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‘राजी’, रजामंदी और व्यक्तिगत स्वतंत्रता

मेघना राखी गुलजार की आलिया भट्‌ट अभिनीत फिल्म ‘राजी’ टिकिट खिड़की पर धूम मचाने के साथ ही अत्यंत प्रशंसा प्राप्त कर...

Dainik Bhaskar

May 30, 2018, 05:50 AM IST
‘राजी’, रजामंदी और व्यक्तिगत स्वतंत्रता
मेघना राखी गुलजार की आलिया भट्‌ट अभिनीत फिल्म ‘राजी’ टिकिट खिड़की पर धूम मचाने के साथ ही अत्यंत प्रशंसा प्राप्त कर रही है। एक युवती को जासूस बनाकर एक पाकिस्तानी से ब्याह दिया जाता है। वह ब्याहता पाकिस्तान से सूचनाएं भेजती है। वह गर्भवती अवस्था में अपना मिशन पूरा करके भारत आती है परंतु दबाव के बाद भी गर्भपात कराने से इनकार करती है। उसकी कोख में पल रहा बच्चा उसका अपना है और कोख पर केवल उसका अधिकार है। अब अगर इस फिल्म का भाग दो बनाया जाए, तो वह बच्चा युवा होकर अपने पिता से मिलना चाहेगा। पिता के वतन जाना चाहेगा। कोई सरहद कोख बांट नहीं सकती।

याद आती है राजकुमार संतोषी की फिल्म ‘दामिनी’। एक गरीब घर की कन्या से एक अमीरजादे को प्यार हो जाता है। विरोध के बावजूद वह विवाह कर लेता है। सारा परिवार बहू के आचार-विचार से खुश है। होली के दिन उसका देवर घर की नौकरानी से दुष्कर्म करता है। दामिनी चश्मदीद गवाह है और वह दुष्कर्मी को दंडित कराती है। एक दर्शक ने कहा कि बहू का काम है ससुराल की रक्षा करना परंतु इस बहू ने तो अपने देवर को ही मृत्युदंड दिलवा दिया। अवाम के अवचेतन में समानता, स्वतंत्रता और न्याय के मूल्यों के लिए स्थान नहीं है।

अरुणा राजे की फिल्म ‘रिहाई’ में सौराष्ट्र के एक गांव के उन कारीगरों की कहानी है, जो ग्यारह माह मुंबई में काम करते हैं और एक माह की छुट्‌टी में घर आते हैं। इस तरह उस बस्ती में ग्यारह माह तक केवल औरतें, बच्चे और उम्रदराज लोग रहते हैं। उसी बस्ती का एक बातूनी व्यक्ति दुबई में मजदूरी करता है और एक माह के लिए अपने कस्बे में आता है। विवाहिता हेमा मालिनी अभिनीत स्त्री उसकी लफ्फाज़ी से मोहित होकर उसके साथ संबंध बना लेती है। जब उसका पति ग्यारह माह बाद लौटकर आता है तब अपनी प|ी को गर्भवती पाता है। प|ी उसे सब कुछ बता देती है। वह अपनी प|ी को इतना प्यार करता है कि उसे क्षमा करना चाहता है परंतु उसकी शर्त है कि वह गर्भपात करा ले। सारा गांव यही चाहता है परंतु वह गर्भपात से इनकार करती है। ‘रिहाई’ के क्लाइमैक्स में ग्राम पंचायत हेमा को गांव छोड़ने का आदेश देती है। एक उम्रदराज महिला खड़े होकर कहती है कि हमेशा स्त्रियों से यह उम्मीद की जाती है कि वे सीता-सा आचरण करें परंतु क्या पुरुष कभी राम-सा आचरण करते हैं? वह उम्रदराज सभी स्त्रियों से कहती है कि हेमा की तरह वे सब भी गांव छोड़ दें और ऐसा होते देखकर पुरुष उनको मनाते हैं और हेमा का निष्कासन वापस लेते हैं।

दरअसल, हिन्दुस्तानी सिनेमा में स्त्री पात्रों के विविध रूप प्रस्तुत किए जाते हैं। 1937 में शांताराम की फिल्म ‘दुनिया ना माने’ की चौदह वर्षीय कन्या अपने दुजवर साठ वर्षीय पति को अपने शरीर को हाथ भी नहीं लगाने देती। मेहबूब खान की ‘नजमा’ की डॉक्टर बहू परदा नहीं करती। सारा परिवार उससे खफा है परंतु परदा नहीं करने के कारण ही वह अपने श्वसूर को हो रहे हृदयघात को देख पाती है और सही समय पर उपचार करके उसके प्राणों की रक्षा करती है। इसी कथा को ऋषिकेश मुखर्जी ने दशकों बाद सारे पात्र एक हिन्दू परिवार में रोपित किए थे। इसी तरह ‘मदर इंडिया’ की राधा और गाइड की रोजी महिला के दो स्वरूप हैं, तो शूजीत सरकार की ‘कहानी’ की नायिका तीसरा स्वरूप है।

हम व्यक्तियों को जातियों और अन्य श्रेणियों में बांटकर देखने की भूल करते हैं, जबकि हर व्यक्ति एक संसार भी है, जो विचार की धुरी पर घूमता है। अत: वैचारिक रेजीमेंटेशन का प्रयास भयावह परिणाम दे सकता है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता का महत्व हमारे अपने वेदों और उपनिषदों में वर्णित है। सूत्र संदेश ‘अहम ब्रह्मास्मी’ अर्थात मैं स्वयं ही अपना कर्म और विचार तय करते हुए अपने आप में एक संसार हूं। लोकप्रिय नारेबाजी इन गहराइयों में गूंजती हुई आवाज की तरह है जैसे सूखे कुंए से भांय भांय की आवाज आती है।

जयप्रकाश चौकसे

फिल्म समीक्षक

jpchoukse@dbcorp.in

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