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‘संजू’ और ‘वीरे दी वेडिंग’ का दर्शकों को इंतजार

इस समय छोटे परदे पर और विविध माध्यमों में आने वाले दो फिल्मों की झलकियां अत्यंत लोकप्रिय हो रही हैं। ये फिल्में...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 28, 2018, 06:20 AM IST

‘संजू’ और ‘वीरे दी वेडिंग’ का दर्शकों को इंतजार
इस समय छोटे परदे पर और विविध माध्यमों में आने वाले दो फिल्मों की झलकियां अत्यंत लोकप्रिय हो रही हैं। ये फिल्में हैं ‘संजू’ और ‘वीरे दी वेडिंग’। दोनों फिल्मों के कथानक जुदा हैं, प्रस्तुतीकरण जुदा है और समान बात केवल यह है कि युवा वर्ग अब दोनों फिल्मों का बेसब्री से इंतजार कर रहा है। राजकुमार हीरानी की रणवीर कपूर अभिनीत ‘संजू’ संजय दत्त का बायोपिक है। राजकुमार हीरानी ‘मुन्नाभाई एम.बी.बी.एस.’, ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ और ‘पी.के.’ में संजय दत्त के साथ काम कर चुके हैं। मुन्नाभाई शृंखला में संजय दत्त नायक थे परंतु पी.के. में एक चरित्र अभिनेता थे। इन फिल्मों के निर्माण के दरमियान उन्होंने बहुत समय साथ गुजारा है। संजय दत्त ने उन्हें अपने जीवन की अनेक घटनाएं सुनाईं और इन्हीं को आधार मानकर राजकुमार हीरानी ने यह बायोपिक रची है। प्राय: मनुष्य अपने जीवन की घटनाओं को अपने विश्वास और पूर्वग्रह के नज़रिये से देखता है। मनुष्य इतना कायर है कि नितांत गोपनीय क्षणों में जब वह खुद से मुखातिब है तब भी असली तथ्य से दूर ही रहता है।

‘वीरे दी वेडिंग’ में करीना कपूर, सोनम कपूर और स्वरा भास्कर के साथ एक अन्य कन्या भी है। ये चार सहेलियों की कथा है। इस ट्रेलर में एक संवाद का आशय यह है कि उस महिला को अपने पति के साथ अंतरंगता का एक क्षण भी नसीब नहीं हुआ विगत एक वर्ष में। हमारे देश में कभी इस तरह की जांच-पड़ताल नहीं हुई कि जैसे अमेरिका में ‘किन्से रिपोर्ट’ जारी की गई थी। शयन-कक्ष के कब्रगाह में हजारों ख्वाहिशें दफ्न रहती हैं।

ऋषि वात्स्यायन की ‘काम-सूत्र’ अछूते विषय पर विश्व की पहली पुस्तक है परंतु लगभग उसी काल खंड में चीन के विद्वान ताओ ने भी उसी विषय पर अपने नज़रिये से ग्रन्थ लिखा है। अंग्रेज विद्वान रिचर्ड बर्टन ने भारत भ्रमण में वात्स्यायन की पुस्तक के बारे में जानकारी प्राप्त की और 1882 में लंदन में धन एकत्रित किया ताकि वात्स्यायन की किताब का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद किया जा सके। यह अनुवाद किया भी गया है। ताओ की किताब का भी अनुवाद किया गया है। मुगल बादशाह अकबर ने ‘मकतबनामा’ नामक विभाग का गठन किया था, जिसके तहत संस्कृत में रचे गए ग्रन्थों का फारसी भाषा में अनुवाद किया गया। इन फारसी भाषा में रचे गए ग्रंथों का भी अंग्रेजी भाषा में अनुवाद किया गया है। अनुवाद प्रक्रिया में कई बातें गुम भी हो जाती हैं। एक अंग्रेजी फिल्म का नाम ही है ‘लॉस्ट इन ट्रांसलेशन’ जिसका कथानक इस विषय से नहीं जुड़ा है। चौदहवीं सदी में दक्षिण भारत में इस विषय पर एक पुस्तक लिखी गई है। संभवत: उसका नाम था ‘अनंत राग’।

ज्ञान क्षेत्र सीमित है, अज्ञान असीमित है। प्रकाश के घेरे बहुत छोटे हैं, अंधकार की चादर बहुत विशाल है। इस विषय को कचरे की तरह बुहारकर कालीन के नीचे सरका दिया गया है। इस विषय पर वैज्ञानिक ढंग से लिखी किताब पाठ्यक्रम में शामिल कर देने से अनेक लोग कुंठाओं से बच सकते हैं परंतु जिस विषय पर बात ही नहीं की जा सकती, वह पाठ्‌यक्रम में कैसे शामिल हो सकता है? अज्ञान को आनंद की तरह परिभाषित कर दिए जाने के बाद कुछ भी नहीं किया जा सकता। यह परिभाषित आनंद उस परम सुख ‘आॅर्गेज्म’ से अलग है जिसकी बात उस संवाद द्वारा की जा रही है।

पवन करण ने इस विषय पर अनेक कविताएं रची हैं। उनके काव्य संकलन ‘स्त्री मेरे भीतर’ व ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित ‘स्त्रीशतक’ में इस विषय को उठाया गया है। ‘स्त्रीशतक’ की कुछ पंक्तियां - ‘अपनी कथाओं में आखिर, कितनी स्त्रियों का वध करेंगे आप, स्त्रियां जिस दिन खुद को बांचना शुरू कर देंगी, कथाएं बांचना छोड़ देंगी तुम्हारी’।

जयप्रकाश चौकसे

फिल्म समीक्षक

jpchoukse@dbcorp.in

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