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भारत-चीन सीमा: तिब्बतियों को मारकर नदी में फेंक रहे हैं चीनी

Dainik Bhaskar

Apr 08, 2018, 07:40 AM IST

चीनी सीमा से | डिफेंस कॉरेस्पोंडेंट डीडी वैष्णव

मैं खड़ा हूं पूर्वी सेक्टर के भारत-चीन सीमा पर। इस सीमा की अंतिम पोस्ट किबिथू। यानी लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल के पास। 1962 के बाद से यहां गोली तो नहीं चली है, लेकिन चीन लगातार मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए हरकतें करता रहता है।

हमें सीमा पर आए कुछ मिनट ही हुए थे कि हमारी निगाह सीमा से सटे एक पत्थर पर पड़ी। उस पर लिखा हुआ था- ‘दिस इज अवर टेरेटरी, गाे अवे’। मैंने इसके बारे में आईटीबीपी के इंस्पेक्टर डी. करुणाकर से पूछा तो उन्होंने बताया कि चीनी सैनिक ऐसा ही करते हैं। बाद में भारतीय सेना के जवान वहां जाकर उस मैसेज को मिटाते हैं और जवाब भी उनके अंदाज में ही देते हैं: ‘नो दिस इज इंडिया यू विड्रॉ’। कई बार दोनों देशों के सैनिकों का आमना-सामना होने पर लाल रंग के बैनर पर ऐसा ही संदेश दिखाते हंै। वे बताते हैं कि चीन यहां पर पेट्रोलिंग ज्यादा नहीं करता है, लेकिन रेडोम, सैटेलाइट से निगरानी रखता है। सिर्फ धौंस दिखाने के लिए अंदर आकर अपना हक जमाने वाले मैसेज लिखता है। सालाना दस बॉर्डर पर्सनल मीटिंग भारत व चीन की सेना के बीच होती है तब ये मुद्दा उठता है। दो माह पहले भी ये मुद्दा उठा था। वहीं दूसरी ओर किबिथू के सामने चीनी सेना के टाटू कैंप में इंफ्रास्ट्रक्चर से लेकर हेलिपेड, एयर स्ट्रीप, बंकर, रोड कनेक्टिविटी व रेल लाइन बढ़ाई जा रही है। मैं यहां पहुंचा तो स्थानीय लोगों ने बताया कि चीनी सैनिक तिब्बत के लोगों पर जुल्म भी खूब करते हैं, उन्हें मारकर नदी में फेंक देते हंै, जो चीन की निगिचू और भारत में आने के बाद लोहित नदी में बहकर आते हैं। 1962 के युद्ध में वेलांग सेक्टर में भारतीय सेना से मुंह की खा चुके चीन की यहां पर गतिविधियां बढ़ी हुई हैं। यहां चीन भारत पर दबाव बनाने के लिए सीमा पर लगातार अपना इंफ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी बढ़ा रहा है। शेष | पेज 2

भारतीय सेना की माउंटेन दाऊ डिवीजन में आने वाले अति संवेदनशील इलाके फिशटेल 1, फिशटेल 2 तथा किबिथू सहित 353 किमी लंबी एलएसी पर कई जगह पर चीनी सैनिक वाटर शेड के पास घुसपैठ कर दस से पन्द्रह मीटर भारतीय क्षेत्र में आते हैं। करुणाकर कहते हैं कि चीनी सैनिक यहां शराब की बोतल, बीयर के कैन, खाने के सामान का कचरा फेंककर उसका फोटो लेकर चले जाते हैं।

पाकिस्तान व बंग्लादेश से सटे बॉर्डर और एलओसी पर नजदीक में पोस्ट होने के कारण सिर्फ आठ-आठ घंटे ही जवान पेट्रोलिंग करते हैं। लेकिन अरूणाचल के इस सेक्टर में 18 पासेज है। यहां पर एक बार लॉन्ग रेंज पेट्रोलिंग शुरू होती है जो एक माह या 35 दिन तक चलती है। संवाददाता ने गश्त करने वाले इन जवानों के साथ जंगलों में दो दिन बिताए। उनकी चुनौतियां व परेशानियां जानी। एलआरपी के लिए एक प्लाटून यानी 30 जवान को लीड करते हुए एक अफसर कैंप से निकलता है। यहां पर किसी भी तरह पगडंडी भी नहीं मिलती है। बर्फ से ढंके पहाड़, जगह-जगह पानी से उफनते नाले, तेज बारिश, घना जंगल, चट्‌टाने खिसकने वाला एरिया, ऊंचे पहाड़ और किसी तरह की कोई मार्किंग नहीं। ऐसे रास्तों पर पैदल चलना मुश्किल है। जवान नालों को रस्सी के सहारे पार करते हैं। उनके साथ एक माह का हल्का राशन भी होता है। गश्त के खतरों के बारे में लेफ्टिनेंट कर्नल पुष्पेंद्रसिंह बताते हंै कि वैली व पासेस इतने खतरनाक हैं कि इमरजेंसी में हेलिकॉप्टर भी नहीं आ सकता है। ऐसे में एलआरपी लॉन्च करने से पहले जवानों को ट्रेनिंग दी जाती है। ईस्टर्न सेक्टर में भारत के आखिरी गांव किबिथू व काहो में स्थानीय ग्रामीणों ने चीन की दादागिरी व तिब्बतियों पर जुल्म ढ़हाने की दास्तां बताई। किबिथू अपर प्राइमरी स्कूल के शिक्षक केवी राय ने बताया कि तिब्बत के इलाकों से शिकारी लोग कई बार हमारे इलाके में शिकार के लिए आ जाते हंै। जब मिलते हैं तो चीन के जुल्म बताते हंै। चीन भारत को डराने के लिए टाटू कैंप व दमई गांव तक पक्के निर्माण, रोड व हेलिपेड का निर्माण कर रहा है। यहां सिर्फ भारत को दिखाने और डराने के लिए अंधाधुंध निर्माण किया जा रहा है। वहीं दूसरी ओर दमई गांव से आगे बिजली व रोड नहीं है। चीनी सेना तिब्बत के लोगों को टारगेट करती है। उनकी बात नहीं मानने पर सूली पर बांधकर लोगों को मार दिया जाता है और इसके बाद उसकी बॉडी को निगिचू नदी में फेंकते हैं, जो हमारे इलाके में लोहित नदी में बहकर आती है। बॉडी सड़ जाती है और उसकी बदबू आती है तब पता चलता है। ऐसा कई बार हो चुका है। इसके डर से शिकारी कई बार यहां भागकर आते हैं, लेकिन वापस भी चले जाते हैं।

चीन की धमकियों व ऐसी हरकत के कारण किबिथू, काहो सहित पांच गांव के लोग चीनी सामान का बहिष्कार करते हैं। किबिथू सरपंच कुंचोक श्रृंग मेयोर बताते है कि गांव चीनी मोबाइल की घुसपैठ है, लेकिन हमारे मोबाइल नेटवर्क नहीं होने के कारण सेना के सैटेलाइट फोन का उपयोग करते हैं। काहो गांव में सिर्फ 11 मकान हैं और इतने ही बच्चे पढ़ने जाते हैं। रोड व मोबाइल की कनेक्टिविटी नहीं होने कारण ये इलाका देश से कटा हुआ है। वहीं दूसरी ओर चीन में डवलेपमेंट दिखता है। एमएलए फंड से विकास कार्य होते हैं वहीं यहां के लोगों के आय का जरिया है।

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