• Hindi News
  • Rajasthan
  • Ratangarh
  • प्रदेश का पहला ऐसा जिला मुख्यालय जहां सीएमएचओ दफ्तर नहीं 77 साल से तहसील मुख्यालय पर चल रहा, आमजन-स
--Advertisement--

प्रदेश का पहला ऐसा जिला मुख्यालय जहां सीएमएचओ दफ्तर नहीं 77 साल से तहसील मुख्यालय पर चल रहा, आमजन-स्टाफ परेशान

प्रदेश में चूरू एकमात्र ऐसा जिला मुख्यालय है, जहां सीएमएचओ दफ्तर नहीं है। 77 साल से रतनगढ़ तहसील मुख्यालय पर ये दफ्तर...

Dainik Bhaskar

Jan 25, 2018, 06:45 AM IST
प्रदेश का पहला ऐसा जिला मुख्यालय जहां सीएमएचओ दफ्तर नहीं 77 साल से तहसील मुख्यालय पर चल रहा, आमजन-स
प्रदेश में चूरू एकमात्र ऐसा जिला मुख्यालय है, जहां सीएमएचओ दफ्तर नहीं है। 77 साल से रतनगढ़ तहसील मुख्यालय पर ये दफ्तर चल रहा है। अब तक 28 सीएमएचओ बदलते रहें, लेकिन दफ्तर जिला मुख्यालय पर नहीं स्थापित हो सका। भास्कर ने रतनगढ़ में सीएमएचओ दफ्तर संचालित होने की वजह से होने वाली परेशानियाें और नुकसान आदि की पड़ताल की तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। सबसे मोटा कारण ये सामने आया कि जिला मुख्यालय पर सीएमएचओ दफ्तर नहीं होने के चलते साल में सवा चार लाख रुपए तो अधिकारी और कर्मचारियों पर आने-जाने में ही खर्च हो जाते हैं। अगर यहीं जिला मुख्यालय पर दफ्तर हो तो यह बजट सीधे-सीधे बच सकता है। तहसील मुख्यालय पर जिला स्तर का ऑफिस चलने की वजह से हर महीने 500 से ज्यादा लोगों को परेशान होना पड़ रहा है। चिकित्सा विभाग की सबसे अहम कड़ी सीएमएचओ दफ्तर होने के चलते विभागीय काम पूरी तरह से प्रभावित हो रहे हैं। रतनगढ़ सीएमएचओ ऑफिस में 36 का स्टाफ है। 1940 से ये दफ्तर रतनगढ़ में संचालित हो रहा है। जनवरी 2017 से दिसंबर 2018 तक नए फूड सेफ्टी लाइसेंस के लिए 202 आवेदन आए। इसी तरह रिन्यूवल के लिए 356, नए रजिस्ट्रेशन के लिए 962 और रिन्यूवल रजिस्ट्रेशन के लिए 179 आवेदन आए हैं।

जिला मुख्यालय की बजाय रतनगढ़ में सीएमएचओ दफ्तर चलने से हर महीने में 500 से ज्यादा लोगों को सीधे तौर पर नुकसान

सीएमएमचो 15 दिन चूरू मीटिंगों में आते हैं, लोगों के समय पर काम नहीं होते हैं, सालाना सवा चार लाख रुपए अतिरिक्त खर्च

सीधे तौर पर सबसे बड़े ये दो नुकसान

1. लाइसेंस : सीएमएचओ जिले का प्राधिकृत खाद्य सुरक्षा अधिकारी होता है। जितने भी व्यापारी खाद्य साम्रग्री का बेचान करते है, उन्हें फूड सेफ्टी लाइसेंस लेना जरूरी होता है। ऐसे में महीने के करीब 500 व्यापारी लाइसेंस से जुड़े काम के लिए रतनगढ़ सीएमएचओ ऑफिस पहुंचते हैं। अधिकतर होता वही है, कि आज सीएमएचओ साहब चूरू गए हुए हैं। कल आना।

2. सर्टिफिकेट : सरकारी नाैकरी में लगने वाले लोगों को स्वास्थ्य प्रमाण पत्र की जरूरत पड़ती है। विभाग के आंकड़ों के अनुसार सालभर में करीब दो हजार लोगों को इस काम के लिए रतनगढ़ जाना पड़ता है। इनमें अधिकतरों को वापस चूरू भी आना पड़ता है, क्योंकि कुछ काम ऐसे होते है तो जिला मुख्यालय पर ही होते हैं।

अस्पताल भवन बना कर देने वाले ट्रस्ट ने रखी थी ये शर्त

खर्चा : चूरू आने-जाने में खर्च हो जाते हैं पांच लाख रुपए

सीएमएचओ के चूरू आने-जाने में खुद पर साल में दो लाख 16 हजार रुपए खर्च होते हैं। स्टाफ पर 90 हजार रुपए खर्च होते हैं। आरसीएचओ दफ्तर की ओर से महीने में 20 दिन एक कर्मचारी को रतनगढ़ हस्ताक्षर करवाने जाना पड़ता है। ऐसे में एक लाख 20 हजार रुपए सालाना खर्च हो जाते हैं। कुल चार लाख 26 हजार रुपए का यह आंकड़ा तो मोटा-मोटा है। इसके अलावा ट्रेनिंग, कार्यक्रम व अन्य कामों का जोड़े तो पांच लाख रुपए तक चला जाता है।

70 से 100 किमी का करना पड़ता है सफर समय व धन की बर्बादी

रतनगढ़ के जालान परिवार ने ट्रस्ट के जरिए रतनगढ़ में राज्य सरकार को अपनी जमीन पर पूरे अस्पताल की बिल्डिंग बनाकर दी थी। एक नवंबर 1940 को इसका उद्‌घाटन हुआ। सरकार को बिल्डिंग सौंपने से पहले ट्रस्ट ने एमआेयू किया था कि सीएमएचओ ऑफिस इसी बिल्डिंग में संचालित होगा। इस शर्त के चलते आज तक उक्त ऑफिस यहीं संचालित हो रहा है।



रतनगढ़ में संचालित सीएमएचओ ऑफिस की जिला मुख्यालय से करीब 50 किलोमीटर दूरी है। सादुलपुर, तारानगर सहित कई क्षेत्रों की दूरी तो 70 से 100 किलोमीटर तक के दायरे में आती है। सुजानगढ़ को छोड़कर करीब-करीब सभी बड़ी तहसीलों की दूरी 50 किलोमीटर के दायरे में ही आती है। ऐसे में रतनगढ़ जाने में इन दूरी वाली तहसीलों के एक व्यक्ति पर औसतन 100 से 200 रुपए तक खर्च हो जाते है। ये भी जरूरी नहीं कि संबंधित का काम वहां जाने से हो जाए, क्योंकि सीएमएचओ को अधिकतर मीटिंगों में चूरू ही रहते है। सबसे बड़ा क्षेत्र चूरू होने से यहीं से ज्यादा लोग आते है।

रतनगढ़. सीएमचओ कार्यालय का ऑफिस।

परेशानी : राष्ट्रीय कार्यक्रमों की सामग्री वापस चूरू आती है

मजे की बात ये है कि पल्स पोलियाे व परिवार कल्याण सहित अनेक राष्ट्रीय कार्यक्रमों से जुड़ी सामग्री व सामान जयपुर से सीधे रतनगढ़ स्थित सीएमएचओ ऑफिस जाती है। अधिकतर काम एसीएमएचओ की तरफ से देखे जाने की वजह से रतनगढ़ से वापस चूरू सामान भेजा जाता है। बाद में चूरू से वापस जिलेभर सहित रतनगढ़ वही सामान जाता है। इससे विभाग का समय खराब होने के साथ-साथ रतनगढ़ वापस भेजने का गाड़ी किराया व कर्मचारी का खर्चा लगता है।

चूरू में होने से ये होंगे चार फायदे

कॉर्डिनेशन

जिला मुख्यालय पर सीएमएचओ ऑफिस होने से चिकित्सा विभाग के सभी जिला स्तरीय अधिकारियों व विभागों में आपसी सामजंस्य-कॉर्डिनेशन होगा। किसी भी काम के लिए दोनों को ही रतनगढ़ नहीं जाना पड़ेगा। अभी महीने में दोनों तरफ से ही 15-20 बार कर्मचारियों को हस्ताक्षर करवाने आदि के लिए चूरू-रतनगढ़ के चक्कर लगाने पड़ते हैं।

पब्लिक

सीएमएचओ दफ्तर चूरू होने से लोगों को सबसे ज्यादा राहत मिलेगी, क्योंकि जब सीएमएचओ अपना दफ्तर छोड़कर चूरू अाते हैं, तो पीछे से कोई काम नहीं हो पाता। अधिकतर होता ये है कि मीटिंगों में ही पूरा समय खत्म हो जाता है। इसलिए लोग रतनगढ़ में उनका इंतजार ही करते रहते हैं। दूसरे दिन फिर उन्हें जाना पड़ता है।

बजट

सीएमएचओ को महीने में 15 बार चूरू आना पड़ता है। आने-जाने का गाड़ी खर्चा व डीए आदि का औसतन 1200 रुपए खर्च हो जाते हैं। मतलब, महीने के 18 हजार रुपए और साल के 2 लाख 16 हजार रुपए चूरू आने में ही खर्च हो जाते हैं। खास बात ये है कि इनके साथ एक-दो कर्मचारी भी आते हैं। उनका भी अगर 500 रुपए के हिसाब से भी खर्चा जोड़े तो सात हजार रुपए खर्च होते हैं।

निरीक्षण

जिला मुख्यालय पर होने के चलते सीएमएचओ मीटिंग नहीं होने वाले दिन या दिन में समय मिलने पर चिकित्सा विभाग की गाइडलाइन के अनुसार लैब, सोनोग्राफी सेंटर सहित अनेक गतिविधियों का निरीक्षण कर सकते हैं। यहीं रहने से लगातार निगरानी रहेगी।

X
प्रदेश का पहला ऐसा जिला मुख्यालय जहां सीएमएचओ दफ्तर नहीं 77 साल से तहसील मुख्यालय पर चल रहा, आमजन-स
Bhaskar Whatsapp

Recommended

Click to listen..