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स्वास्थ्य नियामक प्राधिकरण बनाए सरकार

किसी भी आधुनिक कल्याणकारी देश के लिए अपने नागरिकों की सेहत सर्वोपरि होती है। यह विडंबना ही है कि हमारी आबादी का...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 20, 2018, 05:00 AM IST

स्वास्थ्य नियामक प्राधिकरण बनाए सरकार
किसी भी आधुनिक कल्याणकारी देश के लिए अपने नागरिकों की सेहत सर्वोपरि होती है। यह विडंबना ही है कि हमारी आबादी का विशाल तबका स्वास्थ्य रक्षा सुविधाओं से वंचित है। हाल में घोषित ‘आयुष्मान भारत’ योजना का लक्ष्य इसी समस्या पर ध्यान देना है। इसके माध्य्म से सरकार 50 करोड़ वंचित नागरिकों तक सरकारी व निजी स्वास्थ्य रक्षा सुविधाएं पहुंचाना चाहती है। प्रति परिवार 5 लाख रुपए का हेल्क कवर देकर सरकार इसे साकार करना चाहती है। ‘आयुष्मान’ के मूल सिद्धांतों में से एक है सहकारी संघवाद और राज्यों के लिए लचीलापन। राज्य सरकारों को अमल की पद्धति तय करने की भी छूट है। इसका अच्छा लाभ उठाने के लिए जरूरी है कि सरकार व उद्योग को कवरेज बढ़ाने और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सुविधाओं तक लोगों की पहुंच बनाने का उद्‌देश्य सामने रखकर भागीदारी करनी चाहिए।

जैसे भारत में टीबी और दवा प्रतिरोधी टीबी के मामलों का बहुत बड़ा बोझ है। यदि हम इसे 2025 तक खत्म करना चाहते हैं तो टीबी के रोगियों का पता चलने पर और पूरे इलाज के दौरान पोषण की स्थिति का पता लगाते रहना होगा। पोषण के लिए 600 करोड़ रुपए देने का नतीजा बेहतर इलाज और पूरा इलाज लेने की बेहतर दर में होगा। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि आवंटित पैसा रोगी के हित में खर्च हो। फिर तृतीयक स्वास्थ्य रक्षा सेवा देने में बुनियादी ढांचे और काबिल मेडिकल पेशवरों की उपलब्धता दोनों स्तरों पर बड़ी चुनौती है। तीन संसदीय क्षेत्रों में एक मेडिकल कॉलेज खोलने की पहल से इसमें बहुत मदद मिलेगी। कई वजहों से स्वास्थ रक्षा लगातार परिवर्तनशील क्षेत्र है। हम जब स्वास्थ्य रक्षा सेवाएं देने के नए तरीकों के बारे में सोच रहे हैं तो टेक्नोलॉजी अनिवार्य है।

भारत में टीबी, मलेरिया, डेंगू, एच1एन1, महामारी बन चुका इन्फ्लूएंजा और रोगों की एंटीबायोटिक रोधी किस्में लगातार सेहत व आर्थिक सुरक्षा के लिए खतरा बनी हुई हैं तो हमें दिल-धमनियों के रोग, डायबिटीज, कैंसर जैसे असंक्रामक रोगों की उभरती चुनौती से भी निपटना है। इसके कारण स्वास्थ्य का बुनियादी ढांचा पहले ही दबाव में है। इलाज के खर्च के कारण हर साल करीब 6 करोड़ लोग गरीबी में धकेल दिए जाते हैं। यदि योजना का अधिकतम फायदा लेना हो तो बजट में घोषित स्वास्थ्य संबंधी विभिन्न कदमों और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन जैसे कार्यक्रमों को आपस में जोड़ना होगा। यह भी स्पष्टता जरूरी है कि सरकारी स्वास्थ्य सुविधाएं कौन-सी सेवाएं देंगी, कौन-सी अवस्था में रोगी निजी क्षेत्र का लाभ ले सकेंगे और इसके लिए कौन-सा तंत्र उपलब्ध है।

जांच, दवाओं और विभिन्न उपकरणों की सेवाओं हेतु एकसमान कीमतों के लिए सिस्टम बनाने की भी जरूरत है ताकि इस संबंध में पारदर्शिता पक्की की जा सके। अस्पतालों को स्वास्थ्य केंद्रों और समुदायों से जोड़कर केयर सिस्टम का स्थायित्व कायम करने की भी जरूरत है। इस तरह कार्यक्रम की योजना व क्रियान्वयन में समुदायों की भागीदारी अहम है। प्रभावी क्रियान्वयन ही आयुष्मान भारत की कामयाबी की कुंजी है। इसके लिए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय में स्वतंत्र संस्था या इकाई स्थापित की जा सकती है ताकि राज्यों को नियोजन, समन्वयन और तकनीक के स्तर पर मदद दी जा सके। इसमें क्षमता निर्माण और मानकों व दिशा-निर्देशों का विकास भी शामिल है।

अध्ययनों से पता चलता है कि देश में 65 फीसदी खर्च बाह्य रोगी स्वास्थ्य रक्षा पर ही होता है, जो रोगी को जेब से देना होता है। यदि व्यापक स्वास्थ्य रक्षा सेवा देना लक्ष्य है तो प्रभावी वित्तीय व्यवस्था और प्राथमिक स्वास्थ्य रक्षा सेवा बहुत जरूरी है। 1.50 लाख स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों की स्थापना बहुत बड़ी पहल है। टैक्स फायदे या सब्सिडी देकर निजी भागीदारी को प्रोत्साहित किया जा सकता है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य रक्षा योजना (एनएचपीएस) का लाभ लेने वाले हर व्यक्ति को किसी न किसी स्वास्थ्य या कल्याण केंद्र में पंजीयन कराना चाहिए। अनावश्यक उपयोग टालने के लिए लाभ लेने वाले से नाममात्र का भुगतान लेना चाहिए। दवाइयां और जांच सेवाएं रियायती दलों पर या जो देने की स्थिति में न हो उन्हें नि:शुल्क दी जा सकती है। प्राइमरी केयर फिजिशियन (पीसीपी) वाले ये केंद्र बाह्यरोगी सेवाएं तो देंगे ही, एनएचपीएस के लिए गेटकीपर का काम भी करेंगे। विशेषज्ञों वाले पोली-क्लिनिक और जांच की उच्च सुविधाएं भी स्थापित करनी होगीं ताकि प्राथमिक केंद्रों से भेजे रोगियों को सुविधा दी जा सके। यहां प्राथमिक केंद्रों से भेजे जाने पर ही इलाज हो।

एएचपीएस सदस्य की किसी भी अस्पताल में भर्ती केवल पीसीपी या विशेषज्ञों के परामर्श पर हो अपवाद सिर्फ दुर्घटना जैसी इमरजेंसी केस हों। इस तरह पीसीपी व विशेषज्ञ अस्पताल में अनावश्यक भर्ती और सर्जरी रोकने के लिए जिम्मेदार हों। योजना के लिए तय अस्पतालों को बुनियादी सुविधाओं और गुणवत्ता के आधार पर ग्रेड दी जानी चाहिए और सतत निगरानी रखनी चाहिए। केंद्र सरकार को राष्ट्रीय स्वास्थ्य नियामक प्राधिकरण स्थापित करना चाहिए और राज्य सरकारों पर जोर डालना चाहिए कि वे भी ऐसी संस्थाएं गठित करें। ऐसी सारी संस्थाओं के प्रमुख, राष्ट्रीय स्वास्थ्य नियामक प्राधिकरण के सदस्य होने चाहिए। इससे देशभर के स्वास्थ्यरक्षा सेक्टर में एकरूपता आ जाएगी। तीनों पहल को एकीकृत रूप से अमल में लाने का दूरगामी परिणाम होगा और हमें वाकई बेहतर सेहत वाला भारत दिखाई देगा। इलाज अथवा सर्जिकल प्रक्रियाओं और जांच व दवाइयों के उपयोग को तर्कसंगत बनाने से स्वास्थ्य रक्षा लागत में कमी आएगी। बड़ी आबादी के कारण स्वास्थ्य केंद्रों और सरकारी ढांचे को एकीकृत किए बिना एनएचपीएस लॉन्च करने से वांछित परिणाम नहीं मिलेगा। हमें समझना होगा कि इसके लिए अच्छी प्लानिंग, मजबूत नियमन, सरल व प्रभावी प्रक्रियाएं और टेक्नोलॉजी से सतत निगरानी बहुत जरूरी है। कमजोर क्रियान्वयन से न सिर्फ ऐसी योजनाओं की लागत अत्यधिक बढ़ जाएगी बल्कि भविष्य में हैल्थकेयर सेक्टर को आवंटन में दिक्कत आएगी।

कुल-मिलाकर मैं इस योजना को इनोवेटिव और नई जमीन तोड़ने वाला मानता हूं। यदि इसे कुशलता से लागू किया गया तो यह रूपांतरकारी असर डालेगी। कोई कारण नहीं है कि हम विवेकपूर्ण और कारगर ढंग से इसे सुनिश्चित नहीं कर सकते।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

डॉ. नरेश त्रेहान

ख्यात कार्डियोलॉजिस्ट एवं चेयरमैन व एमडी, मेदांता हार्ट इंस्टीट्यूट

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Web Title: स्वास्थ्य नियामक प्राधिकरण बनाए सरकार
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