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श्रद्धा नहीं होगी तो संदेहमुक्त नहीं हो सकेंगे

आज के दौर में बहुत प्रवचन होते हैं, लोग अच्छी-अच्छी पुस्तकें पढ़ते हैं, लगातार सेमिनार-वर्कशॉप होते हैं। कुल...

Danik Bhaskar | May 03, 2018, 06:00 AM IST
आज के दौर में बहुत प्रवचन होते हैं, लोग अच्छी-अच्छी पुस्तकें पढ़ते हैं, लगातार सेमिनार-वर्कशॉप होते हैं। कुल मिलाकर मनुष्य को भीतर से संवारने के लिए मानव संसाधन के बहुत काम हो रहे हैं। लेकिन, इन सबके बावजूद ज्यादातर लोग परेशान, बेचैन और हैरान हैं। अब इन तीनों को समझिए। आदमी बाहरी स्थितियों से परेशान होता है। जैसे बहुत गरमी पड़ रही हो, पसीना बह रहा हो तो आप परेशान होने लगते हैं। दूसरा है बेचैन होना। यहां भीतरी रासायनिक परिवर्तन शुरू होते हैं। आपको भीतर से कोई कहता है ये न करो, वो न करो तो एक अजीब-सी हलचल शुरू हो जाती है। इन दोनों के कारण फिर व्यक्तित्व में हैरानी उतरती है और ये तीनों मिलकर अशांति को जन्म देते हैं। तो कथा-प्रवचन, अच्छी पुस्तकें पढ़ने का इतना सब माहौल होने के बाद भी लोग बेचैन, परेशान, हैरान क्यों हैं? ऐसा दो कारणों से होता है- एक तो वे गंभीर नहीं हैं और दूसरा उनकी श्रद्धा में कमी है। जब गंभीर नहीं होते तो चीजों को सतही रूप में लेते हैं और जब आप में श्रद्धा नहीं होती तो संदेहमुक्त नहीं हो पाते। इसलिए सबसे पहले विश्वास बनाइए और यह हमारे भीतर ही होता है। हम इस बात पर तो विश्वास रखते हैं कि धन होगा तो सुख मिलेगा, पढ़-लिख लेंगे, परिश्रम करेंगे तो सफलता मिलेगी परंतु गंभीरता से इस बात पर भरोसा नहीं रखते कि महापुरुषों ने जो वचन कहे हैं, जो अच्छे ग्रंथ लिखे हैं उनसे भी जीवन बदल सकता है। इसलिए दो काम जरूर कीजिए- गंभीर हो जाएं और श्रद्धा रखें।



पं. िवजयशंकर मेहता

humarehanuman@gmail.com