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1.08 लाख श्रमिकों का पंजीयन, घर बनाने के लिए सिर्फ 17 ने ली राशि

Dainik Bhaskar

May 02, 2018, 06:15 AM IST

Rawatbhata News - जिन श्रमिकों के पास अपनी जमीन है, उन्हें मकान बनाने के लिए सुलभ्य योजना के तहत 1.50 लाख रुपए की आर्थिक सहायता दिए जाने...

1.08 लाख श्रमिकों का पंजीयन, घर बनाने के लिए सिर्फ 17 ने ली राशि
जिन श्रमिकों के पास अपनी जमीन है, उन्हें मकान बनाने के लिए सुलभ्य योजना के तहत 1.50 लाख रुपए की आर्थिक सहायता दिए जाने का प्रावधान है, लेकिन चित्तौड़गढ़ जिले में ढाई साल के दौरान 17 श्रमिकों को इसमें राशि दी गई। श्रम एवं रोजगार विभाग के मुताबिक जिलेभर में 1 लाख 8 हजार से ज्यादा श्रमिक पंजीकृत हैं।

इस योजना को लेकर श्रमिक बोल रहे हैं कि उन्हें तो पता ही नहीं है कि सरकार से मकान बनाने के लिए ऐसी कोई सहायता राशि भी मिलती है। अगर, इस योजना का प्रचार-प्रसार ठीक से होता तो यह कैसे संभव है कि ढाई साल में कुल 17 श्रमिक मकान के लिए आर्थिक सहायता प्राप्त कर पाए हैं। श्रम विभाग के मुताबिक ही राज्य सरकार ने 16 जनवरी, 2016 को सुलभ्य आवास के नाम से यह योजना शुरू की थी। इसका उद्देश्य उन श्रमिकों को स्वयं का मकान उपलब्ध कराना था, जिनके पास जमीन तो है, लेकिन पैसे की तंगी के कारण मकान नहीं बना पा रहे हैं। वैसे भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2022 तक सबको आवास उपलब्ध कराने का वादा किया हुआ है।

स्वयं के मालिकाना हक का पट्‌टा होना जरूरी

योजना के मुताबिक निजी भूखंड पर अगर किसी श्रमिक ने मकान बना लिया है तो भी वह बाद में 1.50 लाख रुपए की सरकारी सहायता राशि ले सकता है। बशर्ते उसके पास जमीन के मालिकाना हक का दस्तावेज (पट्टा, रजिस्ट्री आदि 6 माह पुराने) हो। मालिकाना हक पर किसी तरह का विवाद न हो। साथ ही मकान बनाने में जो भी राशि खर्च हुई है, उसकी पुष्टि किसी अधिकारी से कराने के बाद श्रम विभाग संबंधित मजदूर के बैंक खाते में यह राशि ट्रांसफर कर देगा। खास बात यह है कि हाउसिंग बोर्ड अथवा यूआईटी से आवंटित मकान में मरम्मत कराने के लिए भी यह राशि मिल सकती है, लेकिन इसके लिए आवंटन पत्र पति अथवा प|ी दोनों में से किसी एक के नाम होना चाहिए। वे श्रम विभाग में पंजीकृत भी हों।

योजना को लेकर अफसर अब बना रहे नया बहाना

इसके लिए अफसरों ने अब नया बहाना बना लिया है। उनका कहना है कि इस योजना में श्रमिक के पास अपनी जमीन होने के साथ-साथ मालिकाना हक के प्रमाण के तौर पर पट्टा होना जरूरी है।


ये होना चाहिए: मजदूर संगठनों से जुड़े लोगों का कहना है कि इस योजना के प्रावधानों को सरल बनाया जाना चाहिए। क्योंकि यह सब जानते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले श्रमिक तो क्या सामान्य व्यक्ति के पास भी जमीन अथवा मकान के मालिकाना हक का कोई दस्तावेज नहीं होता। लोग पुश्तैनी जमीन पर ही पीढ़ी दर पीढ़ी रहते आ रहे हैं। ऐसे में मालिकाना हक की पुष्टि संबंधित ग्राम पंचायत अथवा वहां तैनात किसी अधिकारी एवं कर्मचारी से कराई जा सकती है।

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