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जासूस भी निभाते हैं शांति दूत की भूमिका

प्राय: कहा जाता है कि चोरों में भी आपसी सम्मान होता है लेकिन, क्या जासूसों में भी ऐसा होता है? जो गोपनीय रूप से युद्ध...

Dainik Bhaskar

May 29, 2018, 06:05 AM IST
जासूस भी निभाते हैं शांति दूत की भूमिका
प्राय: कहा जाता है कि चोरों में भी आपसी सम्मान होता है लेकिन, क्या जासूसों में भी ऐसा होता है? जो गोपनीय रूप से युद्ध लड़ने के लिए छल-कपट, झूठ यहां तक कि हिंसा और अपनी हर बात को नकारने की कला में ही ढले हुए होते हैं। ऐसा संभव भी है? जासूसी का इतिहास ऐसी कहानियों से भरा है। शुत्र मिलते हैं, बात करते हैं, उनमें आपसी सम्मान पैदा होता है और कभी-कभी वे व्यक्तिगत लगाव का प्रदर्शन भी करते हैं।

हम इस क्षेत्र की पड़ताल इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि भारत-पाक मीडिया दोनों देशों के पूर्व खुफिया प्रमुखों रॉ प्रमुख एएस दुलत और आईएसआई बॉस असद दुर्रानी द्वारा सराहनीय संयुक्त प्रयास में लिखी किताब की चर्चा है। जो अलग-अलग समय में अपने देशों में खुफिया प्रमुख थे। यह ज्ञात है कि दोनों देशों के खुफिया प्रमुख (या राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जो पूर्व खुफिया प्रमुख होते हैं) दूर के स्थानों पर मिलते रहते हैं। इस किताब ‘द स्पाय क्रॉनिकल्स’ में दिल को छू लेने वाली कहानी है कि कैसे रॉ ने असद दुर्रानी के बेटे की मदद की जब उसे मुंबई एयरपोर्ट पर वीज़ा उल्लंघन के आरोप में पुलिस ने पकड़ लिया। रॉ ने यह भी पता नहीं चलने दिया कि वह पूर्व आईएसआई प्रमुख का बेटा है। दुर्रानी बहुत पहले रिटायर हो चुके थे पर उनके प्रति दुलत में ‘स‌द्‌भाव’ था, जिन्होंने रॉ के तत्कालीन प्रमुख राजिंदर खन्ना से बात की।

राजीव गांधी युग के रॉ डायरेक्टर आनंद वर्मा ने अपने निधन से कुछ वक्त पहले उनके वक्त के कुख्यात आईएसआई प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल हामिद गुल से गुप्त चर्चा की बात कहकर चौंका दिया था। यह ज्यादातर विदेश में हुई और बाद में कोर्ड वर्ड और संकेतों से सार्वजनिक फोन लाइन पर भी हुई। वर्मा के मुताबिक वे सियाचिन विवाद सुलझाने और कश्मीर में तनाव घटाने के समीप पहुंच गए थे। भरोसा कायम करने के लिए गुल ने 1984 के ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार के बाद बगावत करके पाकिस्तान गए सिख यूनिट के चार सैनिक भी सौंपे थे।

उन्होंने लिखा, सुलह की बातचीत पाकिस्तान ने शुरू की थी, जिसे राजीव गांधी व जनरल जिया-उल-हक का वरदहस्त था। पहली बैठक के लिए राजीव ने जॉर्डन के युवराज प्रिंस हसन से मदद चाही थी। वे राजीव के व्यक्तिगत मित्र थे। हसन का पाकिस्तान में भी मान था (उनकी प|ी पाकिस्तानी मूल की थी)। यह पहल जिया की हत्या के साथ खत्म हो गई। वर्मा ने संदेह जताया था कि हत्या में उनकी सेना के कमांडरों का हाथ हो सकता है, जो शांति की इस पहल से नाराज थे। बहुत बाद में गुल आईएसआई छोड़कर जेहादी हो गए। आगे जाकर दूसरे छोर पर एक ही सिविल अधिकारी पूर्व विदेश सचिव नियाज नाईक (दिल्ली में पाक उच्चायुक्त रहे) भी रहस्यमय परिस्थितियों में मृत पाए गए थे। वर्मा की बात को मैं इसलिए सच मानता हूं कि मैं भी ऐसी ट्रैक-2 बैठकों की शृंखला में शामिल रहा हूं। इसमें एक जिसे बलुसा ग्रुप कहा गया, युवराज हसन ने अम्मान में आयोजित की थी।। मेरी मौजूदगी वाली ऐसी ही ट्रैक-2 कवायद में दोनों देशों के पूर्व सेना प्रमुख जनरल सुंदरजी और जहांगीर करामात, जसवंत सिंह (बाद में वाजपेयी के केबिनेट मंत्री), इंडियन स्टेटेजिक थॉट के संस्थापक के. सुब्रह्मण्यम और भारत की श्रेष्ठतम रणनीतिक प्रतिभा सी. राजा मोहन शामिल थे। ग्रुप के सर्वाधिक गंभीर सदस्यों में रिटायर्ड मेजर जनरल मेहमूद दुर्रानी (असद से कोई संबंध नहीं) भी थे। अब तक के सबसे समझदार, शांतिप्रिय और सैनिक जैसे पाकिस्तानी जनरल। पाकिस्तानी टिप्पणीकार उन्हें व्यंग्य से ‘जनरल शांति’ कहते थे। 2008 में पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहते उन्होंने साहस दिखाते हुए माना था कि कसाब पाकिस्तानी था। उन्हें जॉब गंवाना पड़ा।

बेशक वे पाकिस्तानी देशभक्त और कठोर सैनिक थे। सियालकोट सेक्टर की रक्षा के लिए उन्होंने युवा टैंक कमांडर के रूप में भारत से लड़ाई लड़ी खासतौर पर फिलोरा और चाविंदा की भीषण लड़ाई। इटली की लेक बेलैजियो में हुई एक बलुसा मिटिंग में शाम को लंबी सैर के दौरान उन्होंने हमें 1965 की कहानी बताई थी। उन्होंने बताया कि यह बेकार का संघर्ष था, क्योंकि दोनों तरफ के जनरलों में रणनीतिक सूझबूझ या पहल की कमी थी। एकमात्र साहसी और बुद्धिमानीभरी रणनीतिक पहल आपकी ओर से लेफ्टिनेंट जनरल एबी तारापोर ने की थी, लेकिन वे गोलाबारी में शहीद हुए। उस युद्ध के दो परम वीर चक्रों में से एक से उन्हें सम्मानित किया गया था। मेहमूद दुर्रानी को उनका पार्थिव शरीर मिला था और उन्होंने साथी योद्धा के रूप में उसे पूरा सम्मान दिया।

तब 1987-88 में भारत के दो बार बहुत ‘नज़दीकी-चीज’ से बचने की बात होती थी। पहला था 1987 के युद्धाभ्यास ब्रासटैक्स के दौरान युद्ध और दूसरी थी 1988 में शांति। यह सबको पता है कि सियाचिन पर समझौता लगभग हो गया था, परदे के पीछे खुफिया संपर्कों के जरिये। इसी के बाद मूड युद्ध से शांति और फिर यथास्थिति में बदल गया। मैं वर्मा के सुझाव से सहमत हूं कि जनरलों व खुफिया एजेंसी के लोगों ने जिया को नरम पड़ते देख उनसे पिंड छुड़ा लिया। लेकिन, यह भी मानता हूं कि गुल के उस साजिश का हिस्सा होने की अधिक संभावना है। उनके आईएसआई प्रमुख रहते राष्ट्रपति व सैन्य तानाशाह की हत्या हुई थी पर वे उसके बाद भी सालभर बने रहे। बेनजीर भुट्‌टों ने उन्हें बर्खास्त नहीं किया, हटाया। मुल्तान में कोर कमांडर बनाकर।

पुनश्च : मैं पहली बार लेफ्टिनेंट जनरल असद दुर्रानी से ट्रैक-2 जैसी भारत-पाक कॉन्फ्रेंस में मालदीव के कुरुंबा विलैज रिज़ार्ट (माले के पास) में मिला था। यह लंदन के इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ने आयोजित की थी। यह 1998 की ठंड थी। लग रहा था कि अटल बिहारी वाजपेयी और नवाज शरीफ के मातहत कुछ शांति लौट रही है। दुर्रानी ने ऊंची आवाज में पूछा कि भारतीय पक्ष से बड़ी-बड़ी बातें नाटकीय ढंग से गायब क्यों हो गई। मैंने कहा, क्योंकि कश्मीर में जमीन पर लगभग पूरी तरह सामान्य स्थिति लौट गई है। जनरल ने मुझे ज़िंदगी जासूसी में गुजारने वाली कड़ी निगाहों से देखा और कहा, ‘जमीन पर वह स्थिति तत्काल बदल सकती है।’ यही हुआ जब पाकिस्तान ने करगिल में पहली घुसपैठ की। छह माह बाद और ठीक 19 साल पहले दोनों सेनाएं लड़ रही थीं। तब दुर्रानी पांच साल पहले रिटायर हो चुके थे। लेकिन, एक बार आईएसआई बॉस रहने पर आपको सबकुछ पता रहता है। (ये लेखक के अपने विचार हैं।)



शेखर गुप्ता

एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’

Twitter@ShekharGupta

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