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ताकत बढ़ाकर पश्चिम को गलत साबित किया शी ने

पिछले सप्ताह चीन ने दुनिया को दिखा दिया कि वह तानाशाही की तरफ बढ़ रहा है। उसके राष्ट्रपति शी जिनपिंग, जो पहले ही...

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 09, 2018, 06:30 AM IST

पिछले सप्ताह चीन ने दुनिया को दिखा दिया कि वह तानाशाही की तरफ बढ़ रहा है। उसके राष्ट्रपति शी जिनपिंग, जो पहले ही दुनिया के सबसे शक्तिशाली नेता कहलाते हैं, उनके बारे में अनुमान था कि वे चीन में बड़ा बदलाव करेंगे। इसमें यह शामिल था कि वे जब तक चाहेंगे, चीन पर तब तक शासन करेंगे। शी के पहले माओ जेदोन्ग के पास इतनी शक्तियां थीं। यह चीन के लिए ही बड़ा बदलाव नहीं, बल्कि पश्चिमी देशों के लिए इस बात का बड़ा सबूत है कि चीन को लेकर 25 वर्षों की शर्त में वे हार गए हैं।

सोवियत संघ के विघटन के बाद पश्चिमी देशों ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में उतरने के लिए दूसरे बड़े कम्युनिस्ट देश चीन का स्वागत किया। वे मानकर चल रहे थे कि विश्व व्यापार संगठन जैसे वैश्विक संगठनों में भागीदारी से चीन नियम आधारित व्यवस्था में रम जाएगा। उन्हें उम्मीद थी कि विश्व की आर्थिक व्यवस्था में शामिल होने से चीन ‘मार्केट इकोनॉमी’ के लिए प्रोत्साहित होगा। जैसे-जैसे उसकी समृद्धि बढ़ेगी, उसके लोग लोकतांत्रिक स्वतंत्रता हासिल करने की इच्छा जताएंगे। चीन को लेकर पश्चिम की यह परिकल्पना धूमिल हो गई।

चीन ने पिछले दशक में कल्पना से कहीं ज्यादा रईस तैयार किए। पूर्व राष्ट्रपति हू जिन्ताओ के कार्यकाल तक पश्चिमी देश अपनी शर्त में जीतते दिख रहे थे। परन्तु पांच वर्ष पहले शी जिनपिंग ने राष्ट्रपति पद संभाला, उनके कारण आज वह भ्रम पूरी तरह टूट गया है। वास्तविकता यह है कि शी जिनपिंग बलपूर्वक न केवल राजनीति कर रहे हैं, बल्कि अर्थव्यवस्था को भी उसी तरह चला रहे हैं। राज्यों की व्यवस्था पर उनका पूरा नियंत्रण है।

अपने कार्यकाल में राजनीति की शुरुआत करते हुए शी ने अपने अधिकारों का उपयोग कम्युनिस्ट पार्टी को मजबूती प्रदान करने और उसमें भी अपनी जगह पहले से ज्यादा मजबूत करने का काम किया। भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान के दौरान उन्होंने अपने संभावित विरोधियों को कुचलना शुरू किया। उन्होंने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) को पुनर्संगठित किया और उसे खुद के प्रति पहले से ज्यादा निष्ठावान बनाया। शी ने इसी दौरान स्वतंत्र विचारधारा रखने वाले वकीलों, कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया और मीडिया एवं ऑनलाइन दुनिया में होने वाली खुद की एवं पार्टी की आलोचना करने वालों का मुंह बंद कर दिया। हालांकि, चीन में लोगों का जीवन सरकारी हस्तक्षेप से पूरी तरह मुक्त है, लेकिन शी ने एक निगरानी सिस्टम तैयार किया, जिसमें पता चल जाता है कि कहां ‘असंतोष और विचलन’ की स्थिति है।

चीन ने इस तरफ बिल्कुल दिमाग नहीं लगाया कि दूसरे देश खुद कैसे संचालित होते हैं, इसीलिए लंबे समय तक वह अपनी तरह का अकेला देश था। चीन ने अपना एक ऐसा सिस्टम बनाया, जिसमें खुलेपन वाले लोकतंत्र को विरोधी समझा गया। कुछ ही दिन पहले कम्युनिस्ट पार्टी के 19वें सम्मेलन में शी ने दुनिया के सामने नया प्रस्ताव रखा। इसमें चीनी बुद्धि और काम करने का तरीका उन समस्याओं का समाधान खोजने में लगाने की बात कही गई, जो मानवजाति महसूस कर रही है। इसके बाद शी ने कहा- चीन अपने मॉडल का निर्यात नहीं कर रहा है, लेकिन चीनी नागरिकों को यह समझना होगा कि अमेरिका उसका न केवल आर्थिक, बल्कि वैचारिक प्रतिस्पर्धी भी है। वैश्विक बाजार तक पहुंचने और अपनी अलग पहचान बनाने का उसका मॉडल बहुत सफल रहा। आज उसने वैश्विक अर्थव्यवस्था में बड़ा स्थान हासिल कर लिया है। आज वह 13 फीसदी के साथ सबसे बड़ा निर्यातक है। आज दुनिया की 100 सबसे मूल्यवान कंपनियों में से 12 वहां हैं। उसने अभूतपूर्व समृद्धि खुद के लिए भी निर्मित की और उनके लिए भी जिन्होंने उसके साथ बिज़नेस किया। आज भी चीन कोई ‘मार्केट इकोनॉमी’ नहीं है और वर्तमान को देखकर नहीं लगता कि ऐसा फिलहाल होगा। उसने अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए देश के बिज़नेस पर नियंत्रण किया, इसमें व्यापक स्तर की कारोबारी रणनीतियां शामिल हैं।

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लीडरशिप...चीनी राष्ट्रपति 2025 तक दुनिया के 10 बड़ी इंडस्ट्री अपने कब्जे में करना चाहते हैं, इसकी आक्रामत नीति वे पहले ही बना चुके हैं।

चीन के पास ‘मेड इन चाइना 2025’ प्लान है, जिसमें वह 10 उद्योगों का ‘वर्ल्ड लीडर’ बनना चाहता है। इसमें एविएशन, टेक्नोलॉजी और एनर्जी भी शामिल है।

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