रिकॉर्ड्स का ऑडिट करते हैं) ताकि लाखों (कई बार अरबों) डॉलर निकालकर उन्हें विदेश के सेफ हेवन्स में रख दिए जाएं, जहां से कोई सरकार उसे वापस नहीं ला सकती (बोफोर्स याद है? जरा सोचें पिछले 25 वर्षों में कितनी सरकारें आईं-गईं और अपने सर्वोत्तम या निकृष्टम इरादों के बाद भी वे पैसा वापस लाने में नाकाम रहे)।

इस तरह की बैंक लूट को मैं दुस्साहसपूर्वक कहूंगा कि कुछ गोपनीय और उबाऊ है। इसके तहत बही-खातों में गड़बड़ी, रिकॉर्ड में हेराफेरी और टेबल के नीचे से नकदी का आदान-प्रदान शामिल है। नहीं, खून में कोई एड्रिनलिन नहीं दौड़ता, कोई गौरव का अहसास नहीं, न कोई तनाव और न 120 मील प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ती कार। यह तो सपाट, उबाऊ चोरी है, ठीक वैसी जो बिज़नेसमैन करते हैं। कोई हंगामा नहीं, कोई रोमांच नहीं। दीवार पर गोलियां बरसाती एके-56 नहीं, बैंक के स्ट्रॉन्ग रूम को उड़ाना नहीं और चमत्कृत कर देने वाली कंप्यूटर जादूगरी से गोपनीय तिजोरी खोलना नहीं। जो हमें दिखाया जाता है वह वही है, जिसके लिए हम जाने जाते हैं- रिश्वतखोरी, अनैतिकता, जालसाजी और जैसा कि अब आम हो चुका है, शक्तिशाली राजनेता की मिलीभगत ताकि वह सरकारी भाषा में भ्रम पैदा करके घोटाला छिपा सके।

इसकी बजाय कि पता लगाएं कि पैसा कहां है अौर हम इसे वापस कैसे ले सकते हैं,अटकलें इस पर केंद्रित हो जाती हैं कि कौन-सा राजनीतिक दल इस लूट के पीछे हैं या सरकार में किसने किसे संरक्षण दिया है। यह रोमांचकारी लूट और गंदे घोटाले के बीच वास्तविक फर्क है। बंदूकों और दुस्साहस का स्थान उंगली के इशारे ले लेते हैं। घोटालेबाजों के पकड़े जाने की बजाय पूरे मुद्‌दे पर जान-बूझकर शोर-गुल भरी टीवी बहस की अप्रासंगिक बकवास से भ्रम पैदा किया जाता है। इन बहसों में मजेदार दिखने वाले लोग एक-दूसरे पर चीखते और आरोप लगाते हैं, जिनका लूट के पैसे से कोई संबंध नहीं होता। एक पक्ष हर गलत बात के लिए मुस्लिमों को कोसता और पाकिस्तान को दोष देता रहता है। दूसरा जान-बूझकर मुद्‌दों का घालमेल करके लूट के लिए विपक्षियों को जिम्मेदार बताने में लगा रहता है। दलीलें ठहर नहीं पाती, क्योंकि बहरा बना देने वाली बहस में कोई किसी को नहीं सुन पाता। राजनीति को भूल जाएं। इन टीवी बहसों से यदि कोई अर्थ निकाल पाएं तो आप भाग्यशाली होंगे।

इस बीच, जांच एजेंसियों के लोग चकरा जाते हैं, क्योंकि किसी को मालूम नहीं होता कि किसकी सुनें- एजेंसी के बॉस लोगों की या टेफ्लॉन कोटेड राजनीतिक बॉस लोगों की, जो संकट के समय में उपयोगी साबित हो सकते हैं। जब तक मामला कोर्ट में पहुंचता है और एक या दो दशक बाद उसकी सुनवाई होती है, किसी को उसकी रत्तीभर परवाह नहीं होती। पैसा जा चुका है। सरकार संभवत: बदल गई है। बैंक के सीएमडी खुशी-खुशी रिटायर हो गए हैं, उनकी पेंशन साबूत है। ऑडिटर भी नई, ज्यादा खुशनुमा शिकारगाहों पर चले जाते हैं। मीडिया को भी कोई परवाह नहीं है कि लूट गई कहां। वे नई तथा ज्यादा खतरनाक कहानियां खोज रहे होते हैं कि कौन, किस,े कहां लूट रहा है और किस राजनीति दल के आशीर्वाद से।

बैंक को लूटना अब रोज की खबरों का हिस्सा है। 11,400 करोड़ मुंबई के हीरा व्यापारी व उसके मोटे अंकल के साथ गायब हो गए हैं (पिछले सप्ताह इस आंकड़े में 1,300 करोड़ रुपए और जोड़ दिए गए)। 3,500 करोड़ कानपुर के पेन निर्माता ने गायब कर दिए। गिरफ्तार किए जाने पर वह कहता है कि उसे 21 बीमारियां हैं और उसके साथ सौम्य व्यवहार किया जाए। तब से सीबीआई ने तीन और बैंक लूट का पता लगाया है। अभी हाल तक 9,000 करोड़ की चीखती सुर्खियों का क्या हुआ। अच्छा वह स्टोरी, वह तो पेज 15 पर चली गई। हमारा एनपीए (जैसा हम अपनी बैंकिंग व्यवस्था में मौजूद विशाल ब्लैक होल को कहना पसंद करते हैं) शब्दों में बयान करना भयावह है। हम उन अर्थव्यवस्थाओं में पांचवें हैं, जिन्हें अपनी बैंकों की हालत को लेकर गंभीर रूप से चिंतित होना चाहिए। 7.34 लाख करोड़ वाले हमारे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक (जो हमारे सबसे बड़े बैंक हैं) 77 फीसदी फंसे हुए कर्ज के लिए जिम्मेदार हैं। बैड लोन या एनपीए तो उस नकदी के लिए आकर्षक शब्दावली है, जो सिस्टम की सारी निगरानी के बाद भी चमत्कारिक ढंग से गायब हो गई है।

सच तो यह है कि सबसे अधिक एनपीए वाले शीर्ष 20 बैंकों में से 18 सार्वजनिक क्षेत्र के हैं,जो सरकार की सीधी निगरानी में हैं। इस बड़े, ब्लैकहोल के लिए जिम्मेदार लोगों में से ज्यादातर अब भी खुले घूम रहे हैं, उन्हें दुनिया की रत्तीभर परवाह नहीं है। कोई आश्चर्य नहीं कि ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल के वैश्विक भ्रष्टाचार सूचकांक पर भारत को हाल ही में 2017 के 79 से दो पायदान और नीचे कर कर 81 पर ला दिया गया है। क्या यह वह भ्रष्टाचार मुक्त भारत है, जिसकी हम इतनी चर्चा करते थे?

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

प्रीतीश नंदी

वरिष्ठ पत्रकार और फिल्म निर्माता

pritishnandy@gmail.com

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