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मेवाड़ में रंगोत्सव

Sanwariyaji News - मेवाड़ में होली का उल्लास डेढ़ महीने रहता है। इतना कि कहावत कहते हैं- गांव-गांव होळी’न गळी-गळी गेर...। यानि हर गांव में...

Dainik Bhaskar

Mar 01, 2018, 06:20 AM IST
मेवाड़ में रंगोत्सव
मेवाड़ में होली का उल्लास डेढ़ महीने रहता है। इतना कि कहावत कहते हैं- गांव-गांव होळी’न गळी-गळी गेर...। यानि हर गांव में होली की मस्ती होती है तो गली-गली में पारंपरिक लोकनृत्य गेर की धूम रहती है। माघ पूर्णिमा को पूजन के साथ होलिका रोपण कर दिया जाता है। इसके साथ ही शुरू होती है हंसी-ठिठोली भरी मस्ती। समाज संगठनों के फागोत्सवों की धूम मचने लगती है। नाथद्वारा, सांवलियाजी, कोटड़ी चारभुजा, सिंगोली श्याम आदि प्रसिद्ध कृष्णधाम में तिथियों के अनुरूप अबीर-गुलाल उड़ने लगती है। फाग गान के बीच भक्तों की टोलियां फूलों से होली खेलते हुए झूम उठती हैं। होलिका दहन होते ही दिन से रंग जैसे यहां के जनजीवन में घुल से जाते हैं। दहन स्थल पर ही रंग-गुलाल उड़ने लगती है। अगले दिन से धूलंडी की धूम मचती है। बच्चों के ढूंढ की यहां विशिष्ट परंपरा है। कहते हैं, बच्चों की ‘चमक’ (अचाकर डरकर चौंक जाना) भगाने का लोकउपक्रम इस दौरान होता है। वर्षभर के दौरान जन्मे बच्चे को पहली दहन होती होली की मामा अथवा बुआ सात परिक्रमा करवाती हैं। ताकि आग से उसका डर दूर हो। अगले दिन ‘ढूंढे-ढूंढे ढंढा देवी- श्री-श्री श्रीयादेवी… पारंपरिक गान करते हुए बच्चे के ऊपर लकड़ियां बजाते हुए तेज आवाज से उसकी चमक मिठाई जाती है। कहते हैं, यह परंपरा सिर्फ मेवाड़ में प्रचलित है। फिर रंगपर्व अलग-अलग तिथियों पर गांव-कस्बों में मनने लगता है। डेढ़ माह में तीन बड़े रंगोत्सव पंचमी, अष्टमी और तेरस मनते हैं।

गांव-गांव होळी न गळी-गळी गेर

अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही संप्रदाय की प्रधान पीठ शाहपुरा में फूल बरसाते हुए निकाली जाती है वाणीजी की शोभायात्रा

पंचमी... रंगोत्सव के साथ ही यह अंचल की धार्मिक आस्था का महापर्व है। अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही संप्रदाय की प्रधानपीठ शाहपुरा में दुनियाभर से पांच दिन के दौरान लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। गुलाल उड़ाते हुए प्रमुखग्रंथ वाणीजी की शोभायात्रा निकाली जाती है। धर्मसभा में आचार्य के अगले चातुर्मास की घोषणा होती है।

अष्टमी... सप्तमी को राजपरिवार में ओख (शोक) है। इसलिए मेवाड़ में पूजन एवं रंगपर्व अगले दिन अष्टमी को मनाते हैं। मांडल में नार (शेर) नृत्य में लोग शेर का स्वांग रचकर जुलूस में शामिल होते हैं। भीलवाड़ा में मुर्दे की सवारी निकालने की परंपरा है। दोपहर बाद यह सवारी ढोल तेज धुनों के बीच बाजारों से गुजरती है। बहुरूपिए स्वांग रचे होते हैं।

तेरस... मेवाड़ रियासत के अलग-अलग ठिकाने रहे कस्बोंे में इस दिन रंगोत्सव मनाया जाता है। इस दिन भीलवाड़ा में जीनगर समाज की कोड़ामार होली का विशेष आकर्षण रहता है। बरसाते की तर्ज पर यह आयोजन सामाजिक स्तर पर होता है। जीनगर समाज के युवक कड़ाहों से रंग चुराते हैं, जिन पर महिलाएं कोड़े बरसाती हैं। कृष्णधामों में रसिया गान होते हैं। इसके बाद से ग्रीष्म के धवल शृंगार शुरू हो जाते हैं।

फूलडोल महोत्सव

मुर्दे की सवारी

कोड़ामार होली

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