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383 लाख केे एनीकट निर्माण में हो रहा क्रसर डस्ट और लाल बजरी का उपयोग

उपखंड इलाके के गढ़ी चटोला में पार्वती नदी पर जल संसाधन विभाग द्वारा 383 लाख की लागत से बनाए जा रहे एनीकट में पार्वती...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 06, 2018, 07:05 AM IST

383 लाख केे एनीकट निर्माण में हो रहा क्रसर डस्ट और लाल बजरी का उपयोग
उपखंड इलाके के गढ़ी चटोला में पार्वती नदी पर जल संसाधन विभाग द्वारा 383 लाख की लागत से बनाए जा रहे एनीकट में पार्वती नदी की लाल बजरी के उपयोग से एनीकट निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल उठने लगे हैं। यही नहीं मैटीरियल में कच्ची ग्रिट और घटिया सटरिंग का उपयोग करने से एनीकट फाउंडेशन में तमाम खामियां दिखाई दे रही है। जिनको निर्माण एजेंसी द्वारा लीपापोती करके दबाया जा रहा है। इस सबके बावजूद संबंधित विभाग के अधिकारियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही है। विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत के चलते सरकार को बड़ी चपत लगती दिखाई दे रही है। जानकारी के अनुसार, उपखंड क्षेत्र के गढ़ी चटोला स्थित पार्वती नदी में जल संसाधन विभाग द्वारा एनीकट निर्माण कार्य कराया जा रहा है। सरकार द्वारा एनीकट निर्माण के लिए 383 करोड़ की राशि स्वीकृत करके क्षेत्र के लोगों को नदी के पानी को भंडारण कर लंबे समय तक सहेजकर रखने के लिए योजना को मूर्त रूप दिया जा रहा है। लेकिन निर्माण एजेंसी और विभागीय मिलीभगत के कारण एनीकट का निर्माण खामियों की भेंट चढ़ रहा है। एनीकट निर्माण में कच्ची ग्रिट और लोकल सेंड का उपयोग करने के साथ तकनीकी कारणों की भी बड़े पैमाने पर अनदेखी की जा रही है। मसलन एनीकट फाउंडेशन में कॉम्लेक्शन प्रॉपर तरीके से नहीं किए जाने के कारण हनी कांबी कांक्रीट निकल रही है। जिसके चलते गुणवत्ता पर सवाल उठने लगे हैं। ठेकेदार द्वारा फाउंडेशन से कांक्रीट के दिखाई देने पर उस पर प्लास्टर कराकर लीपापोती कराई जा रही है। ऐसे में विभाग द्वारा साधी जा रही चुप्पी सीधा-सीधा मिलीभगत की ओर इशारा कर रही है।

सैंपऊ. फाउंडेशन में दिखती कांक्रीट व नीचे रखी लाल बजरी। (लाल घेरे में)

एक्सईएन केएन जायसवाल से सवाल-जवाब

सवाल : क्या एनीकट में क्रसर डस्ट के साथ लाल बजरी का उपयोग हो रहा है।

जवाब : एनीकेट में लाल क्रसर डस्ट का उपयोग हो रहा है। पार्वती नदी की लाल बजरी नहीं है।

सवाल : मिक्स होकर आने वाले मैटेरियल निर्माण स्थल से कितनी दूरी से आ रहा है।

जवाब : मैटेरियल प्लांट की दूरी करीब 6 से 8 किमी की दूरी है। प्लांट बड़ा होता है। इसलिए इसे बदल नहीं सकते हैं। ऐसे में एक ही जगह पर बनाया जाता है।

सवाल : एनीकट के फाउंडेशन से कांक्रीट क्यों निकल रही है।

जवाब : पूरा काम कांक्रीट का है। इसलिए इसमें कांक्रीट दिखना स्वभाविक है।

सवाल : एनीकट की तराई के लिए फाउंडेशन की दीवार पर टाट क्यों नहीं डाले जा रहे।

जवाब : काम कंप्लीट होने के बाद टाट डाली जाती है। लेकिन कई बार टाट चोरी हो चुके हैं। पानी की बौझार व टाट दोनों ही डाली जा रही है। प्लेट हटाने के बाद तुरंत टाट लगाई जाती है।

15 किमी दूर है प्लांट, 2-घंटे खड़े रहते हैं ट्रांईजर मिक्चर

एनीकट निर्माण स्थल से मेटेरियल मिक्स प्लांट की दूरी करीब 15 किलोमीटर है। ऐसे में मिक्स प्लांट पर मैटेरियल में कम सीमेंट के साथ क्रसर डस्ट के साथ लोकल रेत का उपयोग धड़ल्ले से हो रहा है। वहीं रही सही कसर मैटेरियल मिक्स होने के बाद ट्रांईजर मिक्चरों के निर्माण स्थल पर दो-दो घंटे तक खड़े रहने से पूरी हो जाती है। जानकारों की मानें तो निर्माण स्थल पर मैटेरियल के देरी से पहुंचने पर गुणवत्ता प्रभावित होना लाजिमी है।

निर्माण स्थल पर पड़ा है लाल बजरी का ढेर

पार्वती नदी में जिस स्थान पर एनीकट निर्माण हो रहा है, वहां मौके पर लाल बजरी का ढेर पड़ा हुआ है। इसी बजरी को सीमेंट में मिलाकर एनीकट के फाउंडेशन से निकल रही कांक्रीट को ढकने के लिए प्लास्टर के उपयोग में लिया जा रहा है। फाउंडेशन में बड़े पैमाने पर उभरी हुई दरारें और निकली हुई कांक्रीट पर लीपापोती के लिए लोकल बजरी का प्लास्टर किया जा रहा है।

तराई का भी नहीं रखा जा रहा ध्यान

निर्माण स्थल पर एनीकट के फाउंडेशन से लेकर अन्य निर्माण कार्य पर तराई की साफ कमी देखी रही है। निर्माण एजेंसी द्वारा तराई कार्य के लिए नदी के एक गड्ढे में भरे पानी में मोटर डालकर तराई का कार्य किया जाता है। जबकि गड्ढे के अंदर का पानी भी सूखने के कगार पर पहुंच चुका है। जानकारों की मानें तो एनीकट की तराई के लिए फाउंडेशन की दीवार पर टाट डाले जाना बेहद आवश्यक है। लेकिन एजेंसी द्वारा केवल पानी के पाइप से बौछार कर तराई करके इतश्रि की जा रही है।

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