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जीने की स्वतंत्रता और सुविधा नहीं, इच्छा मृत्यु का अधिकार

उच्चतम न्यायालय ने फैसला दिया है कि लाइलाज रोग से ग्रस्त व्यक्ति को और उसके परिजनों को यह अधिकार है कि लाइफ सपोर्ट...

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 12, 2018, 06:30 AM IST

जीने की स्वतंत्रता और सुविधा नहीं, इच्छा मृत्यु का अधिकार
उच्चतम न्यायालय ने फैसला दिया है कि लाइलाज रोग से ग्रस्त व्यक्ति को और उसके परिजनों को यह अधिकार है कि लाइफ सपोर्ट हिस्टम हटा लिया जाए ताकि दर्द समाप्त हो जाए और मनुष्य इच्छा मृत्यु के अधिकार का इस्तेमाल कर सके। कुछ देशों में इच्छा मृत्यु अधिकार दशकों पूर्व दिया जा चुका है। दरअसल, इच्छा मृत्यु अधिकार के दुरुपयोग की आशंका बनी रहती है। नए कानून में यह प्रावधान है कि इस तरह के निर्णय करने के लिए डॉक्टरों के दल का परामर्श लिया जाना चाहिए।

जैन धर्म के अनुयायी इच्छा मृत्यु के लिए भोजन और जल लेना बंद कर देते हैं। इसे संथारा कहते हैं। कुछ दशक पूर्व मुंबई के एक प्रसिद्ध अस्पताल में एक उम्रदराज व्यक्ति कोमा में चला गया। उसे उपकरणों द्वारा तकनीकी रूप से जीवित रखा जा रहा था। उसके ज्येष्ठ पुत्र ने डॉक्टरों से कहा कि उपकरणों की सहायता से पिता को लंबे समय तक ‘जीवित’ रखें और वे अस्पताल को नियमानुसार खर्च के साथ ही लाखों रुपए का अनुदान भी देगा। अपने पिता के प्रति इस चिंता और प्रेम का कारण यह था कि पिता की बीमारी के समय वह कंपनी का सबसे बड़ा अधिकारी था। कंपनी के नियम थे कि अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष ज्येष्ठ पुत्र ‘कार्यकारी अध्यक्ष’ रहेगा। उसका छोटा भाई अस्पताल अधिकारियों को कहता था कि सारे उपकरण हटाकर पिता को मृत घोषित करें, क्योंकि मृत्यु के बाद संपत्ति का समान वितरण होगा और बड़े भाई के असीमित अधिकार समाप्त हो जाएंगे। बहुत अधिक धन जाने कितनी समस्याएं पैदा करता है और रिश्ते नष्ट हो जाते हैं। इस पूरे प्रकरण में बहुत धुंध है।

वर्ष 1978-79 में खाकसार ने अपनी लिखी पटकथा पर ‘शायद’ नामक फिल्म की पूरी शूटिंग इंदौर के सरकारी अस्पताल तथा कैलाश नर्सिंग होम में की थी। ‘शायद’ का नायक नसीरुद्‌दीन शाह एक कवि है और उसे कैंसर हो जाता है। रोग लाइलाज अवस्था में पहुंच गया और वह अपनी प|ी से कहता है कि वह कहीं से जहर लाकर दे ताकि उसकी पीड़ा का अंत हो जाए। पति-प|ी में गहरा प्रेम है परंतु पति को असहनीय वेदना हो रही है और मृत्यु ही दर्द से मुक्ति का एकमात्र रास्ता है। इस फिल्म को सेंसर बोर्ड ने प्रमाण-पत्र देने से इनकार किया। उनका पक्ष था कि हमारी संस्कृति में तो सावित्री अपने पति को यमराज से टकराकर वापस लाती है। फिल्म के पूंजी निवेशक का कहना था कि सेंसर के विरुद्ध अदालत में जाने पर बहुत खर्च होगा और समय भी लगेगा। अत: दोबारा शूटिंग करके यह दिखाएं कि पति ने आत्महत्या कर ली है या यह दिखाएं कि हृदयाघात से उसकी मृत्यु हो गई है। अत: मूल आकल्पन में परिवर्तन किया गया।

कुछ समय पूर्व ही संजय भंसाली की ऋतिक रोशन अभिनीत फिल्म ‘गुजारिश’ भी इच्छा मृत्यु विषय से प्रेरित फिल्म परंतु इसमें प|ी मृत्यु का ‘साधन’ नहीं जुटाती अत: यह ‘शायद’ से अलग फिल्म है। अब अदालत द्वारा मृत्यु का अधिकार प्राप्त हो गया है परंतु व्यवस्था अवाम को सुविधा और स्वतंत्रता से जीने ही नहीं दे रही है। अत: मृत्यु पर अधिकार मिलना भी एक नियामत ही मानी जा सकती है। कोलकाता के महान नाटककार बादल सरकार के ‘बाकी इतिहास’ में यह बताया गया है कि एक पत्रकार दंपती का पड़ोसी आत्महत्या कर लेता है। दोनों आत्महत्या के कारणों के अपने-अपने आकल्पन प्रस्तुत करते हैं। नाटक के पहले अंक में यह आकल्पन है कि मरने वाला एक शिक्षक था और उसे अपनी चौदह वर्षीय छात्रा से प्रेम हो गया। आत्मग्लानी के कारण उसने आत्महत्या की। यह ‘लोलिटा’ काम्प्लेक्स है। नाटक के दूसरे अंक में पति अपना आकल्पन प्रस्तुत करता है कि कम वेतन पर जीना कठिन हो रहा था अत: उसने आत्महत्या कर ली। नाटक का तीसरा अंक कमाल का है, जिसमें आत्महत्या कर लेने वाला व्यक्ति आता है और कहता है कि दोनों ही आकल्पन असत्य है। वह उन दोनों से कहता है कि उसकी आत्महत्या का कारण वह बाद में प्रकट करेगा परंतु वह प्रश्न करता है कि ये दोनों आत्महत्या क्यों नहीं करते। वे कुंठित व्यक्ति हैं और जीवन को महज ढो रहे हैं।

उम्रदराज लोगों के मन में भी मृत्यु के आगोश में समा जाने की इच्छा जागती है। यह भी इच्छा मृत्यु का ही एक रूप है। उम्रदराज के अवचेतन को दमोह के कवि सत्यमोहन वर्मा ने यूं अभिव्यक्त किया है, ‘अब उमर के पैरहन पर धारियां आने लगीं/ और मन में वक्त की मक्कारियां आने लगीं/ था सलामत जिनकी आंखों में दुनिया का जमाल अब उसी चितवन में क्यों चिंगारियां आने लगीं/ ज़िंदगी से जब किए हैं मैंने कुछ टेढ़े सवाल/ उसके चेहरे पर कुटिल होशियारियां आने लगीं/ अब धुंधला रहे हैं आईने उम्मीद के/ याद हमको भी पुरानी यारियां आने लगी/ यह समापन की घड़ी है/ सूर्य आ पहुंचा क्षितिज, जिसके स्वागत की नज़र तैयारियां आने लगीं/ दिल हुआ कि जा के पूछूं हाल क्या है दोस्तों/ तो रहगुजर में सैकड़ों दुश्वारियां आने लगीं/ जिस चमन के फूल गुलदस्तों में है ताज़ा अभी उस चमन की रूबरू सब क्यारियां आने लगीं।

जयप्रकाश चौकसे

फिल्म समीक्षक

jpchoukse@dbcorp.in

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