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अनुशासन, अभ्यास, अनुभूति और अनुभव आधारित अलख

अनुशासन, अभ्यास, अनुभूति और अनुभव आधारित अलख मूर्तियों को तोड़ने की मूर्खता पर ऐसा हंगामा? मनुष्यों के टूटने पर...

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 10, 2018, 06:40 AM IST

अनुशासन, अभ्यास, अनुभूति और अनुभव आधारित अलख

मूर्तियों को तोड़ने की मूर्खता पर ऐसा हंगामा? मनुष्यों के टूटने पर ऐसा सन्नाटा?

‘महान ज़िंदगियों के बचे हुए टुकड़ों में भी कुछ न कुछ श्रेेष्ठ मिलेगा ही।’

- अमेरिकी कवि हेनरी लॉन्गफैलो (1807-1882)

मूर्खों ने कुछ मूर्तियां तोड़ने का स्तरहीन कृत्य कर, देशभर में हंगामा मचा डाला।

अब लगता है, वे मूर्ख नहीं हैं। मूर्ख बना रहे हैं।

क्योंकि इस निरर्थक बात को वो आराम से राष्ट्रीय विलाप बनाने में सफल हो गए।

हर एक नेता, हर एक राजनीतिक दल इन मूर्तियों के टूटने-गिराए जाने पर ऐसा कोहराम मचा रहे हैं - मानो अब कुछ भी सुरक्षित बचा ही न हो।

हैरानी होती है।

देश का साधारण नागरिक टूट-सा गया है - कोई पार्टी कुछ नहीं बोलती। कोई दिन ऐसा नहीं बीत रहा, जब देशभर से दस से बारह वीभत्स वारदातें सामने न आ रही हों - जिसमें नारी गरिमा को रौंदा जा रहा हो। कोई दिन ऐसा नहीं है, जब छोटे-छोटे बच्चों के अपहरण, शोषण व हत्या की हृदय-विदारक घटनाएं न घट रही हों।

कोई सरकार, कोई सत्तारूढ़ दल, कोई विपक्ष, कोई सामाजिक विद्वान, कोई सुधारक - कुछ नहीं बोलता। ‘अपराध’ कहां नहीं होते? यही नकारा, निर्लज्ज, निरंकुश बहाना है सबके पास।

प्रत्येक वो घटना, वो कुकृत्य, वो अपराधी व दोषी - जो मनुष्य को तोड़ते हैं, हमें झकझोर कर रख देते हैं - उस पर हमारे सांसद एक कुंठित सन्नाटा साधे बैठे रहते हैं।

वे कुछ नहीं करेंगे।

चूंकि उनके पास प्रत्येक घटना का एक तोड़ है। केवल वोट से जुड़ा हो, तो ही वे हरकत में आएंगे। बाकी सब तो ‘अपराध’ हैं। या ‘दुर्घटना’ हैं। या ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ हैं। या ‘दु:खद’ हैं।

उत्तरप्रदेश में बच्चे मर जाते हैं। वे कहते हैं वर्षों से जापानी बुखार है। आॅक्सीजन की सप्लाई बंद होने से नहीं मरे।

राष्ट्र रोता रह जाता है। नहीं ही पूछ पाता कि वर्षों से जापानी बुखार क्यों है? खरबों रुपए खर्च हो गए। बुखार एक ही जगह बना हुआ क्यों है?

बिहार में मिड-डे मील में ज़हरीला कुछ होने से बच्चे मर जाते हैं। जिम्मेदार, दोषी, सब भाग जाते हैं। नेताओं ने काम दिलवाया था।

राष्ट्र तड़पता रह जाता है। जान ही नहीं पाता कि फिर किया क्या?

अकेले बम्बई में पानी से साधारण नागरिक मर जाते हैं। रेल्वे स्टेशन पर भगदड़ में मारे जाते हैं। खतरनाक इमारत गिरने से मारे जाते हैं।

राष्ट्र जड़वत, भौंचक खड़ा रह जाता है। श्रद्धांजलि देता रहता है। आपस में बातचीत कर। किन्तु समझ नहीं पाता कि देश की आर्थिक राजधानी में काम करने, जिम्मेदारी लेने में इतनी ग़रीबी क्यों है?

कश्मीर में अंतहीन आतंकी नरसंहार, छत्तीसगढ़, झारखंड और आंध्र में नक्सली हत्याएं - कुछ भी तो नहीं झंझोड़ पाता हमारे नेताओं को। अनेक राज्यों में किसानों की आत्महत्याएं और कई जगह किसानों को गोलियों से उड़ाना। इस पर भी चुप्पी।

लेनिन की मूर्ति गिराने वालों पर बदले की कार्रवाई करने वालों से राष्ट्र पूछना चाहता है कि समूचा पश्चिम बंगाल तीन-तीन बार बच्चों के अस्पतालों में घटी अापराधिक लापरवाही और मौतों को सहन कैसे कर गया?

लाखों ग़रीब, छोटी-छोटी बचत को बढ़ाने में षड्‌यंत्र भरी पोन्ज़ी स्कीम में चार-चार बार बरबाद हो गए। सत्तारूढ़ सांसद, मंत्री, विधायक, नेता सब कहीं न कहीं इन घपलों को पोषित कर रहे थे। कुछ तो ख़ुद मिले हुए थे।

सन्नाटा।

और जो श्यामाप्रसाद मुखर्जी की मूर्ति तोड़े जाने पर चीख रहे हैं - वे क्या भूल गए दादरी की चीत्कारें? उन्हीं के भगवा विधायक, भीड़ लेकर टूट पड़े थे।

वो जो गौ-रक्षकों के संदेह पर रक्तपात? क्या कोई उत्तर देगा? स्वयं प्रधानमंत्री ने फटकारा था कि ऐसे ‘फ़र्जी’ गौरक्षकों से अटा पड़ा है देश। और समाज में उनका कोई स्थान नहीं है।

किन्तु, कोई रुक कहां रहा है? लेनिन-पेरियार-आंबेडकर-मुखर्जी की मूर्तियों को मुद्दा बनाने वाले इन चारों के अच्छे कामों से क्या सीख पाए?

और यही नहीं, इन चारों के विवादास्पद विचारों-कामों पर विरोधी विचार रखने वालों को कहां पचा पाए?

कहां गई ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’? कहां है पुरस्कारों की वापसी?

लेनिन तो ख़ैर कोई आदर्श हैं ही नहीं भारत के। रूसी क्रांति से बोल्शेविक पार्टी को सोवियत सत्ता में लाए व्लादिमीर लेनिन ने भले ही मार्क्स के ‘सर्वहारा की तानाशाही’ को आगे बढ़ाकर, राष्ट्र-राज्य पर लागू करने में सफलता पाई हो, किन्तु भारतीय संदर्भ में तो हमलावरों-हत्यारों ने ही माओ-लेनिन का नाम अपना रखा है। नक्सलबाड़ी से शुरू हुए हिंसक आन्दोलन का विद्वान मिलकर चाहे जितना महिमामण्डन करते रहें - भारतीय नागरिक किसी भी स्थिति में हिंसा को सम्मान नहीं देंगे।

किसी खोखले आदर्श के नाम पर भी नहीं। (पढ़ें नक्सलबाड़ी के 50 साल पर असंभव के विरुद्ध)*

जानना रोचक होगा कि विश्वभर में, विशेषकर पूर्ववर्ती सोवियत संघ और इस्टर्न यूरोप में सर्वाधिक मूर्तियां यदि किसी की गिराई/तोड़ी गई हैं तो लेनिन की ही।

सबसे ज्यादा यह जानना आवश्यक है कि लेनिन की शपथ लेकर नक्सली बने ‘स्वघोषित’ आंदोलनकारियों ने बंगाल रेनेसां के नायकों की मूर्तियां तोड़ी/रौंदी थीं। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की मूर्ति भी!

ई.वी. रामासामी पेरियार की मूर्ति तोड़ने पर लेनिन के उत्तराधिकारी स्टालिन के नामधारी करुणानिधि-पुत्र स्टालिन के राज्य तमिलनाडु में भयानक कोहराम मचा है। सही भी है।

पेरियार दक्षिण भारत का ऐसा प्रतिष्ठित नाम है, जिस पर प्रत्येक नेता, प्रत्येक पार्टी को सहमत होना ही है। तर्कवादी, जाति-विरोधी, प्रखर चिंतक पेरियार, द्रविड़ आन्दोलन के प्रणेता थे। इस आन्दोलन के 100 साल पिछले साल ही पूरे हुए हैं। पेरियार दलितों-शोषितों की सशक्त आवाज़ थे। उनका ‘स्वाभिमान आन्दोलन’ सर्वाधिक लोकप्रिय रहा। किन्तु, फिर भी कई लोग उन्हें ‘ब्राह्मण-विरोधी’ और केवल ब्राह्मण-विरोधी करार देते हैं। व ग़ैर-ब्राह्मण उच्च जातियों के पक्षधर भी मानते हैं। उसी समय दो धड़े हो गए थे।

जानना महत्वपूर्ण होगा कि पेरियार का सर्वाधिक विवादास्पद आन्दोलन था : हिन्दू देवी-देवताओं-भगवान की प्रतिमाएं को तोड़ना/गिराना/जलाना/जूतों की माला पहनाना।

कहां डॉ. बाबा साहब आम्बेडकर और कहां मात्र उनके नाम पर मिथ्या राजनीति करने वाले? शर्म आती है। कहां वो गहन अध्येता, उद्‌भट विद्वान, तेजस्वी व्यक्तित्व और शोषितों के जन-नायक। कहां दलितों को शोषित ही बनाए रखने के भ्रष्ट कुचक्र वाले उग्र नेता?

अभी महाराष्ट्र से उठी आग बुझी नहीं है। भड़काने वाले तत्व जितने पथभ्रष्ट ‘हिन्दू उग्रवादियों’ में हैं, उतने ही दलित राजनीति करने वालों में भी।

हिन्दू ‘उग्रवाद’ भी एक झूठा शब्द है। हिन्दू कोई धर्म नहीं है, एक जीवन पद्धति है। इसका आधार ही ‘सहिष्णुता’ है। यानी ‘टॉलरेन्स’। उदारता। जो उदार है, वही हिन्दू है। शेष हिन्दू, केवल ‘उग्रवादी’ ही होंगे। यानी, उग्रता का हिन्दुवाद में कोई स्थान हो ही नहीं सकता।

तो, वो जो श्यामा प्रसाद मुखर्जी के समर्थक हैं - वे कैसे तोड़-फोड़ में लगे हैं? मुखर्जी, पं. नेहरू मंत्रिमण्डल में वाणिज्य व उद्योग मंत्री थे। फिर अलग हो गए। और जनसंघ की स्थापना की। आज़ादी के पहले हिन्दू महासभा के अध्यक्ष थे।

हैरानगी है कि कुछ अपराधिक तत्वों ने ‘श्रीराम’ के नाम पर कर्नाटक से लेकर महाराष्ट्र तक स्वयंभू संगठन बना लिए हैं। और ‘मोरल पोलिसिंग’ कर, हिंसक हमले और यहां तक कि हत्याएं भी की हैं। किन्तु स्वयं को ‘हिन्दू राष्ट्रवादी’ कहने वाले चिर चुप्पी साधे बैठे हैं।

मूर्ति-भंजन के लिए अंग्रेजी में प्रचलित शब्द है - आयक्नॉक्लैस्म। जो तोड़ते हैं वे आयक्नॉक्लैस्ट कहलाते हैं।

‘बाइबल’ तक में उल्लेख है मूर्तियों-स्मारकों-धर्मस्थलों को तोड़े जाने का।

किन्तु त्रिपुरा से तमिलनाडु व बंगाल तक मूर्तियांे को तोड़े जाना बाकी मूर्ति भंजन घटनाओं से अलग होकर मात्र बुद्धिहीनता व गुण्डागर्दी ही है। क्योंकि इन्हें मुट्‌ठीभर उन्मादियों ने अंजाम दिया है। बाकी जगह सामूहिक, हजारों लोगों ने, विरोधस्वरूप मूर्तियां गिराई थीं।

कई विद्वान इसे बामियान में बुद्ध की शताब्दियों पुरानी विशाल प्रतिमा को तोड़ने और सद्दाम हुसैन की सत्ता के खात्मे के बाद तोड़ी मूर्ति से जोड़कर बता रहे हैं।

ग़लत है।

क्योंकि बुद्ध प्रतिमा गिराने वाले तालिबान खूंखार आतंकी हत्यारे हैं। सद्दाम की मूर्ति अमेरिकी सैनिकों ने इराकी लोगों को इकट्‌ठा कर गिरवाई थी।

त्रिपुरा में चुटकी भर गुण्डों ने भाजपाई जीत को, 25 साल की कम्युनिस्ट तानाशाही से मुक्ति मानकर ऐसा किया। पं. बंगाल में माओ-लेनिनवादी उपद्रवी छह-आठ छात्रों ने। इससे किसी तरह का कोई सामूहिक रोष या आक्रोश या कोई बड़ा प्रतिनिधि विरोध नहीं है।

सरकारें, नेता व दल, हम साधारण मनुष्यों की चिंता, पत्थर की मूर्तियों से अधिक करें - असंभव है - किन्तु करनी ही होगी।

एक प्रश्न और अनुत्तरित है : क्या निर्जीव मूर्तियां नेताओं को, हम जीवित नागरिकों से अधिक वोट दिला पाती होंगी?

पता नहीं, ये उनका अंधविश्वास है? या कि हमारा?



*www.dainikbhaskar.com : 29 अप्रैल 2017 को असंभव के विरुद्ध में प्रकाशित ‘माओ-माओ वाले नक्सलियों के लिए जवानों के हाथ तो खाेलो’

(लेखक दैनिक भास्कर के ग्रुप एिडटर हैं।)

कल्पेश याग्निक

कल्पेश याग्निक

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