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नोटबंदी से पहले के मुकाबले हम 44% ज्यादा कर रहे हैं कार्ड से पेमेंट, फिर भी एटीएम से निकासी 3% ही घटी

देशभर के कई एटीएम में एक साथ कैश खत्म होने की कई वजह बताई जा रही हैं। इसमें 2000 रुपए के नोटों की जमाखोरी भी है। हालांकि...

Dainik Bhaskar

Apr 22, 2018, 05:00 AM IST
नोटबंदी से पहले के मुकाबले हम 44% ज्यादा कर रहे हैं कार्ड से पेमेंट, फिर भी एटीएम से निकासी 3% ही घटी
देशभर के कई एटीएम में एक साथ कैश खत्म होने की कई वजह बताई जा रही हैं। इसमें 2000 रुपए के नोटों की जमाखोरी भी है। हालांकि ज्यादातर वरिष्ठ बैंकर्स तथा जानकार जिस एक कारण पर सहमत हैं, वह सर्कुलेशन में मौजूद मुद्रा बढ़ने की दर का जीडीपी बढ़ने की दर से पीछे रह जाना है।

मगर इस कमी के बीच यह भी साफ हो गया है कि एटीएम से कैश हासिल करने का हमारा मोह कम नहीं हो पा रहा। आरबीआई के आंकड़े बताते हैं कि नोटबंदी से ठीक पहले अक्टूबर 2016 में देशभर के एटीएम से जितनी राशि निकाली जा रही थी, फरवरी 2018 में उसमें सिर्फ 3 फीसदी की ही कमी आई है। अक्टूबर 2016 में देशभर में एटीएम से 2.55 लाख करोड़ रुपए निकाले गए थे। वहीं फरवरी 2018 में 2.48 लाख करोड़ रुपए निकाले गए। यह कमी भी तब जब एटीएम में कैश कम हुआ। वरना दिसंबर 2017 में तो हमने नोटबंदी के पहले के मुकाबले 9 हजार करोड़ रुपए ज्यादा कैश निकाला और जनवरी 2018 में नोटबंदी से पहले के ठीक बराबर।

हैरानी की बात यह है कि कार्ड के जरिए होने वाले पेमेंट बढ़ने के बावजूद एटीएम से ट्रांजेक्शन कम नहीं हुए हैं। अक्टूबर 2016 में देशभर में 51 हजार करोड़ रुपए का लेन-देन कार्ड के जरिए हुआ था। जो फरवरी 2018 में 44 फसदी बढ़कर 74 हजार करोड़ रुपए हो चुका है। हालांकि एटीएम से निकाली जा रही राशि के मुकाबले कार्ड पेमेंट 3.3 गुना कम है।

1700 नए

एटीएम स्थापित किए गए हैं नोटबंदी के बाद से अब तक।

कैश की कमी का कारण है ये ट्रांजेक्शन?

हां, इसलिए कि एटीएम सेे कैश का लेन-देन घटा नहीं, जबकि सर्कुलेशन में मौजूद मुद्रा 2.7 लाख करोड़ रुपए तक घट गई है।

इसे ऐसे समझें...




कई राज्यों के एटीएम में कैश खत्म होने के दर्जनों कारण गिनाए जा रहे हैं। मगर यह सच्चाई है कि सरकार ने नोट छापने और इनका सर्कुलेशन बढ़ने की दर कम कर दी। इतनी कि यह जीडीपी बढ़ने की दर से तालमेल नहीं बैठा पा रही। नोटबंदी के बाद सरकार की मंशा थी देशवासी कैश से ज्यादा पेमेंट के डिजिटल माध्यमों पर निर्भर हों, ताकि एटीएम ट्रांजेक्शन घटें। लेकिन ऐसा भी हो न सका। यहां एक साथ जानिए एटीएम में कैश की कमी के बारे में सबकुछ।

2.2 लाख

हो चुकी है फरवरी 2018 में देशभर में एटीएम की संख्या।




जरूरी है सर्कुलेशन में मुद्रा की सालाना ग्रोथ?

अर्थव्यवस्था के विशेषज्ञों के अनुसार सर्कुलेशन में मौजूद मुद्रा देश की जीडीपी (नॉमिनल) का 11 से 12 फीसदी रहे तो सही है। इस लिहाज से इसका जीडीपी के साथ बढ़ना भी जरूरी है। वित्तीय वर्ष 2011-12 से 2015-16 तक तो हर साल मुद्रा में बढ़ोतरी 11.6 से ऊपर रही भी। मगर नोटबंदी वाले साल में घटकर घटकर 8.8 फीसदी पर आ गई। वहीं अगले वित्तीय वर्ष 2017-18 में 10.9 फीसदी रही।

इधर वित्तीय वर्ष 2012 से 2016 के बीच देश की जीडीपी 57.5 फीसदी बढ़ी है। तब देश में चलन में मौजूद नकदी में भी 55.6 फीसदी की बढ़त देखी गई। यानी जीडीपी तथा चलन में मौजूद मुद्रा लगभग समान दर से बढ़ी।

मगर नोटबंदी वाले साल वित्तीय वर्ष 2017 तथा 18 में जहां जीडीपी 21.7 फीसदी बढ़ी है, वहीं चलन में मौजूद मुद्रा सिर्फ 10 फीसदी। जाहिर है नोटबंदी के बाद से जीडीपी विकास दर तथा चलन में मौजूद मुद्रा की विकास दर में बड़ा अंतर आ गया है।

कैश घटाया तो क्या डिजिटल पेमेंट बढ़े हैं?

नोटबंदी के समय सरकार ने भ्रष्टाचार कम करने के लिए ‘लेस कैश’ इकोनॉमी की बात कही थी। तब नवंबर की तुलना में डिजिटल ट्रांजेक्शन 10 लाख करोड़ रु.बढ़कर दिसंबर में 104 लाख करोड़ हो गया था। मार्च 2017 में यह 59% रिकॉर्ड बढ़त दर्ज कर 149 लाख करोड़ रुपए हो गया। मगर अब डिजिटल ट्रांजेक्शन 115 लाख करोड़ रुपए है, यानी नोटबंदी के दौर से सिर्फ 22.8 फीसदी ज्यादा।

लेकिन यूपीआई बढ़ा

यह सुविधा नोटबंदी के पूरे एक साल बाद नवंबर 2017 में आम हुई है। इस माह इससे 10.55 लाख ट्रांजेक्शन्स हुए। लेन-देन की राशि 9.6 हजार करोड़ रु. रही।

कार्ड ट्रांजेक्शन्स+मोबाइल बैंकिंग+यूपीआई मिलाकर 1.60 लाख करोड़ रुपए रहे हैं। जबकि सर्कुलेशन में मौजूद मुद्रा में 2.7 लाख करोड़ रुपए की कमी है। यानी इन तीन माध्यमों से ट्रांजेक्शन नोटों की कमी का करीब आधा ही है।

अर्थव्यवस्था के विशेषज्ञों के अनुसार सर्कुलेशन में मौजूद मुद्रा देश की जीडीपी (नॉमिनल) का 11 से 12 फीसदी रहे तो सही है। इस लिहाज से इसका जीडीपी के साथ बढ़ना भी जरूरी है। वित्तीय वर्ष 2011-12 से 2015-16 तक तो हर साल मुद्रा में बढ़ोतरी 11.6 से ऊपर रही भी। मगर नोटबंदी वाले साल में घटकर घटकर 8.8 फीसदी पर आ गई। वहीं अगले वित्तीय वर्ष 2017-18 में 10.9 फीसदी रही।

इधर वित्तीय वर्ष 2012 से 2016 के बीच देश की जीडीपी 57.5 फीसदी बढ़ी है। तब देश में चलन में मौजूद नकदी में भी 55.6 फीसदी की बढ़त देखी गई। यानी जीडीपी तथा चलन में मौजूद मुद्रा लगभग समान दर से बढ़ी।

मगर नोटबंदी वाले साल वित्तीय वर्ष 2017 तथा 18 में जहां जीडीपी 21.7 फीसदी बढ़ी है, वहीं चलन में मौजूद मुद्रा सिर्फ 10 फीसदी। जाहिर है नोटबंदी के बाद से जीडीपी विकास दर तथा चलन में मौजूद मुद्रा की विकास दर में बड़ा अंतर आ गया है।

यहां मोबाइल बैंकिंग घटा

नवंबर 2016 में 7.23 करोड़ लेन-देन मोबाइल बैंकिंग एप के जरिए हुए थे। इनसे 1.24 लाख करोड़ रुपए ट्रांसफर हुए।

फरवरी 2018 में 10.25 करोड़ बार इस तरह लेन-देन हुए। ट्रांसफर होने वाली कुल राशि 94 हजार करोड़ रुपए रही।

फरवरी 2018 में

17.12 लाख ट्रांजेक्शन्स यूपीआई के माध्यम से हुए। ट्रांजेक्शन्स की राशि 19 हजार करोड़ रुपए रही।

नोटबंदी जैसे हालातों की इसलिए आई याद

सोमवार-मंगलवार को देश के कई राज्यों से एटीएम में कैश न होने की खबरें आईं। इनमें दिल्ली, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, महाराष्ट्र, झारखंड, बिहार, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक शामिल थे। नवंबर 2016 में नोटबंदी के बाद यह पहली बार था, जब देश के इतने राज्य में एक साथ इतने एटीएम खाली हुए।

ये भी कारण गिनाए जा रहे हैं

बैंक में कम जमा हो रहा कैश:

बैंक
से पैसा निकालने की दर जमा करने की दर से अधिक रही है। मार्च 2018 को खत्म हुए वित्तीय वर्ष में बैंक में सिर्फ 6.7 प्रतिशत ज्यादा पैसा जमा हुआ। जबकि पिछले साल 2016-17 की इसी अवधि के दौरान ये 15.3 प्रतिशत ज्यादा था। इसके उलट बैंकों से पैसे ज्यादा निकले गए। 2016-17 में बैंकों से पैसा निकालने की दर 8.2% ज्यादा थी, जो 2017-18 में बढ़कर 10.3 प्रतिशत रही।

2000 के नोटों की छपाई बंद:

फिलहाल
सिस्टम में 2000 रुपए के 6 लाख 70 हजार करोड़ नोट हैं। हालांकि छपाई बंद होने से इनका सर्कुलेशन घटा है।

अब आगे क्या?

देश के कई राज्यों में कैश संकट अब भी बना हुआ है। इससे निपटने के लिए नोटों की छपाई तेज की गई है। इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में 30-35 जगहों पर छापेमारी की है। इधर एटीएम ऑपरेटर्स ने अन्य एटीएम ट्रांजैक्शन पर ज्यादा चार्ज वसूलने की मांग उठाई है।

अटकलें-अफवाहें




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