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मानव स्वभाव कितना भी उग्र हो, प्रेम से सुनकर बदला जा सकता है

जेल में लगभग सारे कट्‌टर अपराधी अकेले में रोज अपने अपराध से गुजरते हैं और सोचते हैं कि काश वे वह अंतिम भूल न करते,...

Dainik Bhaskar

May 07, 2018, 05:45 AM IST
मानव स्वभाव कितना भी उग्र हो, प्रेम से सुनकर बदला जा सकता है
जेल में लगभग सारे कट्‌टर अपराधी अकेले में रोज अपने अपराध से गुजरते हैं और सोचते हैं कि काश वे वह अंतिम भूल न करते, जिसने उन्हें पकड़वाकर जेल भिजवा दिया। जब वे दूसरे कैदियों के साथ होते हैं, मिलकर दिन-प्रतिदिन रोज कुछ वर्ग फीट की जगह में वही काम बरसों करते रहते हैं, तो उनमें हताशा उपजती है, उनकी भावनाएं सख्त हो जाती हैं और कभी-कभी तो उन्हें यह भी लगने लगता है कि ‘मैंने जो किया वह सही था।’ और तो और हमारा 1894 का प्रिजनर्स एक्ट सजा के बारे में बहुत कुछ कहता है लेकिन, इस बारे में मौन है कि उन्हें रिहाई के बाद समाज का सामना करने लायक बनाने के लिए क्या किया जाए। जबकि कारावास में यह दूसरा हिस्सा अधिक महत्वपूर्ण है। किए की सजा देने के साथ उन्हें बेहतर मानव बनाना भी जेल जीवन का उद्‌देश्य होता है।

और यही कारण है कि जब वे पैरोल पर घर जाते हैं या रिहा कर दिए जाते हैं, तो वे नहीं जानते कि अपने परिवार का सामना कैसे करें। भारत में कैिदयों के लिए खुद को समाज में अपनाए जाने लायक बनाने की प्रक्रिया सीखना और बदलाव की ओर प्रगति करने के मौके न होने से वे अधिक हिंसक हो जाते हैं और उनमें से कई अपराध को दोहरा देते हैं। कई बार तो कैदी सजा की अवधि खत्म होने की संभावना से घबरा जाते हैं और रिहा होने पर सिर्फ लौट आने के लिए ही कोई अपराध कर डालते हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि हमारे देश में अपराध दोहराने वाले अपराधी अधिक है, जहां कैदी प्राय: अपराध करने के दुष्चक्र में फंस जाते हैं। यही कारण है कि जब भी कोई नया अपराध होता है पुलिस आमतौर पर पुराने आपराधिक रिकॉर्ड वाले लोगों की सूची निकालती है। अपराध दोहराने वाले अपराधियों की दर में गिरावट के लिए साबरमती केंद्रीय जेल ने हाल में स्थापित साइकोलॉजिकल सेल में एक साइकोलॉजिकल इंटरवेंशन प्रोग्राम शुरू किया है। भारत में जेल के भीतर अपनी तरह का यह पहला कार्यक्रम फरवरी 2018 में रक्षा शक्ति यूनिवर्सिटी से कैदियों के हिंसक व्यवहार पर पीएचडी कर रही रीना शर्मा ने शुरू किया है। वे अब इन कैदियों में स्वाभिमान और सामाजिक पहचान लाने की कोशिश कर रही हैं। 15 साल का अनुभव रखनी वाली यह फोरेंसिक साइकोलॉजिस्ट ‘द माइंड प्रैक्टिस’ नामक संगठन की संस्थापक भी हैं, जो पहले नई दिल्ली की तिहाड़ जेल व हरियाणा की भोंडसी जेल में काम कर चुकी हैं और अब पुडुचेरी की उप राज्यपाल किरण बेदी सिफारिश पर उस केंद्र शासित प्रदेश की जेलों में कैदियों के मानसिक कल्याण के लिए काम कर रही हैं।

रीना का मानना है कि कोई भी सभ्य समाज सिर्फ सजा से संतुष्ट नहीं हो सकता अौर उसे सोचना ही होगा कि इससे आगे क्या? कैदियों को सुधार का रास्ता दिखाने की जरूरत है, क्योंकि आखिरकार वे समाज में वापस जाएंगे। दो माह पुरानी यूनिट के पीछे विचार यह है कि कैदी को उनके अपराध की वास्तविकता से निपटने में मदद करना, उनकी जिम्मेदारी लेने को तैयार करना, जेल के मौजूदा जीवन का नियंत्रण अपने हाथ में लेना और इस प्रक्रिया के दौरान उन्हें उस एकीकृत बाहरी जीवन के लिए तैयार करना है, जिसका सामना उन्हें रिहाई के बाद करना है। रीना सबसे पहले कैदियों के आपराधिक व्यवहार के मूल कारण की पहचान करती हैं और फिर करुणा के साथ उनकी कहानी सुनकर उन कारणों पर धीरे-धीरे काम करती हैं। वे संकेतों को पकड़ती हैं और देखती हैं कि किसमें बदलाव की क्षमता व इच्छा है। पिछले दस माह से अब तक उन्होंने 110 अपराधियों पर काम किया है और सभी ने विभिन्न स्तरों का व्यावहारिक बदलाव देखा है।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो की प्रिजन स्टेटिस्टिक्स इंडिया 2015 रिपोर्ट के मुताबिक दिसंबर 2015 तक देश में 4,19,623 कैदी थे। इनमें से 5,203 कैदियों को मानसिक बीमारियां हैं। सितंबर 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने भी सारे राज्यों को कैदियों की काउंसलिंग के लिए काउंसलरों की नियुक्ति करने का आदेश दिया था। एक समाज के रूप में हमें हिंसक व्यवहार वाले लोगों को सजा देने और काउंसलिंग उपलब्ध कराने में अच्छा संतुलन लाने की जरूरत है। याद रहे कि यदि कट्‌टर अपराधी बदले जा सकते हैं तो जरूरत से ज्यादा टेलीविजन देखने के कारण हिंसा के कुछ हल्के संकेत दे रही हमारी अगले पीढ़ी को भी सिर्फ प्रेम के साथ सुनकर ही बदला जा सकता है।

जेल में लगभग सारे कट्‌टर अपराधी अकेले में रोज अपने अपराध से गुजरते हैं और सोचते हैं कि काश वे वह अंतिम भूल न करते, जिसने उन्हें पकड़वाकर जेल भिजवा दिया। जब वे दूसरे कैदियों के साथ होते हैं, मिलकर दिन-प्रतिदिन रोज कुछ वर्ग फीट की जगह में वही काम बरसों करते रहते हैं, तो उनमें हताशा उपजती है, उनकी भावनाएं सख्त हो जाती हैं और कभी-कभी तो उन्हें यह भी लगने लगता है कि ‘मैंने जो किया वह सही था।’ और तो और हमारा 1894 का प्रिजनर्स एक्ट सजा के बारे में बहुत कुछ कहता है लेकिन, इस बारे में मौन है कि उन्हें रिहाई के बाद समाज का सामना करने लायक बनाने के लिए क्या किया जाए। जबकि कारावास में यह दूसरा हिस्सा अधिक महत्वपूर्ण है। किए की सजा देने के साथ उन्हें बेहतर मानव बनाना भी जेल जीवन का उद्‌देश्य होता है।

और यही कारण है कि जब वे पैरोल पर घर जाते हैं या रिहा कर दिए जाते हैं, तो वे नहीं जानते कि अपने परिवार का सामना कैसे करें। भारत में कैिदयों के लिए खुद को समाज में अपनाए जाने लायक बनाने की प्रक्रिया सीखना और बदलाव की ओर प्रगति करने के मौके न होने से वे अधिक हिंसक हो जाते हैं और उनमें से कई अपराध को दोहरा देते हैं। कई बार तो कैदी सजा की अवधि खत्म होने की संभावना से घबरा जाते हैं और रिहा होने पर सिर्फ लौट आने के लिए ही कोई अपराध कर डालते हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि हमारे देश में अपराध दोहराने वाले अपराधी अधिक है, जहां कैदी प्राय: अपराध करने के दुष्चक्र में फंस जाते हैं। यही कारण है कि जब भी कोई नया अपराध होता है पुलिस आमतौर पर पुराने आपराधिक रिकॉर्ड वाले लोगों की सूची निकालती है। अपराध दोहराने वाले अपराधियों की दर में गिरावट के लिए साबरमती केंद्रीय जेल ने हाल में स्थापित साइकोलॉजिकल सेल में एक साइकोलॉजिकल इंटरवेंशन प्रोग्राम शुरू किया है। भारत में जेल के भीतर अपनी तरह का यह पहला कार्यक्रम फरवरी 2018 में रक्षा शक्ति यूनिवर्सिटी से कैदियों के हिंसक व्यवहार पर पीएचडी कर रही रीना शर्मा ने शुरू किया है। वे अब इन कैदियों में स्वाभिमान और सामाजिक पहचान लाने की कोशिश कर रही हैं। 15 साल का अनुभव रखनी वाली यह फोरेंसिक साइकोलॉजिस्ट ‘द माइंड प्रैक्टिस’ नामक संगठन की संस्थापक भी हैं, जो पहले नई दिल्ली की तिहाड़ जेल व हरियाणा की भोंडसी जेल में काम कर चुकी हैं और अब पुडुचेरी की उप राज्यपाल किरण बेदी सिफारिश पर उस केंद्र शासित प्रदेश की जेलों में कैदियों के मानसिक कल्याण के लिए काम कर रही हैं।

रीना का मानना है कि कोई भी सभ्य समाज सिर्फ सजा से संतुष्ट नहीं हो सकता अौर उसे सोचना ही होगा कि इससे आगे क्या? कैदियों को सुधार का रास्ता दिखाने की जरूरत है, क्योंकि आखिरकार वे समाज में वापस जाएंगे। दो माह पुरानी यूनिट के पीछे विचार यह है कि कैदी को उनके अपराध की वास्तविकता से निपटने में मदद करना, उनकी जिम्मेदारी लेने को तैयार करना, जेल के मौजूदा जीवन का नियंत्रण अपने हाथ में लेना और इस प्रक्रिया के दौरान उन्हें उस एकीकृत बाहरी जीवन के लिए तैयार करना है, जिसका सामना उन्हें रिहाई के बाद करना है। रीना सबसे पहले कैदियों के आपराधिक व्यवहार के मूल कारण की पहचान करती हैं और फिर करुणा के साथ उनकी कहानी सुनकर उन कारणों पर धीरे-धीरे काम करती हैं। वे संकेतों को पकड़ती हैं और देखती हैं कि किसमें बदलाव की क्षमता व इच्छा है। पिछले दस माह से अब तक उन्होंने 110 अपराधियों पर काम किया है और सभी ने विभिन्न स्तरों का व्यावहारिक बदलाव देखा है।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो की प्रिजन स्टेटिस्टिक्स इंडिया 2015 रिपोर्ट के मुताबिक दिसंबर 2015 तक देश में 4,19,623 कैदी थे। इनमें से 5,203 कैदियों को मानसिक बीमारियां हैं। सितंबर 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने भी सारे राज्यों को कैदियों की काउंसलिंग के लिए काउंसलरों की नियुक्ति करने का आदेश दिया था। एक समाज के रूप में हमें हिंसक व्यवहार वाले लोगों को सजा देने और काउंसलिंग उपलब्ध कराने में अच्छा संतुलन लाने की जरूरत है। याद रहे कि यदि कट्‌टर अपराधी बदले जा सकते हैं तो जरूरत से ज्यादा टेलीविजन देखने के कारण हिंसा के कुछ हल्के संकेत दे रही हमारी अगले पीढ़ी को भी सिर्फ प्रेम के साथ सुनकर ही बदला जा सकता है।

फंडा यह है कि  मानव व्यवहार की सुंदरता यह है कि प्रेम के साथ सुनने के सरल से कौशल से उसे किसी भी स्थिति से वापस सामान्य दशा की ओर लाया जा सकता है।

फंडा यह है कि  मानव व्यवहार की सुंदरता यह है कि प्रेम के साथ सुनने के सरल से कौशल से उसे किसी भी स्थिति से वापस सामान्य दशा की ओर लाया जा सकता है।

एन. रघुरामन

मैनेजमेंट गुरु

raghu@dbcorp.in

एन. रघुरामन

मैनेजमेंट गुरु

raghu@dbcorp.in

मानव स्वभाव कितना भी उग्र हो, प्रेम से सुनकर बदला जा सकता है
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