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एक रुपया व एक ईंट देने वाली परंपरा वाले शहर में परिवारों की भूमिका आज भी बेमिसाल

पाली | फेसबुक और व्हाट्सएप के दौर में एकल परिवारों के बढ़ते चलन ने पारिवारिक मूल्यों को प्रभावित किया है। अतीत में...

Danik Bhaskar | May 13, 2018, 06:15 AM IST
पाली | फेसबुक और व्हाट्सएप के दौर में एकल परिवारों के बढ़ते चलन ने पारिवारिक मूल्यों को प्रभावित किया है। अतीत में यहां आने वाले हर आगंतुक को एक रुपया और एक ईंट भेंट करने की परंपरा से जुड़ा रहा यह शहर आज भी परिवार के मामले में बहुत संतुलित है। संस्कार, त्याग और समर्पण की सीख के चलते संयुक्त परिवारों का चलन भी यहां बहुत है। परिवार दिवस की पूर्व संध्या पर भास्कर ने कुछ परिवार के सदस्यों से बातचीत की।

बुजुर्गों की मेहनत व संघर्ष से सीख ले रही नई पीढी

परिवार में साथ-साथ रहने से बुजुर्गों की मेहनत और संघर्ष से मिले अनुभवों का लाभ बच्चों को मिलता है। 78 वर्षीय डॉ हस्तीमल शर्मा अपने पुत्र राजेश, कमलेश और उमेश के साथ रह रहे हैं। परिवार की बसंती देवी बताती है कि साथ रहते हुए भी सभी की निजी स्वतंत्रता को महत्व देना भी जरूरी है। परिवार एक सुरक्षा कवच का कार्य करता है। देवरानी जेठानी के बीच बहनों जैसे स्नेह और बहुओं से मां पिता तुल्य सम्मान से परिवार को नई ऊर्जा मिलती है। पोते-पोतियों द्वारा चाचा-ताऊ से लेकर दादा-दादी के चेहरों पर मुस्कान का ध्यान रखा जाता है। जब पोता पूछता है चलाे डॉक्टर के पास नहीं तो मुस्कुराओ तो परिवार का आनंद दुगना हो जाता है।

कान के कच्चे न रहने की सीख से चलते हैं परिवार

बोहरों की ढाल के नरसिंहदास अग्रवाल परिवार की हंसी खुशी के लिए कान के कच्चे नहीं करने की पिताजी की सीख को मूल मंत्र मानते हैं। वे कहते हैं कि सोच में त्याग का भाव जरूरी है। पारिवारिक दायित्वों और प्रतिष्ठा के अनुसार सभी मिलकर कार्य करते हैं। भाई पुरुषोत्तम 70 बताते हैं कि यह परिवार में साथ-साथ रहने के ही संस्कार है कि कठिन से कठिन समय में भी निर्णय चुटकियों में ले लिए जाते हैं। एक-दूसरे से भरपूर सहयोग व समर्थन के चलते वैचारिक स्वतंत्रता भी परिवार से मिलती है।

संयम और संतुलन से चलता है परिवार

पिताजी रामेश्वर प्रसाद गोयल द्वारा लिए गए परिवार निर्णय के बाद कोई किंतु परंतु नहीं रह जाता। पुत्र कमल बताते हैं कि कैलाश, गोपाल व अनिल सहित पूरे परिवार का व्यापार साथ ही चलता है। आपसी अहम को त्याग कर पूरा संयम और थोड़ा संतुलन की सीख से परिवार का सुख बढ़ जाता है। एक दूसरे के दुख दर्द बांटने में परिवार की बहुत बड़ी भूमिका रहती है। व्यापार में भी साथ मिलता है। एक बार फ्रैक्चर के चलते तकरीबन एक साल तक आराम पर रहा। ऐसे में परिवार ने व्यापार को संभाला। कोई भी नया निर्णय सभी मिल बैठ कर करते हैं। फिर पिताजी की मोहर लगती है।

चार पीढ़ियों का साथ बैठना एक रोमांच

चार पीढियों का एक साथ बैठ कर भोजन करना अपने आप में रोमांचित कर देता है। 88 वर्षीय रतनलाल जैथलिया बताते हैं कि बीते दौर के संस्कारों के चलते घर के बुजुर्गों के सामने अपने ही बेटे को गोद नहीं ले पाते थे। अब पड़पौत्र सुयश को गोद लेकर वो खुशी महसूस करता हूं। पुत्र प्रमोद बताते हैं कि सुबह की चाय और भोजन सभी परिवारजन साथ बैठ कर करते हैं। रिश्ते के जुड़ाव को समझने और समझाने में परिवार की बड़ी भूमिका है। जब भी सुयश अपने पड़दादा और पड़दादी के साथ बाहर जाता है तो लोगों को नानी और नाना कह कर पुकारता है। रिश्तों की भाषा में बात करने की कोशिश करता है।