Hindi News »Rajasthan »Rani» उठते-िगरते पेट्रोल के दाम : एक पैसा कम, एक रुपया ज्यादा

उठते-िगरते पेट्रोल के दाम : एक पैसा कम, एक रुपया ज्यादा

शेक्सपीयर के एक नाटक में सूदखोर महाजन की रकम समय पर अदा नहीं की जा सकी तो उसने अपने अनुबंध के तहत कर्जदार के शरीर से...

Bhaskar News Network | Last Modified - Jun 04, 2018, 05:55 AM IST

उठते-िगरते पेट्रोल के दाम : एक पैसा कम, एक रुपया ज्यादा
शेक्सपीयर के एक नाटक में सूदखोर महाजन की रकम समय पर अदा नहीं की जा सकी तो उसने अपने अनुबंध के तहत कर्जदार के शरीर से एक पाउंड गोश्त काटने की इजाजत चाही। महाजन का नाम शायलॉक था और इस रचना के बाद विश्व के सारे सूदखोर इसी नाम से संबोधित किए जाते हैं। नायक की प्रेमिका वकीले सफाई की तरह प्रस्तुत हुई और उसने कहा कि एक पाउंड मांस िनकालते समय एक बूंद भी रक्त नहीं निकलना चाहिए, क्योंकि अनुबंध में इसका जिक्र नहीं है। एक बंूंद का महत्व भारत के अवाम को इन दिनों मालूम पड़ा जब उदारमना सरकार ने पेट्रोल के दाम एक पैसा कम किए। ये बात अलग है कि बचा हुआ एक पैसा भिखारी भी अस्वीकार कर देगा। पेट्रोल की कीमतों को बाजार के हवाले करने के बाद से इसकी कीमतें उठती-गिरती रहती है बल्कि उठती ज्यादा है और गिरती कम है। अंतरराष्ट्रीय स्थिति इसके लिए जिम्मेदारा है।

‘क्यू वी सेवन’ नामक उपन्यास में एक डॉक्टर एक पत्रकार के खिलाफ एक लाख पाउंड की मानहानि का मुकदमा दायर करता है। पत्रकार ने लिखा था कि हिटलर की जेलों में बंद यहूदियों के अंडकोष यह डॉक्टर निकालता था। इस तरह यहूदी कौम को ही समाप्त करने की योजना थी। साक्ष्य यथेष्ठ नहीं थे परंतु जज ने यह जान लिया था कि इसी डॉक्टर ने वह अमानवीय काम किया है। अत: उसने डॉक्टर के मानहानि के दावे को स्वीकार किया परंतु दंडस्वरूप केवल एक पेन्स देने का फैसला सुनाया, जिसका अर्थ था कि इस डॉक्टर का मान इतना ही लघु है। ‘जॉली एलएलबी 2’ में भी जज कहता है कि मुकदमे की प्रक्रिया में वह जान जाता है कि कौन अपराधी है परंतु यथेष्ट साक्ष्य के अभाव में मुजरिम बच जाता है।

गया वह दौर जब पेट्रोल की कीमतें बढ़ने पर सरकार गिरा दी जाती थी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पेट्रोल के दाम गिरने का कोई लाभ अवाम को नहीं दिया गया। सरकार को उत्सव मनाने के लिए धन चाहिए। याद आते हैं कुमार अंबुज जिन्होंने ‘विध्वंस का उत्सव’ नामक कविता लिखी है। जाने कितनी बूंदें बरसती हैं परंतु विरल कोई एक सीप में गिरकर मोती बनती है। स्मरण आती है इंदौर के सरोजकुमार की कविता ‘कितने टन सोने में कितने वित्तमंत्रियों का गुणा करें/ कि सस्ती हो जाए तुवर की दाल और भरे-पूरे हो जाए जनता के गाल/ कितने यज्ञों, कितने हवन कुंडों में, कितने साधु महात्माओं का गुणा करें/ कि नैतिकता की एक किरण पा सकें और/ सवा सौ करोड़ के इस महान देश के पांच सौ ईमानदार संसद में जा सके/ कितने प्रोफेसरों में कितने विश्वविद्यालयों का भाग दें/ कि तोते ठीक-ठीक चित्रकोटी, दूध रोटी गाएं और भैसें अक्ल में छोटी हो जाएं/ कितने अजानों को, कितनी आरतियों के निकट लाएं कि टोटल कर्फ्यू में नहीं आए/ और नदियों में खून नहीं केवल पानी बह पाए।’

दरअसल, किसी वस्तु या विचार का उपयोग नहीं हो पाना सामान्य बात है। सभी बूंदें तो मोती नहीं बनतीं। सारे प्रयास सफल नहीं होते परंतु प्रयास करते समय प्राप्त आनंद ही हमारी पूंजी है। चंद्रधर शर्मा गुलेरी ने केवल तीन कहानियां लिखीं, जिसमें ‘उसने कहा था’ विश्व साहित्य की अमर रचना है। बिमल राय ने इस कथा से प्रेरित फिल्म भी बनाई थी परंतु युद्ध क्षेत्र उनका मनपसंद क्षेत्र नहीं था। वे अपनी फिल्में नारी के हृदय में शूट करते से जान पड़ते थे। ख्वाजा अहमद अब्बास ने ‘दो बंूद पानी’ नामक फिल्म बनाई थी।

बहरहाल, महाजन व्यवस्था के स्थान पर किसानों को बैंक से कर्ज मिलना प्रारंभ हुआ परंतु निर्मम महाजन व्यवस्था से जूझने वाले लोगों ने इस नई व्यवस्था में आत्महत्या करना प्रारंभ किया। इस विषय पर श्याम बेनेगल ने बोमन ईरानी अभिनीत ‘शाबास अब्बा’ नामक रोचक फिल्म बनाई थी। बैंक द्वारा ऋण पाने वाले समय में ही किसानों ने फसल को खेत में ही सड़ने दिया, क्योंकि बाजार में उन्हें इतना कम दाम मिल रहा था कि फसल कटाई के दाम अधिक लग रहे थे। मौजूदा व्यवस्था हर मोर्चे पर विफल है परंतु विज्ञापन दिए जा रहे हैं। आरटीआई एक्ट के तहत यह पूछा जाना चाहिए कि केंद्रीय व प्रांतीय सरकारों ने कितना धन विज्ञापन पर खर्च किया है।

एक बर्फ से ढंके पहाड़ की तलहटी में अमेरिका ने अपना पेट्रोल सुरक्षित रखा है। जब सभी स्रोत समाप्त हो जाएंगे, तब वह अपने स्टॉक के आधार पर सभी को ब्लैकमेल कर सकेगा। सौर ऊर्जा के क्षेत्र में बहुत काम हो रहा है। इस क्षेत्र में भारत धनवान है। जो लोग एक पैसा कम या एक रुपए ज्यादा की विचार शैली से संचालित है वे सौर ऊर्जा के दोहन का सोच ही नहीं सकते। ऊर्जा क्षेत्र के संकट से अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी ही हमें मुक्त करेगी। गैर-परम्परागत ऊर्जा के स्रोतों का दोहन ही कुंजी है। दुनियाभर के देश इन स्रोतों से किफायती बिजली पैदा करने की प्रयासों में लगे हैं।

जयप्रकाश चौकसे

फिल्म समीक्षक

jpchoukse@dbcorp.in

दैनिक भास्कर पर Hindi News पढ़िए और रखिये अपने आप को अप-टू-डेट | अब पाइए Rani News in Hindi सबसे पहले दैनिक भास्कर पर | Hindi Samachar अपने मोबाइल पर पढ़ने के लिए डाउनलोड करें Hindi News App, या फिर 2G नेटवर्क के लिए हमारा Dainik Bhaskar Lite App.
Web Title: उठते-िगरते पेट्रोल के दाम : एक पैसा कम, एक रुपया ज्यादा
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

More From Rani

    Trending

    Live Hindi News

    0

    कुछ ख़बरें रच देती हैं इतिहास। ऐसी खबरों को सबसे पहले जानने के लिए
    Allow पर क्लिक करें।

    ×