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लंदन की खुशफहमी के बाद कुछ सवाल

यदि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राजनेता नहीं होते तो वे फील गुड गुरु हो सकते थे। लगातार सकारात्मक ऊर्जा प्रसारित...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 27, 2018, 06:20 AM IST

लंदन की खुशफहमी के बाद कुछ सवाल
यदि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राजनेता नहीं होते तो वे फील गुड गुरु हो सकते थे। लगातार सकारात्मक ऊर्जा प्रसारित करनी की क्षमता मोदी की विशेषता है। पिछले हफ्ते लंदन में जब प्रधानमंत्री ‘भारत की बात’ को विश्व मंच पर ले गए, तो एक बार फिर वे मंजे हुए परफॉर्मर दिखाई दिए। वेस्टमिंस्टर हॉल के पास मुट्‌ठीभर प्रदर्शनकारी मोदी विरोधी नारे लगा रहे थे। भीतर भारतवंशी श्रोता उनकी एक पंक्ति की चुटकियों पर मुग्ध हुए जा रहे थे। कवि-विज्ञापनकर्ता प्रसून जोशी को साथ लेकर ढाई घंटे तक मोदी ने हमें यह दिखाया कि क्यों वे इतने अच्छे राजनीतिक वक्ता हैं। हताशा के समय में भी उनके हाव-भाव में खुद को लेकर संदेह या चिंता का लेश मात्र भी नहीं था।

तब तक प्रधानमंत्री के लिए अप्रैल का महीना कोई अच्छा नहीं रहा था। भारत में तो सुबह के अखबारों में एटीएम मशीन खाली होने की सुर्खियां थीं और नोटबंदी के मंडरा रहे असर को लेकर प्रश्न फिर हवा में थे। इसके पिछले हफ्ते कठुआ में आठ साल की बच्ची पर यौन हमले और उसकी हत्या के आरोपियों को बचाने का भयानक प्रयास और उन्नाव में कथित दुष्कर्म पीड़ित की पुलिस हिरासत में मौत से देशभर में गुस्सा था। दोनों मामलों में सत्तारूढ़ भाजपा विधायकों की भूमिका संदेह में थी। माह की शुरुआत में दलितों के बंद में हिंसा के दौरान 11 मौतें हुईं। भाजपा के ही कुछ दलित सांसदों ने सार्वजनिक रूप से पार्टी के रुख का विरोध किया, जो उनके मुताबिक दलित विरोधी था। सीबीएसई के पेपर लीक पर छात्रों के विरोध प्रदर्शन से लेकर आंध्र में विपक्ष का विरोध प्रदर्शन, तमिलनाडु व महाराष्ट्र में किसानों के प्रदर्शन तक सरकार चारों तरफ से घिरी थी।

फिर भी लंदन की आयकॉनिक इमारत के भव्य वातावरण में गलियों पर उमड़ता यह गुस्सा मीडिया द्वारा पैदा कोई भ्रम लग रहा था। भिंड की रक्तरंजित गलियां, सूखा कावेरी डेल्टा, कठुआ का दूरदराज का गांव और उत्तर प्रदेश का धूलभरा कस्बा सब बहुत दूर प्रतीत हो रहे थे। इससे मैं मूल प्रश्न पर आता हूं : क्या प्रधानमंत्री इनकार में जी रहे हैं या खबरों की दुनिया के हम लोगों ने स्थायी अंधकार के क्षेत्र में बसने का चुुनाव किया है? लोगों के साथ अपने संवाद में प्रधानमंत्री ने दावा किया कि ‘सकारात्मकता’ उनके जीवन का मंत्र है : ‘मेरे लिए गिलास हमेशा आधा भरा हुआ है। आपको हमेशा ऐसे लोग मिलेंगे, जो कहेंगे कि गिलास आधा भरा है, कुछ कहेंगे कि यह आधा खाली है। मैं कहता हू यह आधा भरा है और शेष हवा से भरा है’। हॉल तालियों से गूंज उठा। लंदन के एम्फीथिएटर की चमचमाती रोशनी के कुछ घंटों के दौरान ऐसा लगा कि प्रधानमंत्री जानबूझकर ‘अच्छे दिन’ की भावना जागृत कर रहे हैं, जिसने उन्हें 2014 में सत्ता दी थी। इस तरह 2018 की िनराशा को उन्होंने अस्थायी बना दिया। ऐसा लगा जैसे भारत बंद के दौरान दलित गुस्सा, कठुआ व उन्नाव पर विरोध, किसानों का मार्च, कावेरी विरोध, न्यायपालिका में ‘विद्रोह,’ करोड़ों के बैंक घोटाले, सीबीएसई परीक्षा विवाद ये सब अपवाद थे। लाखों बगावतों की जमीन पर प्रधानमंत्री अरबों हसरतों को छू रहे थे। ‘महत्वाकांक्षी’ भारत बनाम ‘विद्रोही’ भारत के बीच लड़ाई में जैसा कि प्राय: होता है सत्य कहीं बीच में है। 2014 में प्रधानमंत्री बदलाव के ऊर्जावान वाहक के रूप में लगातार फोकस रख सकते थे, क्योंकि वे लुटियन्स के यथास्थितिवाद को ध्वस्त करने की चुनौती दे रहे थे। वे उस समय सत्ता प्रतिष्ठान विरोधी की भूमिका में फिट थे, क्योंकि देश उस पुरानी सत्ता से ऊब गया था, जिसने बढ़ते भ्रष्टाचार, धीमी आर्थिक वृद्धि और ऊंची महंगाई दर के साथ पिछले पांच साल शासन किया था। लेकिन, 2018 में मोदी इतनी आसानी से मामूली ‘चाय वाले’ या निर्लिप्त ‘फकीर’ का अवतार ग्रहण नहीं कर सकते, क्योंकि अब वे सत्ता व अधिकार का लुत्फ ले रहे थे। ‘आउटसाइडर’ अब 7 लोक कल्याण मार्ग का गौरवान्वित रहवासी है। यहां तक कि उनकी स्टाइल भी शाही अंदाज दिखाती है।

ऐसी बात नहीं है कि ऊपर बताए अंधकार के क्षेत्र किसी सनकी पत्रकार की कल्पना की उपज हैं। जब इन सब बातों को एकसाथ लिया जाता है तो देश जिस गहरे नैतिक और सांस्थानिक संकट का सामना कर रहा है, उसे यह आईना दिखाता है। बार-बार लोगों का गुस्सा उबलना, जैसा प्रधानमंत्री कहते हैं वैसी ‘अधीरता’ की अभिव्यक्ति नहीं है। इसके पीछे अधिक गहरा नैतिक रिक्त स्थान और सांस्थानिक गिरावट है जो आमतौर पर होने वाली बदलाव की पुकार से आगे जाती है। सच तो यह है कि समाजगत ऐसी दरारें हैं, जिनसे तत्काल निपटने की जरूरत है। ‘न्यू इंडिया’ जैसे आकर्षक नारों से नहीं, बल्कि उस व्यवस्था में कुछ हद तक भरोसा व आत्मविश्वास बहाल करके, जो संवैधानिक नैतिकता व न्याय की इच्छा से असंबद्ध दिखाई देती है।

कठुअा में खौफनाक अपराध पर स्थानीय दलों में हुए ध्रुवीकरण को क्या कहेंगे, जिसमें शर्मनाक बहुसंख्यक कट्‌टरता झलकी? क्यों अनजान किसानों को अपने बात कहने के लिए बार-बार सड़कों पर उतरना पड़ता है? दलित गुस्सा किसी सुप्त ज्वालामूखी जैसा क्यों है, जो फटने का इंतजार कर रहा है? ऐसा क्यों हैं कि बड़ा भ्रष्टाचार करके भी अत्यधिक धनी तो बच निकलते हैं और अनाम वेतनभोगी भारतीय बैंक की कतार में अपनी बारी का इंतजार करता रह जाता है? क्यों एक टेक्नोलॉजी की दृष्टि से प्रगत राष्ट्र बेदाग परीक्षा नहीं करा पाता? क्यों न्यायपालिका खुलेआम विभाजित नज़र आती है?

ये असुविधाजनक प्रश्न पूछना निश्चित ही जायज कवायद है, जिसे हल्के में खारिज नहीं किया जा सकता। लेकिन, प्रधानमंत्री यही करते नज़र आए जब उन्होंने कहा, ‘मैं आलोचना को अपने तरीके से लेता हूं, क्योंकि लोगों को आलोचना करने के लिए कोई चाहिए होता है, ऐसा कोई जिस पर ‘तंज’ मारे जाएं।’ हर बगावत आपकी तरफ उछाला गया ‘तंज नहीं होता बल्कि प्राय: यह अंतरात्मा को जगाने का आह्वान होता है, जिसकी बहुत जरूरत होती है। क्योंकि आधा भरा गिलास खेदजनक रूप से आधा खाली भी होता है।

पुनश्च : जब भक्ति दिखाते श्रोता वेस्टमिंस्टर हॉल से बाहर आए तो जेवरों से लदी एक महिला कैमरे से मुखातिब हुई, ‘मोदी इतने प्रेरक हैं कि वे हम सबको अहसास करा देते हैं कि हमें भारत लौट जाना चाहिए।’ उसे चमचमाती बीएमडब्ल्यू कार में जाते देखकर मैं निश्चित नहीं था कि वह लौटना चाहेगी।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

राजदीप सरदेसाई वरिष्ठ पत्रकार

rajdeepsardesai52@gmail.com

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Web Title: लंदन की खुशफहमी के बाद कुछ सवाल
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