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फिर नहीं भरी भाटूंद के शीतला माता मंदिर में आधा फीट चौड़ी ओखली, महिलाओंे ने उडेले पानी से भरे सैकड़ों कलश

गांव में स्थित शीतला माता मंदिर में गुरुवार को एक बार फिर सैकड़ों साल पुराना इतिहास और चमत्कार दोहराया गया। शीतला...

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 09, 2018, 06:30 AM IST

गांव में स्थित शीतला माता मंदिर में गुरुवार को एक बार फिर सैकड़ों साल पुराना इतिहास और चमत्कार दोहराया गया। शीतला सप्तमी के मौके पर मंदिर में माता की प्रतिमा के सामने स्थित वही आधा फीट गहरी और इतनी ही चौड़ी ओखली श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोली गई। मान्यता के अनुसार गांव की करीब 800 से ज्यादा महिलाओं ने यहां 12 लीटर से ज्यादा क्षमता के पानी से भरे कलश इसमें उड़ेले लेकिन ओखली से पानी छलक नहीं। दो घंटे तक इसमें एक के बाद एक कलश खाली होते रहे। लेकिन वह पानी कहां गया, किसी को नहीं पता। ओखली को लेकर वैज्ञानिक स्तर पर कई शोध हो चुके हैं, मगर ओखली में भरने वाला पानी कहां जाता है, यह कोई पता नहीं लगा पाया है। इसके बाद पुजारी ने प्रचलित मान्यता के तहत माता के चरणों से लगाकर दूध का भोग चढ़ाया तो पानी ओखली से छलका। माता के जयकारे लगाकर हर वर्ष की भांति फिर गांव में लोगों की खुशहाली की कामना करते हुए ढंक दिया।

भाटूंद. शीतला माता मंदिर स्थित ओखली में पानी के घड़े खाली करते हुए श्रद्धालु।

मान्यता : शीतला माता की प्रतिमा स्वत: प्रकट हुई

रोहट: चोटिला में भरे गए शीतला माता मेले की भी एक अलग कहानी है। ऐसी मान्यता है कि वर्षों पहले पहाड़ी शीतला माता की प्रतिमा स्वत: प्रकट हुई थी। इसके बाद से ही चोटिला में मेला भरा जाता है। ऐसा माना जाता है कि माता के दरबार में हर मन्नत पूरी होती है तथा रोग कष्टों से मुक्ति मिलती है। पहाड़ी पर माता के मंदिर स्थान पर प्रतिमा के आसपास ओरी, चेचक आदि के निशान प्रतिमा के इर्द-गिर्द पहाड़ से अलग रंग में स्वत: प्रकट होते हैं। यहां पर चढ़ाए जल का उपयोग करने पर इन बीमारियों से मुक्ति मिलती है।

170 साल पुरानी मूसल गेर, जीवंत हुई लोक संस्कृति

सादड़ी. सगरवंशी माली समाज की ऐतिहासिक रियासतकालीन मूसल गेर का आयोजन गुरुवार को किया गया। गेर में लोक संस्कृति का रंग देखने को मिला। मारवाड़,मेवाड़ और गोडवाड़ अंचल से बड़ी संख्या में ग्रामीण पहुंचे। करीब दो घंटे तक आखरिया चौक-बस स्टैंड-गाछवाड़ा रोड बंद रहा। गेरियों ने मूसल लेकर मृदंग की थाप पर गेर नृत्य किया। गेर यहां से तलवटा, मैन बाजार, प्याऊ गांछवाड़ा पुलिया से रामधुन चौक होते हुए पुन: आरंभस्थल पंहुची। ग्रामीणों के अनुसार यह गेर करीब 170 साल पुरानी है।

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