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आईपीएल क्रिकेट का तमाशा, अमूल्य पानी बर्बाद बेतहाशा

आमिर खान की आशुतोष गोवारीकर द्वारा लिखित एवं निर्देशित फिल्म ‘लगान’ निहत्थे आम लोगों द्वारा प्रशिक्षित...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 09, 2018, 06:35 AM IST

आमिर खान की आशुतोष गोवारीकर द्वारा लिखित एवं निर्देशित फिल्म ‘लगान’ निहत्थे आम लोगों द्वारा प्रशिक्षित श्रेष्ठिवर्ग पर विजय प्राप्त करने की गाथा है। इसमें विजय का कर्णधार एक दलित दमित जाति का व्यक्ति है, जिसका एक हाथ टेढ़ा है, जो संभवत: किसी रोग का इलाज समय रहते नहीं कराए जाने के कारण हुआ है। इसी हाथ से फेंकी गई गेंद फिरकी लेती है और बल्लेबाज उसे समझ में नहीं पाता। संभवत: गोवारीकर को इस पात्र की प्रेरणा हमारे गेंदबाज चंद्रशेखर से मिली है। ‘लगान’ को मात्र क्रिकेट प्रेरित फिल्म कहना उस मानव शौर्य गाथा का अपमान करना होगा। देव आनंद ने ‘अव्वल नंबर’ नामक क्रिकेट प्रेरित फिल्म बनाई थी, जो असफल रही। वर्तमान में अनुजा चौहान के उपन्यास ‘जोया फैक्टर’ पर फिल्म बनाई जा रही है, जो पत्रकार और क्रिकेट कप्तान की प्रेम कहानी है। इस कथा की सबसे रोचक बात यह है कि टीम को यह अंधविश्वास हो जाता है कि पत्रकार की स्टेडियम में मौजूदगी उनके लिए भाग्यशाली है। क्रिकेट खिलाड़ियों के भी अजीबोगरीब अंधविश्वास होते हैं मसलन कोई खिलाड़ी एक लाल रुमाल गले में बांधे रखता है। बल्लेबाज उन वस्त्रों को बार-बार धारण करता है, जिसे पहन कर किसी मैच में उसने शतक मारा था।

राजकुमार हिरानी की ‘पीके’ में विज्ञान का छात्र अंधविश्वास का शिकार है। इस तरह तो परीक्षा और क्रिकेट में अंतर ही नहीं रह जाता कि पांच प्रश्नों के उत्तर कंठस्थ कर लिए है और वे ही प्रश्न-पत्र में आए। वर्तमान में तो छात्र प्रश्न-पत्र ‘लीक’ होने की उम्मीद करता है। व्यवस्था की छलनी में अनेक सुराग हैं और बजट तक लीक हो सकता है तो परीक्षा-पत्र की क्या बिसात? परीक्षा में लक फैक्टर इस तरह भी इस्तेमाल किया जाता है कि पूरे पाठ्यक्रम की तैयारी है परंतु पांच अध्याय इतनी गहराई से तैयार किए गए हैं कि परीक्षा में उनके पूछे जाने पर बहुत बड़ी सफलता अर्जित हो सकती है। क्रिकेट में बल्लेबाज के कुछ प्रिय स्ट्रोक्स होते हैं। वह अन्य गेंदों से अपना बचाव करता रहे और कमजोर गेंदों पर मनपसंद शॉट्स खेले। एक सफल पारी बड़े व्यवस्थित ढंग से रची जा सकती है। उसकी भी पटकथा होती है। विराट कोहली अपनी हर पारी को बहुमंजिला इमारत की तरह रचते हैं। वे पारी की आधारशिला रखने में समय लेते हैं। बहरहाल, ललित मोदी ने क्रिकेट की लोकप्रियता को भुनाने के लिए आईपीएल नामक तमाशे का आकल्पन किया, जिसमें कुछ कन्याएं चौके लगने पर ठुमका भी लगाती थीं। हर मैच के बाद शानदार दावत होती थी, जिसमें शरीक होने की फीस ली जाती थी। उसने खिलाड़ियों के गिर्द आभामंडल रचा, जिसे महंगे दाम में बेचा भी। आईपीएल खेल मार्केटिंग का मास्टर स्ट्रोक सिद्ध हुआ। उसकी तमन्नाएं इतनी बढ़ी कि उसने मैच फिक्सिंग की और उसी आरोप से बचने के लिए वह फरार हो गया। आज इंग्लैंड में ललित मोदी, माल्या, पंजाब नेशनल बैंक के लुटेरे मोदी एवं चौकसी मिल-बैठकर कोई अंतरराष्ट्रीय तमाशा रच सकते हैं परंतु भारत के अवाम की तरह मासूमियत अन्य देशों में खोजना कठिन हो सकता है। माल्या, चौकसी और नीरव मोदी की टीम फोर्ट नॉक्स को लूटने की योजना बना सकते हैं। ज्ञातव्य है कि फोर्ट नॉक्स वह जगह है, जहां अमेरिका ने अपना सोना रखा है।

बहरहाल, आईपीएल तमाशे के मैच कई शहरों में खेले जाने वाले हैं, जहां पूरे मैदान को हरा-भरा रखा जाने में करोड़ों लीटर पानी महीनों तक खर्च करना पड़ता है। यह भारत महान में ही संभव है कि एक तरफ एक तमाशे के लिए बेहिसाब पानी खर्च किया जाता है तो दूसरी तरफ अनगिनत क्षेत्रों में महिलाएं कोसों दूर से सिर पर बरतन लिए पानी लेने जाती हैं ताकि परिवार प्यास से न मर जाए। याद आती है ख्वाजा अहमद अब्बास की फिल्म ‘दो बूंद पानी।’ पर्यावरण की रक्षा में विफल हम धीरे-धीरे पूरी पृथ्वी को ही मरुस्थल में बदलते जा रहे हैं।

अगर हवाई जहाज से मरुस्थल की तस्वीरें ली जाएं तो ज्ञात होगा कि मरुस्थल में भी हवाएं रेत की लहरें बनाती हैं। रेत का टीला नज़र आता है, जो अगले क्षण ही अदृश्य हो जाता है तथा किसी और स्थान पर बन जाता है। इसी तरह हवाई जहाज से समुद्र के चित्र लें तो आप पाएंगे कि मरुस्थल और समुद्र में बड़ी समानताएं हैं।

महाकाव्यों में महाप्रलय से विनाश के वर्णन हैं परंतु आगामी विनाश धरती के मरुस्थल में बदलने से होगा। ज्ञातव्य है कि विष्णु खरे ने मात्र अठारह की वय में टीएस एलियट की महान रचना ‘वेस्टलैंड’ का हिंदी अनुवाद किया था, जिसकी एक कविता इस तरह है, ‘अप्रैल, मृतभूमि से बकाइन के पुष्पों को उगाने वाला, स्मृति तथा अभिलाषाओं को सम्मिलित करने वाला, शिथिल जड़ों को वासंती जल से उकसाने वाला, क्रूरतम मास है। कौन-सी जड़ हैं जो जकड़ती है, इस पथरीले कूड़े-करकट से, कौन-सी शाखाएं उगती है? मानव पुत्र।’

किसी महान कविता की जुगाली के लिए किसी संदर्भ की आवश्यकता नहीं होती। जीवन बेतरतीब घटनाओं का संकलन है, जिसे डेटलेस डायरी भी कह सकते हैं।

जयप्रकाश चौकसे

फिल्म समीक्षक

jpchoukse@dbcorp.in

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