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‘क्वीन’ और ‘राजकुमार’ फिर आ रहे हैं एकसाथ

क्वीन कंगना रनौत और अभिनेता राजकुमार राव फिर एक बार साथ-साथ काम कर रहे हैं। फिल्म ‘मेंटल है क्या?’ लंदन में शूट की...

Dainik Bhaskar

Jun 12, 2018, 05:50 AM IST
‘क्वीन’ और ‘राजकुमार’ फिर आ रहे हैं एकसाथ
क्वीन कंगना रनौत और अभिनेता राजकुमार राव फिर एक बार साथ-साथ काम कर रहे हैं। फिल्म ‘मेंटल है क्या?’ लंदन में शूट की जा रही है। सनकी व्यक्ति को ‘मेंटल’ कहना शुरू किया गया सलमान खान अभिनीत ‘क्योंकि’ से। इरविंग वैलेस की पुस्तक का नाम है ‘स्क्वैयर पेग्स : सम अमेरिकन्स हू डेयर्ड टू बी डिफरेंट’। स्क्वैयर पेग इन राउंड होल’ अंग्रेजी का मुहावरा है गुजरे जमाने के सितारे राजकुमार को भी सनकी माना जाता था। यह बात मौजूदा राजकुमार राव के बारे में नहीं है। उनके सनकीपन के किस्से चटखारे लेकर सुनाए जाते हैं। ज्ञातव्य है कि इन्हीं राजकुमार ने ‘मदर इंडिया’ में नरगिस के पति की भूमिका का निर्वाह किया था। जब बलदेवराज चोपड़ा की फिल्म वक्त सफल हुई तो उन्होंने फोन पर चोपड़ा से कहा, ‘जानी, सुना है कि आजकल तुम हमारे जूते की खा रहे हो।’ उस फिल्म में उन्होंने सफेद रंग के चमड़े के जूते पहने थे।

क्वीन कंगना भी अपने मन की ही सुनती हैं और किसी वैचारिक ढांचे को स्वीकार नहीं करतीं। संभवत: उनके कड़े संघर्ष ने उन्हें ऐसा बना दिया है। वे फुटपाथ पर भी भूखे पेट सोई हैं। वे अच्छे-खासे मध्यम वर्ग की कन्या हैं परंतु अभिनय की ज़िद में उन्होंने बहुत कुछ सहा है। उन्होंने महेश भट्ट द्वारा निर्मित एवं अनुराग बसु द्वारा निर्देशित ‘गैंगस्टर’ से अपनी पहचान बनाई, जबकि वे पहले ‘बूम’ जैसी फूहड़ फिल्मों में काम कर चुकी थीं परंतु सितारा हैसियत अानंद एल राय की ‘तनु वेड्स मनु’ से ही मिली है। इसी फिल्म के भाग दो में उनकी अभिनीत दोहरी भूमिकाओं में एक भूमिका हरियाणा में जन्मी लड़की की थी। इस भूमिका के लिए स्वयं को तैयार करने के लिए उन्होंने अपने को बदलकर हरियाणा के कॉलेज में दाखिला लिया था। क्वीन कंगना का मिज़ाज उनकी जुल्फों की तरह आंका-बांका है। जब वे अच्छे मूड में होती हैं तब उनसे अधिक प्यारा, मीठा कोई व्यक्ति नहीं हो सकता परंतु जब वे तुनकमिज़ाजी पर उतर आती हैं तब तलवार की तरह हो जाती हैं। अब देखना यह है कि ‘झांसी की रानी’ फिल्म में वे शमशीरबाजी कैसे अभिनीत करती हैं। कंगना के साथी कलाकार राजकुमार राव की शक्ल-सूरत एक आम आदमी के समान है परंतु वे प्रतिभाशाली अभिनेता हैं। कुछ लोग इतने कैमरा फ्रेंडली होते हैं कि यथार्थ से अधिक बेहतर परदे पर नज़र आते हैं। जिगर मुरादाबादी जब मुशायरे में शेर सुनाते थे तो शेर दर शेर वे सुंदर लगने लगते थे। आपका काम आपके दिखने-दिखाने को बदलता रहता है।

विजय तेंडुलकर के नाटक ‘पंछी ऐसे आते हैं’ में बिन बुलाया मेहमान घर की साधारण-सी दिखने वाली कन्या को अपनी बातों से इस कदर प्रभावित करता है कि एक बार जब उसे देखने वाला वर आता है तब वह मेहमान निर्मित अपनी छवि को मन में बसाए सामने प्रस्तुत होती है और उसे पसंद कर लिया जाता है। नाटक में वह स्वयं ही संभावित वर के विवाह निवेदन को अस्वीकृत कर देती है, क्योंकि वह जानती है कि उसकी जिस छवि को स्वीकार किया गया है वह उसकी अपनी नहीं है। गोयाकि, काया की माया को स्वीकार किया गया है और वह छल के आधार पर अपना वैवाहिक जीवन प्रारंभ नहीं करना चाहती। महान तेंडुलकर के नाटकों में अर्थ की अनेक परतें होती हैं।

एक बार राज कपूर ने विजय तेंडुलकर को आमंत्रित किया था और वे चाहते थे कि ‘घूंघट के पट खोल’ तेंडुलकर लिखें। वे तीन बार मिले परंतु पटकथा बनने के पहले ही राज कपूर जीवन मंच से पटाक्षेप कर गए। घंूघट के पट खुले ही नहीं। यह अजीब बात है कि किसी महान फिल्मकार के अधूरे काम कभी प्रकाशित ही नहीं हुए। गुरुदत्त भी कई फिल्मों का आकल्पन करते हुए उसे अधूरा ही छोड़ देते थे। इसी तरह मेहबूब खान की ‘हब्बा खातून’ भी जाने कहां खो गई है। आज सुलगते कश्मीर में हब्बा खातून बनाना कितना सामयिक हो सकता है।

जयप्रकाश चौकसे

फिल्म समीक्षक

jpchoukse@dbcorp.in

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