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भरोसा जीतकर ही फेक न्यूज़ से निपटना संभव

स्मृति ईरानी में कमाल की हाजिर जवाबी का गुण है। पिछले माह संसद के सेंट्रल हॉल में सांसद उन्हें जन्मदिन की...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 13, 2018, 05:45 AM IST

भरोसा जीतकर ही फेक न्यूज़ से निपटना संभव
स्मृति ईरानी में कमाल की हाजिर जवाबी का गुण है। पिछले माह संसद के सेंट्रल हॉल में सांसद उन्हें जन्मदिन की शुभकामनाएं दे रहे थे तो मैं भी शरारती मुस्कान के साथ अागे बढ़ा, ‘हैपी बर्थडे मैम। बेशक मैं आज आपकी उम्र नहीं पूछूंगा’। तपाक से जवाब आया, ‘धन्यवाद, मैं आज 42 की हो गई हूं। पत्रकारों के विपरीत मेरे पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है!’

यह चतुराईभरा जवाब स्मृति ईरानी की खासियत है : प्रतिभाशाली और करिश्माई राजनेता लेकिन, ध्रुवीकरण करने वाली शख्सियत, जिन्हें आलोचक रूखी और अहंकारी मानते हैं। प्रशंसक उन्हें प्रभावशाली अौर आत्मविश्वास से भरी महिला के रूप में देखते हैं। भाजपा प्रवक्ता के रूप में अपनी चुटिली टिप्पणियों के कारण वे टेलीविजन और सार्वजनिक सभाओं में सर्वाधिक आमंत्रित नेताओं में से हैं। चूंकि वे छोटे परदे की बड़ी स्टार रही हैं तो तत्काल लोगों का ध्यान और भीड़ आकर्षित करती हैं। उन्हें अगले साल अमेठी में राहुल गांधी की प्रबल प्रतिद्वंद्वी के रूप में भी पेश किया जा रहा है। किंतु मंत्री के रूप में पहले मानव संसाधन और अब सूचना-प्रसारण मंत्रालय में जिन गुणों के कारण वे पहले अलग नज़र आती थीं, अब उन्हें उनकी कमजोरी के रूप में देखा जाता है : प्रभावी मंत्रियों से अपेक्षा होती है कि उनमें सबसे पहले प्रशासन की बारीकियां समझने की काबिलियत हों, वे सिर्फ हाई प्रोफाइल सेलेब्रिटी भर न हों। उनकी भूमिका टकराव की नहीं, सुलह-सफाई कराने वाले की होती है।

‘फेक न्यूज़’ सर्कुलर पर हाल में हुए विवाद को ही लें। इसमें सूचना-प्रसारण मंत्रालय को अधिकार दिया गया है कि ‘फेक न्यूज़’ की शिकायत मिलते ही वह किसी पत्रकार की मान्यता निलंबित कर सकता है। सर्कुलर चुनाव के महत्वपूर्ण वर्ष में मीडिया चर्चा को नियंत्रित करने का खुला प्रयास था। सर्कुलर प्रधानमंत्री कार्यालय के हस्तक्षेप पर 24 घंटे के भीतर वापस लेना पड़ा। इससे पता चलता है कि संबंधित पक्षों से सलाह-मशविरे के बिना एकतरफा ढंग से लिए फैसले आखिर में उस सर्वशक्तिमान प्रतीत होती सरकार के लिए शर्मिंदगी का कारण बन सकते हैं, जो अन्यथा शायद ही कभी अपनी गलतियां स्वीकार करती है।

ऐसी बात नहीं है कि ‘फेक न्यूज़’ महत्वपूर्ण संपादकीय, तकनीकी और नैतिक चुनौती नहीं है या स्मृति ईरानी को इस मुद‌्दे पर कोई सार्थक संवाद शुरू नहीं करना चाहिए। मुख्य प्रश्न यह है: क्या सरकार इस बहस में पाक-साफ होकर आई है? क्योंकि यही वह सत्ता है, जिसने रोज प्रकट होती दक्षिणपंथी वेबसाइटों, खुले आम पक्ष लेते टीवी चैनलों और कर्कश सोशल मीडिया के साथ मिथ्या प्रचार का ऐसा अभियान चला रखा है, जो असहमति के किसी भी स्वर को परोक्ष रूप से धमकाकर झुकाना चाहता है। जब मंत्री झूठ फैलाते हों, अपमानजनक ट्विटर हैंडल फॉलो करते हों या जानबूझकर साम्प्रदायिक नफरत फैला रही विषैली वेबसाइट्स का बचाव करते हों तो निश्चित ही वे ‘फेक न्यूज़’ को परिभाषित करने का नैतिक आधार गंवा देते हैं। उदाहरण के लिए दक्षिणपंथी वेबसाइट ‘पोस्टकार्ड न्यूज़’ हाल ही में तब विवाद में आ गई थी जब इसके कर्नाटक स्थित संपादक को ऐसी स्टोरी पोस्ट करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया, जिसमें दावा किया गया था कि मुस्लिम व्यक्ति के हमले में कोई जैन साधु जख्मी हो गए हैं। खबर गलत साबित हुई। पत्रकार गलतियां करते हैं लेकिन, जब कोई व्यक्ति या संगठन लगातार व जानबूझकर उपद्रव भड़का रहा हो तो कानून-व्यवस्था के तंत्र को कार्रवाई करनी चाहिए। ऐसे मीडिया मंचों को बहिष्कृत करने की बजाय भाजपा के शीर्ष लोग उसका बचाव करते दिखे। संपादक पर पुलिस कार्रवाई के मुखर विरोधी भाजपा सांसद प्रताप सिम्हा को स्मृति ईरानी ने पुनर्गठित प्रेस काउंसिल का सदस्य बना दिया!

माननीय मंत्री महोदया एक अर्थ में शास्त्री भवन के अपने उन पूर्ववर्तियों का ही अनुसरण कर रही हैं, जो समझते थे कि सूचना-प्रसारण मंत्रालय मीडिया को ‘कंट्रोल’ करने और उसे सरकारी मिथ्या प्रचार का जरिया बनाने के लिए है। इसकी शुरुआत 1975 की इमरजेंसी के दौरान वीसी शुक्ल के साथ हुई, जो इंदिरा गांधी और उनके बेटे संजय के स्पष्ट निर्देशों के तहत मीडिया का कठोरता से दमन करने के लिए कुख्यात हुए। हालांकि, 1975 और अब में एक महत्वपूर्ण फ़र्क है। तब मीडिया जगत कुछ प्रमुख राष्ट्रीय व क्षेत्रीय अखबारों तक सीमित था। निजी टीवी चैनल नहीं थे, इंटरनेट नहीं था और न सोशल मीडिया। अब मीडिया ‘जंगल’ सबके लिए खुला खूंखार तंत्र है, जिसमें स्वीकार्य व्यवहार के कोई नियम या आचार संहिता स्थापित करना लगभग असंभव है। मसलन, क्या वाकई किसी को यह भरोसा है कि ट्विटर या फेसबुक जैसे डेटा निगलने वाले विशाल ‘दानव’ को हर घंटे अाने वाले लाखों ट्वीट और पोस्ट पर निगरानी रखकर नियंत्रित किया जा सकता है? पागल कर देने वाले इस प्लेटफॉर्म को नियमों में बांधना किसी व्यक्ति या सरकार के बस की बात नहीं है फिर वह कितनी ही शक्तिशाली क्यों न हो। इसलिए आगे बढ़ने का सबसे अच्छा रास्ता है न्यूज़रूम्स के भीतर विश्वसनीयता, निष्ठा और स्वतंत्रता जैसे पत्रकारिता के असली मूल्यों को प्रोत्साहन देना। संभव है हम पत्रकारों को भी आत्म-परीक्षण की जरूरत हो कि हम नेताओं और जनता के ऐसे आसान निशाना कैसे बन गए। हो सकता है हमें उन लोगों का पर्दाफाश करने की जरूरत हो, जो राजनीतिक और व्यक्तिगत एजेंडे के तहत जानबूझकर और लगातार खबर के रूप में शोर का ‘उत्पादन’ कर रहे हैं। संभव है हमें उस आत्म-सम्मान अौर नैतिक अधिकार की जरूरत हो कि हम उन लोगों को आईना दिखा सकें, जो हम पर ‘पेड मीडिया’ और ‘प्रेस्टीट्यूट’ का तमगा लगाते हैं। संभव है हमें फिर वह जगह हासिल करने की जरूरत हो कि हम सत्ता से भय या पक्षपात के बिना सच कह सकें। क्योंकि हमने ऐसा नहीं किया तो अगली बार जब सरकार हमारा दरवाजा खटखटाते आएगी तो हम खुद के अलावा किसी को दोष नहीं दे पाएंगे।

पुनश्च: ‘फेक न्यूज़’ का पहला दर्ज किया गया वाकया कौन-सा है? शायद हमें महाभारत काल में जाना पड़े। याद करें कैसे कृष्ण ‘ईमानदार’ युधिष्ठिर को गुरु द्रोणाचार्य से उनके पुत्र अश्वत्थामा की ‘मृत्यु’ के बारे में ‘झूठ’ बोलने पर मजबूर करते हैं? सोचता हूं जानबूझकर गलत जानकारी देने पर आज के शासक कृष्ण को कौन-सी सजा देते! (ये लेखक के अपने विचार हैं।)

राजदीप सरदेसाई

वरिष्ठ पत्रकार

rajdeepsardesai52@gmail.com

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Web Title: भरोसा जीतकर ही फेक न्यूज़ से निपटना संभव
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