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बढ़ रही है लोगों की निगरानी, चीन में स्थिति भयावह

अगर आप यह सोचते हैं कि आपको कोई देख नहीं रहा है और आप बिना किसी की नजर से बचे कहीं भी जा सकते हैं, कितना भी खर्च कर सकते...

Bhaskar News Network | Last Modified - Jun 08, 2018, 06:00 AM IST

अगर आप यह सोचते हैं कि आपको कोई देख नहीं रहा है और आप बिना किसी की नजर से बचे कहीं भी जा सकते हैं, कितना भी खर्च कर सकते हैं, तो यह विचार बदल डालिए। ऐसी कोई जगह नहीं बची है, जहां से किसी की निगरानी नहीं की जा रही है। ऐसा कोई उपकरण नहीं बचा, जिसका डेटा संग्रह न हो रहा हो। बाजार में सीसीटीवी कैमरे निगरानी कर रहे हैं, चेहरे रिकॉर्ड कर रहे हैं। वाहन की नंबर प्लेट की कैप्चरिंग से आपकी यात्रा की निगरानी हो रही है। स्मार्टफोन जो आपकी जेब में है, वह आपकी हर जानकारी किसी तक पहुंचा रहा है। निष्कर्ष यह है कि लोगों की जिंदगी के मिनट-दर-मिनट की रिकॉर्डिंग की जा रही है, डेटा एकत्र किया जा रहा है।

ऐसा कई देशों में जारी है, लेकिन चीन में डिजिटल मॉनिटरिंग की स्थिति भयावह है यानी एक तरह की ‘डिजिटल पुलिस’, जो हर जगह निगाह रखती है। वहां के शिनजियांग क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का जाल बिछाया गया है। उसके जरिये वहां लाखों उइगरों, तुर्क भाषा बोलने वाले मुस्लिम अल्पसंख्यकों की गति‌विधियों पर नजर रखी जा रही है यानी टोटल कंट्रोल। पश्चिमी देशों में इस प्रोद्योगिकी का इस्तेमाल भयावह अपराध पर नियंत्रण करने, उसे सुलझाने और आतंकी हमले रोकने में किया जाता है। इसके परिणाम प्रभावी हैं, लेकिन डराने वाले भी हैं। अगर बात स्वतंत्रता और उत्पीड़न की आती है, तो सरकारें ऐसी प्रणाली बनाना चाहती हैं, जिसमें आम लोगों की सहमति हो। परन्तु जब निगरानी की बात आती है तो उन्हें नियंत्रित करने के नियम लागू किए जाते हैं जो सूचनाएं एकत्र करके उनका प्रसार करते हैं। डेटा ज्यादा और उसे एकत्र करना इतना आसान होता है कि उसके संरक्षण की बातें धूमिल हो जाती हैं। डिजिटल क्रांति के बाद निगरानी का काम और दायरा कई गुना बदल गया है। स्मार्टफोन, वेब ब्राउजर और सेंसर बहुत अधिक सूचनाएं हासिल करते हैं, जिसे कोई सरकार हैक भी कर सकती है और संग्रहित भी कर सकती है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस उसमें महीन जानकारी खोजने में मदद करती है।

शिनजियांग में जो हो रहा है, वह भयावह है और वह टेक्नोलॉजी ने संभव किया है। विद्रोह और अलगाववाद भड़कने के डर से चीनी शासकों ने ऐसी तकनीक का इस्तेमाल लोगों पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए किया। वहां प्रत्येक 100-200 मीटर की दूरी पर सीसीटीवी कैमरे के पोल हैं। कैमरे प्रत्येक वाहन चालक के चेहरे और नंबर प्लेट की रिकॉर्डिंग करते हैं। उइगर के पास जो स्मार्टफोन होते हैं, उनमें सरकार का जासूसी सॉफ्टवेयर होता है। उनके पहचान-पत्र में शामिल डेटा में नाम, महिला-पुरुष या पेशा ही नहीं होता, बल्कि रिश्तेदारों की जानकारी, फिंगर प्रिंट, ब्लड ग्रुप, डीएनए की सूचना, हिरासत में लिए जाने का रिकॉर्ड आदि होता है। ये सारी जानकारियां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से संचालित होने वाले इंटीग्रेटेड जॉइन्ट ऑपरेशन्स प्लेटफॉर्म (आईजेओपी) पर होती हंै। यह सिस्टम ऐसे संदिग्धों की सूची जारी कर सकता है, जिन्हें हिरासत में लेना जरूरी हो। शिनजियांग की निगरानी पद्धति को चीन के किसी भी दूसरे हिस्से में अपनाया जाना जटिल हो सकता है। यह भी कहा जा सकता है कि निगरानी का चीनी मॉडल अन्य निरंकुश सरकारों को प्रेरित कर सकता है। उदारवादी सरकारें हमेशा ऐसे उत्पीड़न को उजागर करना अपना दायित्व समझती हैं। ऐसा भी नहीं है कि पश्चिम में ऐसा नहीं होता। वहां कई देशों की खुफिया एजेंसियां लोगों का डेटा हासिल करना चाहती हैं। कुछ देशों में तो नंबर प्लेट से ही किसी व्यक्ति पर वर्षों तक निगरानी की जा सकती है। अमेरिका के कुछ शहरों में आईजेओपी सिस्टम लागू है, जिसमें किसी व्यक्ति के पुराने अपराध के रिकॉर्ड का विश्लेषण करके भविष्य में होने वाली घटनाओं का आकलन किया जाता है। इस तरह के उपकरणों के दुरुपयोग की संभावनाएं भी कम नहीं हंै।

अमेरिका में ही ऐसे हजारों पुलिस अधिकारियों के नाम हैं, जो गोपनीय एवं विश्वसनीय डेटा का इस्तेमाल पत्रकारों व अन्य नागरिकों पर झूठे आरोप लगाकर कर चुके हैं, इसमें उनकी पूर्व प्रेमिकाओं एवं अन्य की जानकारियों को आधार बनाया गया था। किसी की जांच हुई, किसी को छोड़ दिया गया। यह डेटा बैंक के दुरुपयोग का सिर्फ एक उदाहरण है।

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प्राइवेसी...चीन ने अल्पसंख्यकों की हर गतिवधि पर नजर रखने के लिए सबसे सख्त निगरानी प्रणाली तैयार की है। पश्चिमी देश उसके तौर-तरीकों का विश्लेषण कर रहे हैं।

वर्ष 2006 में यूरोपीय संघ ने एक नियम तैयार किया था जिसमें मोबाइल फोन निर्माता कंपनी यूज़र का डेटा दो साल तक ही रख सकती थी। वर्ष 2014 में यूरोपीयन कोर्ट ऑफ जस्टिस ने वह नियम खत्म कर दिया। साथ ही यह नियम दिया कि अगर किसी ने पुलिस डेटा का गलत इस्तेमाल किया तो उसे अपराध माना जाएगा और उस व्यक्ति को सजा दी जाएगी।

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