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सुर्खियां बदलकर संकट से निपटने की कला

एक हफ्ते पहले अखबारों के पहले पेज की सुर्खियां और टीवी के प्राइम टाइम पर शोर-शराबा देखिए। यह सब चाचा-भतीजे नीरव...

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 06, 2018, 06:45 AM IST

सुर्खियां बदलकर संकट से निपटने की कला



एक हफ्ते पहले अखबारों के पहले पेज की सुर्खियां और टीवी के प्राइम टाइम पर शोर-शराबा देखिए। यह सब चाचा-भतीजे नीरव मोदी और मेहुल चौकसी तथा पीएनबी से उन्होंने जो पैसा चुराया था, उस बारे में था। इसी दौरान हजार करोड़ रुपए के नीचे के क्षेत्र में रोटोमैक के विक्रम कोठारी और कुछ अन्य आए। लगा कि जैसे सरकारी बैंकों में लूट मची है। भ्रष्टाचार से लड़ने के नाम पर आई सरकार के लिए यह ठीक नहीं था। आलोचक और कांग्रेस नरेंद्र मोदी के इस दावे की खिल्ली उड़ा रहे थे कि वे जनता के पैसे के चौकीदार हैं। दावोस के ग्रपु फोटो में प्रधानमंत्री के निकट नीरव मोदी के दिखने के बाद तो टिप्पणीकार कहने लगे कि भाजपा ने भ्रष्टाचार का मुद्‌दा गंवा दिया। जुझारु भाजपा प्रवक्ता भी टीवी पर संघर्षरत दिखे। उनके इस दावे को कि यह लूट 2011 में यूपीए शासन में हुई, सीबीअाई की एफआईआर ने ही खारिज कर दिया। फिर सब बदल गया। ये सुर्खियां गायब हो गईं और नई आ गईं।

मैं यह नहीं कह रहा कि श्रीदेवी की मौत के पीछे कुछ था। वह तो विशुद्ध रूप से त्रासदी थी लेकिन, बड़ा परिवर्तन मानव-निर्मित या कहें कि भाजपा निर्मित था। जब आप यह कॉलम पढ़ रहे होंगे तो सुर्खियां कुछ ऐसी होंगी, ‘क्या कार्ति चिदंबरम ने इंद्राणी व पीटर मुखर्जी से 7 लाख डॉलर लिए?’ ‘क्या उनके पिता ने इसमें मदद की?’‘कार्ति को हिरासत में घर का भोजन देने से इनकार किया पर जज ने उन्हें सोने की चैन पहनने दी’ आदि। चर्चा बदल गई। उन्हें पिछले कई हफ्तों में कभी भी गिरफ्तार किया जा सकता था। जब वे देश छोड़कर जा रहे थे तब उन्हें गिरफ्तार नहीं किया, बल्कि तब किया जब वे एयरपोर्ट पर पहुंच गए, क्योंकि आप संदेश को अपने हिसाब से ढालना चाहते हैं तो टाइमिंग महत्वपूर्ण है। यह तो बड़ा प्रहार था पर नाजुक कलापूर्ण बातें भी हुईं। चार माह ठंडे बस्ते में रहने के बाद लोकपाल की नियुक्ति ने वापसी की। कांग्रेस ने विरोध किया व एक और सुर्खी बनी। पिछले हफ्ते कैबिनेट बैठक में एंटी फ्यूजिटिव कानून पारित करने का फैसला हुआ, जिसके तहत कानूनी एजेंसियों को छह हफ्ते के भीतर जवाब न देने वालों को भगोड़ा घोषित कर दिया जाएगा। आप सोचेंगे कि यदि माल्या या ज्वेलर मोदी को भगोड़ा घोषित कर दिया तो उन्हें क्या फर्क पड़ेगा। सवाल यह है कि क्या वे पहले ही भगोड़े नहीं हो चुके हैं? मैं इसे लॉ-लीपॉप पोलिटिक्स (समस्या का समाधान न कर पाएं तो कानून ले आओ) कहकर खारिज कर देता पर अभी नहीं, क्योंकि यह ध्यान बंटाने में कामयाब रहा।

ऐसी भी खबरें आईं कि ऐसे नियम लाए जा रहे हैं कि जान-बूझकर कर्ज न लौटाने वालों को आव्रजन अधिकारी देश छोड़कर नहीं जाने देंगे। अब सिर्फ कानून और बुनियादी अधिकारों की दृष्टि से देखें तो यह कौन तय करेगा कि किसी ने जान-बूझकर लोन नहीं चुकाया है या यह बिज़नेस में घाटे का मामला है? यह भारतीय पुलिस द्वारा चोरी का निशाना बने मकान के आगे पुलिस तैनात करने जैसा है, क्योंकि चोरी तो यह रोक नहीं पाई?

एक हफ्ते पहले की राजनीति से तुलना कीजिए जब भाजपा तनी हुई रस्सी पर चल रही थी। अब हर चैनल पर भाजपा हमले की मुद्रा में लौट आई है और कांग्रेस चिदंबरम पिता-पुत्र का बचाव कर रही है। अन्य जगहों पर लोकपाल, भगोड़ा विधेयक और डिफाल्टर पर आव्रजन संबंधी पाबंदियों की चर्चा है। एक नया रेग्यूलेटर उन चार्टर्ड अकाउंटेंट्स पर निगरानी रखेगा, जो राष्ट्रीयकृत बैंकों पर नज़र रखेंगे। इन बैंकों से कहा गया है कि वे 50 करोड़ से ऊपर के सारे विलफुल डिफाल्टर के नाम सीबीआई को दें। सीबीआई ने सरकारी बैंक में ‘लोन फ्राड’ के आरोप में सिंभावली शुगर मिल्स के प्रमोटरों के खिलाफ मामला दायर किया है, जिनमें पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के दामाद शामिल हैं। याद रहें कि ये सब नियम-कानून तब आए जब बड़े आसामी कुल 20 हजार करोड़ लेकर फरार हो गए, जिनमें से एक डेवोस के फोटो में था तो दूसरे को प्रधानमंत्री ‘मेहुल भाई’ कहते थे, चाहे हल्के-फुल्के अंदाज में ही सही। यह बुरी खबर थी इसलिए भुलाने योग्य थी और भुला दी गई।

एक हफ्ते के भीतर इतनी बड़ी लूट न रोक पाने, कथित चोरों की सहयोगी होने और अपने तहत सरकारी बैंकों को दिवालिया होने देने का आरोप झेल रही सरकार ठीक उलटा स्वरूप ले चुकी थी : वह भ्रष्टाचार के खिलाफ अथक योद्धा के रूप में सामने आ गई थी। यह सुर्खियों के प्रबंधन की राजनीति की कला है। सरकार के चार साल के बड़े संकटों की सूची बनाएं और आप यही सब देखेंगे। उड़ी के झटके को नाटकीय ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ से ठीक किया। उस पर संदेह करना यानी सेना पर संदेह करना इसलिए विपक्ष ने भी मुंह बंद रखकर सराहना की। जब नोटबंदी का दर्द असहनीय हो गया तो लाखों करोड़ों की नकदी देश के विभिन्न भागों में मिलने की कहानियां सामने आई। बाद में पता चला कि नोटों की थप्पियों के ज्यादातर फोटो फर्जी थे लेकिन, उस वक्त तो माहौल बदल गया।

रोहित वेमुला की आत्महत्या के बाद दृश्य जेएनयू चला गया जहां कन्हैया कुमार व उमर खालिद के कथित ‘भारत तेरे टुकड़े’ वाले भाषण को लेकर देशद्रोह के मामले दायर हुए, जबकि आज तक किसी वीडियो में दोनों ऐसा कहते नहीं दिखाई दिए। डोकलाम में तो सिर्फ टीवी चैनल व अखबारों से कहा गया कि वे राष्ट्रहित में इसे महत्व न दें। सभी सरकारें सूचनाओं पर नियंत्रण चाहती हैं पर मोदी-शाह की भाजपा ने इसे ललित कला बना दिया है। सभी सुर्खियां मतदाताओं के लिए ब्रैंड मोदी के तीन गुणों पर जोर देती हैं : मोदी भ्रष्ट नहीं हो सकते; जो भ्रष्टाचार से अथक लड़ाई लड़ रहे हैं, हिंदू-कृत राष्ट्रवाद के खुले संरक्षक हैं, उनके कंधे इतने चौड़े और सीना इतना बड़ा है कि कोई संकट उनके चेहरे पर चिंता की रेखाएं नहीं खींच सकता। क्योंकि वे जानते हैं कि उन्होंने कुछ गलत नहीं किया है।

इसीलिए उन्होंने किसी झटके पर प्रतिक्रिया न देने की ठान ली है। इससे मनमोहन सिंह और उनकी सरकार की तुलना कीजिए। ऐसी अफवाह भी हो कि उनके रहते किसी ने सब्जीवाले के ठेले से टमाटर चुरा लिए हैं तो वे छिप जाते। उन्हें संकट के दौरान मोदी सरकार के प्रदर्शन को सम्मानभरे विस्मय से देखना चाहिए और उसकी राजनीतिक बुद्धिमानी की सराहना करनी चाहिए।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)



शेखर गुप्ता

एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’

Twitter@ShekharGupta
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